परायों से अपनापन
सुबह के करीब सात बजे होंगे। रमा आँगन में झाड़ू लगा रही थी कि तभी दरवाज़े पर किसी ने ज़ोर से खटखटाया। उसने झाड़ू किनारे रखी और दरवाज़ा खोला तो सामने नेहरू जी खड़े थे — पड़ोस वाले।
"रमा बहू, सुनो तो, सामने वाले मिश्रा जी की तबीयत बहुत खराब है। डॉक्टर को बुलाने गए हैं।"
नेहरू जी ने कहा।
"अरे! क्या हुआ मिश्रा अंकल को?"
रमा ने घबराते हुए पूछा।
"सुना है कल रात अचानक चक्कर आया था। अब तो होश में हैं, पर कमजोरी बहुत ज़्यादा है।"
नेहरू जी बोले और आगे बढ़ गए।
रमा तुरंत अंदर गई और अपनी सास शारदा देवी को बताया।
"माँ जी, सामने वाले मिश्रा अंकल की तबीयत बहुत खराब है।"
शारदा देवी बोलीं,
"अरे बाप रे! कल ही तो दिखे थे मंदिर में। भला ऐसा क्या हो गया! चल, ज़रा देख आते हैं।"
दोनों सास-बहू मिश्रा जी के घर पहुँचे। मिश्रा जी बिस्तर पर लेटे थे और उनकी पत्नी सविता आंटी उनके सिरहाने बैठी थीं। चेहरा थका हुआ लेकिन आँखों में चिंता की लकीरें साफ़ थीं।
"कैसी तबीयत है जी?"
शारदा देवी ने पूछा।
"थोड़ी बेहतर है दीदी, लेकिन डॉक्टर ने पूरा आराम करने को कहा है," सविता आंटी ने धीमे से कहा।
रमा ने देखा कि घर में सन्नाटा पसरा है। न कोई बेटा, न बहू, न पोते—पोती।
उसने धीरे से पूछा,
"आंटी, आपका बेटा और बहू कहाँ हैं? कोई दिख नहीं रहा।"
सविता आंटी का चेहरा उतर गया,
"वो तो शहर छोड़कर मुंबई चले गए हैं। नौकरी का बहाना बनाकर गए थे, फिर लौटे ही नहीं। अब तो फोन पर भी कम ही बात करते हैं।"
रमा को सुनकर बहुत दुख हुआ।
"इतने बड़े लोग अकेले यहाँ कैसे रह रहे हैं?" उसने सोचा।
घर लौटकर उसने अपने पति संदीप को बताया।
संदीप ने कहा,
"आजकल कुछ बच्चे अपने माँ-बाप को ज़िम्मेदारी नहीं, बोझ समझने लगे हैं — इसलिए उन्हें अकेला छोड़ देते हैं, अपने हाल पर।"
यह सुनकर शारदा देवी बोलीं,
"बेटा, हमेशा ऐसा नहीं होता। कभी-कभी माँ-बाप की अपनी सोच, अपनी आदतें भी बच्चों को दूर कर देती हैं।"
रमा ने कहा,
"पर माँ जी, अगर आदतें हों भी तो क्या इतना दूर हो जाना चाहिए?"
शारदा देवी मुस्कुरा दीं,
"देख बेटा, हर कहानी के दो पहलू होते हैं — तू अभी सिर्फ़ एक ही पहलू देख पाई है।"
अगले दिन..
शारदा देवी ने रमा से कहा,
"बहू, कल तो तू मिश्रा जी के घर देखकर आई थी न? आज ज़रा जल्दी उठना।"
"क्यों माँ जी?"
"कल से तू थोड़ा मेरे हिसाब से चलेगी। देखती हूँ तेरी राय तब क्या होती है।"
रमा ने सोचा, "अरे माँ जी तो बिलकुल वीणा जी वाली सास बन गईं क्या?"
सुबह के चार बजे ही शारदा देवी ने रमा को उठा दिया।
"बहू, उठ जा, ब्रह्म मुहूर्त का समय है। जल्दी नहा ले। पूजा करनी है।"
रमा नींद में ही बोली,
"माँ जी, चार बजे? अभी तो अंधेरा है।"
"अंधेरा तो मन में होता है बहू, बाहर नहीं। चल उठ।"
रमा जैसे-तैसे उठी, ठंडे पानी से नहाई, और मंदिर में जाकर माँ जी के साथ बैठ गई। पूजा खत्म होते-होते साढ़े पाँच बज गए।
"अब चाय बना लूँ माँ जी?"
"पहले रसोई की अच्छी तरह सफ़ाई कर लो, फिर चाय बनाना। बिना साफ़ रसोई के कुछ बनाना ठीक नहीं होता।"
रमा ने मन में सोचा, "अरे वाह! नियम तो शुरू हो गए।"
पर सास की बात मानकर चुपचाप सफाई करने लगी।
छह बजे तक रसोई, चौका, बर्तन, पूजा—सब निपट गया। तभी शारदा देवी ने कहा,
"अब जाओ और संदीप को उठाओ, लेकिन उससे कहना पहले नहा ले तभी चाय पिए।"
रमा ने कहा,
"माँ जी, वो अभी सो रहे हैं, ऑफिस भी आज थोड़ा देर से जाएंगे।"
"बहू, घर के नियम सबके लिए बराबर हैं।"
रमा मन मसोसकर कमरे में गई और धीरे से बोली,
"सुनिए, माँ जी ने कहा है पहले नहा लीजिए, फिर चाय पिएं।"
संदीप ने तकिया पलटते हुए कहा,
"क्या मम्मी अब किसी आश्रम से लौटी हैं क्या?"
दिनभर रमा वही करती रही जो सास ने कहा —
हर बार वॉशरूम जाने के बाद नहाना, हर बर्तन तीन बार धोना, घर के हर कोने में तीन बार पोछा लगाना।
दोपहर तक उसकी हालत खराब हो गई। थककर बोली,
"माँ जी, अब तो शरीर जवाब दे रहा है।"
"बहू, नियम पालन करने वालों को तकलीफ़ नहीं होती। आस्था में शक्ति होती है,"
शारदा देवी बोलीं।
शाम को जब संदीप ऑफिस से लौटा तो रमा रोती हुई बोली,
"आपकी मम्मी आज तो मुझसे नौकरानी का काम करवाया। बार-बार नहाने, साफ़-सफाई और पूजा के नाम पर मैं थक गई।"
संदीप सीधा माँ के पास गया।
"माँ, ये सब क्या चल रहा है? रमा कोई सेविका नहीं है!"
शारदा देवी शांत स्वर में बोलीं,
"तो क्या मैं गलत कर रही हूँ? हर घर में नियम-कायदे होते हैं न? कल तुम दोनों मिश्रा जी की बहू को ही दोष दे रहे थे, याद है?"
संदीप और रमा चुप।
"वो भी ऐसे ही नियमों में पली थी। पर सविता जी की हर बात, हर जिद ने उसके घर का चैन छीन लिया। डेढ़ साल तक उस बहू ने झेला, फिर चली गई। और अब सब कहते हैं कि बेटे-बहू ने छोड़ दिया।
सच्चाई तो कोई जानता ही नहीं।"
रमा की आँखों में आँसू थे।
"माँ जी, अब हमें समझ आ गया — हमनें दूसरों को देखकर जल्दबाज़ी में राय बना ली थी, और वही हमारी गलती थी।
वो बहू नहीं, बल्कि उसकी सास की ज़िद थी, जिसने उसे और खुद को दोनों को अकेला कर दिया।"
शारदा देवी ने प्यार से रमा का सिर सहलाया,
"हाँ बेटा, दुनिया को जज करना आसान है, पर किसी की परिस्थिति समझना कठिन। दूसरों के जीवन की कहानी का आधा पन्ना देखकर पूरा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।"
रमा ने हाथ जोड़कर कहा,
"माँ जी, आज हमने सीख लिया —
‘कभी किसी के जीवन का निर्णय बिना उसकी पूरी बात जाने मत करना।’"
शारदा देवी मुस्कुराईं,
"बस बेटा, यही सीख तो जीवन का सच्चा
पाठ है।"
सीख:
> कभी भी किसी के बारे में अधूरी जानकारी पर राय मत बनाओ।
सच्चाई अक्सर उस ओर होती है, जो हमें दिखाई नहीं देती।
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