माँ तो माँ होती है

 

“अनाथालय में बच्चों के साथ बैठी एक वृद्ध माँ और दरवाज़े पर खड़ा उसका बेटा, भावुक मिलन का दृश्य।”


राघव सुबह-सुबह बस से उतरा और सीधे अपने गाँव की गली में मुड़ गया। मन में एक ही उत्सुकता—आज माँ को अपने साथ शहर ले जाकर रहेगा।

लेकिन जैसे ही वह घर के दरवाज़े तक पहुँचा…

दरवाज़े पर ताला लटका हुआ था।


राघव चौंक गया—

“माँ कहाँ गई? किसी ने बताया भी नहीं!”


पिछले कई महीनों से वह काम की भागदौड़ में इतना उलझा था कि माँ को फोन भी नहीं कर पाया था। उसने पड़ोस के शर्मा चाचा के दरवाज़े पर दस्तक दी।


“चाचा… माँ कहाँ है?”


शर्मा चाचा ने हैरानी से कहा,

“अरे राघव, तुम्हें नहीं पता? मीरा बहन तो दो महीने पहले ही यहाँ से चली गई थी।”


“क्या? दो महीने?”

राघव का दिल धक् से रह गया।

उसे याद आया—हाँ, उसने तो माँ से तीन-चार महीने से बात भी नहीं की थी।


उसी समय शर्म और ग्लानि ने उसे अंदर तक चुभो दिया—

“मैं कैसा बेटा हूँ… माँ की कोई खबर तक नहीं ली!”


उसने चाचा से पता लिया और उसी शाम माँ को ढूँढने निकल पड़ा।



माँ की याद क्यों आई?

राघव और उसकी पत्नी कीर्ति दोनों नौकरी करते थे। उनका पाँच साल का बेटा आरव और दो साल की बेटी नायरा डे-केयर में रहती थी।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से बच्चे लगातार बीमार रहने लगे।

कभी बुखार, कभी खाँसी…

डॉक्टर–ऑफिस–छुट्टी… दोनों की ज़िंदगी थक गई थी।


एक दिन कीर्ति ने कहा—

“अगर आपकी माँ आ जाएँ तो बच्चों का ख्याल भी रहेगा और घर भी संभल जाएगा। उनकी इच्छा भी पूरी हो जाएगी पोते-पोती के साथ रहने की।”


राघव को बात पसंद आई और वह माँ को लाने आ गया…

लेकिन उसने यह नहीं सोचा था कि इतने महीनों से न बात की, न हाल पूछा… माँ क्या सोचेंगी?



माँ कहाँ थीं?

ड्राइवर ने कहा—

“सर, हम पते पर पहुँच गए।”


राघव नीचे उतरा और हैरान रह गया।

यह कोई वृद्धाश्रम नहीं था, जैसा वह सोच रहा था।

यहाँ तो चारों तरफ बच्चे खेल रहे थे।

फिर उसने बोर्ड देखा—


“आशा बाल गृह – अनाथ बच्चों का घर”


राघव को समझ ही नहीं आया कि माँ यहाँ क्या कर रही होंगी।

वह अंदर गया और पूछा—


“मीरा जी यहाँ रहती हैं?”


एक छोटे बच्चे ने उत्साहित होकर कहा—

“अंकल, वो हमारी मीरा दीदी हैं! मैं ले चलता हूँ।”


राघव उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।



कमरे में माँ बैठी थीं। उनके सामने तीन-चार बच्चे बैठे थे और माँ कहानी सुना रही थीं।

उसका दिल पिघल गया… माँ कितनी शांत और सुकून में दिख रही थीं।


बच्चा बोला—

“मीरा दीदी, कोई मिलने आया है!”


माँ ने पीछे पलटकर देखा…

वो राघव था।


“अरे राघव! तू कब आया? सब ठीक है ना? कीर्ति कैसी है? बच्चे कैसे हैं?”


राघव की आँखें भर आईं।

“माँ… आप मुझे छोड़कर यहाँ क्यों आ गईं? बताया भी नहीं… नाराज़ थीं न?”


माँ मुस्कुराईं—

“बेटा, माँ अपने बच्चों से नाराज़ होती है क्या?”



माँ ने क्यों छोड़ा घर?


माँ ने धीरे से कहा—

“गाँव में अकेलापन बहुत था बेटा। एक दिन अख़बार में देखा कि इस अनाथालय को एक देखभाल करने वाली दीदी की ज़रूरत है।

मैं यहाँ आकर बच्चों से मिली…

उनके भोले चेहरे देखे और मन पिघल गया।

सोचा—अगर मैं इन्हें थोड़ा स्नेह दे सकूँ, थोड़ा पढ़ा सकूँ… तो जीवन सार्थक होगा।

यह लोग मुझे रहने की जगह देते हैं, भोजन देते हैं और इज़्ज़त भी देते हैं।

और यहाँ मैं अकेली भी नहीं रहती… ये सब मेरे बच्चे हैं।”


राघव ने काँपती आवाज़ में कहा—

“माँ… मैं आपको लेने आया हूँ। शहर चलिए मेरे साथ। मुझे आपकी जरूरत है… बच्चे भी आपको चाहते हैं।”


माँ कुछ क्षण चुप रहीं…

फिर बोलीं—


“राघव बेटा, तुम्हें अभी मेरी जरूरत है… लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाएँगे, जब कीर्ति का काम आसान हो जाएगा… तब?

क्या तब फिर मुझे अकेला छोड़ दोगे?

क्या मैं फिर बोझ बन जाऊँगी?”


राघव के पास कोई जवाब नहीं था।

उसकी आँखें भर आईं।

वह माँ को बस देखता रह गया।



माँ ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“बेटा, मैं यहाँ खुश हूँ।

इन बच्चों को मेरी जरूरत है।

मैं बूढ़ी ज़रूर हूँ, पर अब भी किसी के काम आना चाहती हूँ।

तू चिंता मत कर।

मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।”


फिर माँ ने धीरे से कहा—

“और हाँ… जब सच में तुम्हें मेरी जरूरत हो, भाव से, प्यार से…

तब आकर ले जाना।

ज़रूरत के वक़्त ही याद करने से रिश्ते नहीं चलते बेटा।”


यह कहकर माँ

 अपनी कक्षा की ओर चली गईं।

राघव उन्हें जाते हुए देखता रहा…

और पहली बार समझ पाया कि

माँ का शरीर थक सकता है, लेकिन उसका दिल टूट जाए—तो वह सबसे बड़ा दर्द होता है।


#MaaKaDil #RishteSachBolteHain




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