एक पिता की पुकार… और एक अजनबी का साहस
बस स्टेशन के बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी।
एक बुज़ुर्ग आदमी भीगे हुए बस-स्टैंड की बेंच पर बैठे थे।
नाम था — हरिभान प्रसाद, उम्र लगभग पैंसठ।
कपड़ों पर मिट्टी, आँखों में बेचैनी… और हाथ में पुरानी सी एक फोटो।
फोटो में उनकी बेटी मुस्करा रही थी —
अनुपमा, जो शहर में नर्स की ट्रेनिंग कर रही थी।
तीन दिन से उसका फोन बंद था।
न कोई मैसेज, न कोई खबर।
हरिभान के दिल में जैसे कोई काँटा धँसा था।
आखिर उन्होंने हिम्मत जुटाई और थाने पहुँचे।
इंस्पेक्टर बाहर खड़ा चाय पी रहा था।
हरिभान ने काँपती आवाज़ में कहा—
“साहब… मेरी लड़की तीन दिन से—”
इंस्पेक्टर ने बिना सुने हाथ हिलाया, “अरे बाबा… रोज़-रोज़ लड़की-लड़की का रोना लेकर चले आते हैं!
भाग गई होगी किसी के साथ। जाओ, घर जाओ। हमारे पास टाइम नहीं है।”
थाने के स्टाफ ने हँसना शुरू कर दिया।
हरिभान के होंठ काँप गए।
धूप-बारिश में मेहनत करके बच्चों को बड़ा करने वाले उस पिता को,
जब ऐसे ताने सुनने पड़े… तो उनकी आत्मा तक हिल गई।”
वह थाने के गेट से निकलकर बारिश में ही खड़े रह गए।
आँसू और बारिश का पानी — दोनों मिलकर चेहरा भिगो रहे थे।
उसी समय एक लड़का आया —
समर्थ, 24 साल का, जो ऑटोमोबाइल वर्कशॉप में काम करता था।
उसने बुज़ुर्ग को भीगा देखा और पूछा—
“बाबूजी, आप यहाँ क्यों खड़े हैं? सब ठीक है?”
हरिभान का गला भर आया, “बिटिया… नहीं मिल रही बेटा। पुलिस वाले भी… सुनते नहीं…”
समर्थ ने तुरंत उनका हाथ पकड़ा, “तो चलिए बाबूजी। मैं हूँ आपके साथ।
अब आपके साथ कोई अपमान नहीं होगा।”
थाने में घुसते ही समर्थ ने टेबल पर हाथ रखा—
“सर, FIR लेना आपका काम है।
और सामने CCTV लगा है।
अगर आपने शिकायत नहीं ली, तो हम यहीं से मीडिया को कॉल करेंगे।”
इंस्पेक्टर चौंक गया।
आज मामला उसे उल्टा पड़ सकता था।
अनिच्छा से उसने कहा— “ठीक है… लिखो शिकायत।”
हरिभान की आँखों में उम्मीद की छोटी सी लौ जल उठी।
जाँच शुरू होती है
अनुपमा जिस हॉस्टल में रहती थी, वहाँ पहुँचे।
CCTV फुटेज चेक किया गया।
रात के 9 बजे अनुपमा हॉस्टल से बाहर निकली।
एक एंबुलेंस उसके पास रुकी।
एंबुलेंस वाला उससे बात करता है…
फिर वह चढ़ती है और गाड़ी आगे बढ़ जाती है।
हरिभान का दिल धड़कने लगा।
“साहब… ये कौन है?”
इंस्पेक्टर ने कहा, “चेहरा साफ नहीं दिख रहा, लेकिन यह हॉस्पिटल की एंबुलेंस नहीं लगती।”
समर्थ ने धीरे से पूछा, “बाबूजी, बेटी ने कभी किसी का जिक्र किया था क्या?”
हरिभान ने होंठ दबाकर कहा, “हॉस्पिटल में एक हेल्पर था — विक्रम।
बात-बात पर बेटी को परेशान करता था।”
इंस्पेक्टर ने भौंहें तान लीं— “उस पर पहले भी एक शिकायत आई थी!”
समर्थ को एक बात याद आई—
“सर, पुरानी मिल के पास एक बंद डिस्पेंसरी है।
लोग कहते हैं कि वहाँ रात को एंबुलेंस खड़ी होती है।”
इंस्पेक्टर ने तुरंत टीम बनाई।
हरिभान भी भीगते पैरों के साथ चल दिए।
जैसे ही डिस्पेंसरी का दरवाज़ा तोड़ा गया —
अँधेरी बदबूदार हवा बाहर आई।
टॉर्च घुमाते-घुमाते
एक कमरे के कोने में कोई बैठा काँप रहा था।
“अनुपमा!”
हरिभान की चीत्कार ने पुलिसवालों को हिला दिया।
वह एक स्टूल पर बंधी थी।
चेहरा सूजा हुआ, बाल बिखरे, शरीर काँप रहा था।
वह टूटे हुए स्वर में रोते-रोते बोली—
“बाबूजी… उन्होंने धमकी दी थी कि अगर मैं पुलिस में शिकायत करूँगी…
तो मुझे इसकी सज़ा भुगतनी पड़ेगी…”
हरिभान दौड़कर बेटी से लिपट गए।
शायद तीन दिन का दर्द और डर
एक ही पल में आँखों से बह निकला।
समर्थ ने काँपते स्वर में कहा— “दीदी… अब आप सुरक्षित हैं।”
विक्रम पकड़ा गया...
डिस्पेंसरी के पीछे के कमरे से
विक्रम भागने की कोशिश में पकड़ा गया।
इंस्पेक्टर की आँखें शर्म से झुक गईं।
उसने धीमे से कहा—
“बाबूजी… माफ़ कीजिए।
हमने पहली बार में आपकी बात को गंभीरता से नहीं लिया।”
हरिभान ने टूटे स्वर में कहा— “गरीब आदमी हो तो आपकी नज़र में बात की कीमत नहीं रहती, साहब।”
इंस्पेक्टर की गर्दन झुक गई।
अस्पताल में अनुपमा का इलाज शुरू हुआ।
समर्थ रोज़ आता—
दवाइयों के पैसे देता, खाना लाता, हौसला देता।
एक दिन अनुपमा ने धीमी आवाज़ में कहा— “भैया… अगर आप न होते, तो मैं शायद आज जिंदा नहीं होती।”
समर्थ ने मुस्कुरा कर कहा— “दीदी, इंसानियत का रिश्ता खून से बड़ा होता है।”
हरिभान की आँखों में कृतज्ञता थी।
कुछ दिनों बाद अनुपमा ठीक होकर घर ले जाने लायक हुई।
हरिभान ने समर्थ को घर आने का न्योता दिया।
घर की कच्ची दीवारें और टेढ़े-मेढ़े पंखे भले पुराने थे,
लेकिन उस छोटे से आँगन में सच्चा अपनापन भरा हुआ था।
हरिभान ने गिलास में पानी देकर कहा—
“बेटा… भगवान ने मेरे घर बेटी भेजी थी।
पर तूने साबित कर दिया कि बेटा भी भेजा था।”
समर्थ की आँखें भर आईं।
“बाबूजी, उम्र कोई मायने नहीं रखती…
आपकी पुकार मैं हमेशा सुनूँगा।
आप कभी अकेले नहीं रहेंगे—मैं हर कदम पर आपके साथ हूँ।”
अनुपमा मुस्करा दी—
पहली बार… तीन दिनों के बाद।
संदेश:
👉 किसी का दर्द देखकर आँखें चुराना आसान है।
👉 लेकिन किसी का हाथ पकड़ना… हिम्मत मांगता है।
हमेशा याद रखिए—
दुनिया अच्छाई से ही चलती है।
अगर हम किसी की रोती आवाज़ सुन लें…
तो भगवान किसी और के जरिए हमारी भी सुन लेता है।
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