रिश्तों का असली रंग

 

Indian newly married couple standing together indoors with soft lighting and traditional wedding decor.


सविता देवी का एक ही सपना था—

“मेरे बेटे करण की शादी किसी गोरी, सुंदर और मॉडर्न लड़की से हो।”


करण शहर में इंजीनियर था—शांत, सीधा और बहुत जिम्मेदार।

पर मां की इच्छाओं के कारण रिश्ता वही तय करता था जो सविता देवी को पसंद आता।


काफी ढूँढने के बाद उन्हें रिया पसंद आई—

गोरी, मॉडर्न और पढ़ी-लिखी।

बस यही देखकर उन्होंने तुरंत रिश्ता पक्का कर दिया।

करण ने भी मां की खुशी के लिए हाँ कर दी।



शादी से 10 दिन पहले…

रिया अचानक शादी से मना कर गई।

बोली—

“मैं अभी शादी नहीं करना चाहती… मुझे अपनी पढ़ाई करनी है।”


यह सुनकर घर में जैसे आग लग गई।

कार्ड बंट चुके थे, लोग जान चुके थे…

सविता देवी रोती-चिल्लाती रहीं—

“ये कैसी बेइज्जती है! हमारी नाक कटवा दी इस लड़की ने।”


करण चुप था।

दर्द में नहीं, बस उलझन में।

पर परिवार की हालत देखकर वह भी टूट गया।



इसी गाँव में…

करण के घर के पास रहने वाले शर्मा जी की बेटी अंजलि,

बचपन से ही करण को जानती थी।

न कोई बहन-जैसा रिश्ता, न कोई रोमांस—

बस बचपन की नमस्ते–हाय और जान-पहचान।


अंजलि सीधी-सादी, पर दिल की बहुत ही साफ लड़की थी।

अपनी माँ को कामों में हाथ बँटाती और पढ़ाई के बाद ट्यूशन पढ़ाती।


जब उसे पता चला कि करण की शादी टूट गई है,

उसका दिल दुख से भर गया—

ना जाने क्यों… जैसे करण के लिए कुछ महसूस होने लगा हो।




शादी रुक नहीं सकती थी।

घर में बुज़ुर्ग बोले—


“अंजलि बहुत अच्छी लड़की है।

सालों की पहचान है।

लड़की संस्कारी है, परिवार जानता है—

रिश्ता यहीं कर दो।”


सविता देवी पहले तो सहमत नहीं थीं—

“अरे! ये तो गोरी भी नहीं… कैसी बहू बनेगी?”


पर समाज और रिश्तेदारों के दबाव में

उन्होंने अनमने मन से हामी भर दी।


अंजलि भी रिश्ते के लिए तैयार हो गई।

क्योंकि दिल में कहीं करण के लिए भाव जाग चुके थे।



शादी हो गई…


जब अंजलि दुल्हन बनकर घर आई,

सविता देवी का चेहरा उतर गया—


“ये मेरी बहू है? मेरी बहू तो गोरी होनी थी… ये कैसी साँवली बहू है!”


अंजलि ने चुपचाप सिर झुका लिया।

करण के पिता ने डाँटा—


“बस करो सविता!

इस बच्ची ने हमारी इज्जत रखी है।

थोड़ा मान रखो इसका।”


करण भी चुप ही रहा—

सम्मान जरूर था, पर दिल में दूरी भी।



नई ज़िंदगी की शुरुआत...

अंजलि सुबह-सुबह उठकर घर का काम करती,

सबके लिए चाय बनाती, खाना तैयार करती।


पर सविता देवी हर बार कुछ न कुछ बोल देतीं—

“तुमसे कुछ सही नहीं होता।”

“देखो रिया होती तो घर चमक जाता।”


अंजलि के दिल पर हर बात चोट करती।

पर वह घर को अपना बनाने की कोशिश करती रही।


करण अंजलि से अच्छे से बात करता,

पर पास आने से डरता था—

उसे रिश्ता समझ नहीं आ रहा था।


अंजलि कई बार अकेले में चुपके से रो लेती।



एक दिन… अंजलि बीमार हो गई..

पूरा दिन काम करने,

और सास के तानों के बीच,

वह तेज़ बुखार से काँपने लगी।


करण घर लौटा तो अंजलि को बिस्तर पर गिरा हुआ पाया।

वह घबराया, तुरंत दवा दी, पानी लाया,

खुद खिचड़ी बनाकर खिलाई।


अंजलि ने धीमे से कहा—

“आप इतना क्यों कर रहे हैं… मैं ठीक हूँ।”


करण ने पहली बार दिल से कहा—

“तुम मेरी पत्नी हो अंजलि…

और कभी महसूस नहीं किया कि तुम्हारा कितना ख्याल रखना चाहिए था।”


अंजलि की आँखों में आँसू भर आए।



करवा चौथ का दिन.. 

अंजलि ने साड़ी पहनकर सोलह श्रृंगार किया।

वह सांवली होते हुए भी

इतनी सुंदर लग रही थी कि करण देखता ही रह गया।


रात को जब चांद निकला,

करण ने पानी पिलाते हुए कहा—


“अंजलि… आज तुम पहली बार मुझे अपनी लग रही हो।”


अंजलि मुस्कुराई—

“और मैं तो हमेशा से आपकी ही थी…”



एक शाम करण ने कमरे को फूलों से सजाया।

अंजलि चौंक गई।


करण ने हाथ पकड़कर कहा—


“अंजलि…

शादी के दिन मेरे दिल में तुम्हारा कोई चित्र नहीं था…

लेकिन आज मेरे दिल में सिर्फ तुम हो।

क्या तुम मेरे साथ जिंदगी चलोगी?”


अंजलि शरमा कर बोली—

“मैं तो बहुत साधारण हूँ…”


करण मुस्कुराया—

“और मुझे यही साधारणपन सबसे खूबसूरत लगता है।”


उस रात पहली बार

अंजलि और करण का रिश्ता

सच्चे प्यार के रंग में रंग गया।



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