पिता की चिट्ठी
रात के करीब 11 बज चुके थे। ऑफिस से लौटते वक्त फिर से देर हो गई थी। रास्ते में ट्रैफिक का जाम और ऊपर से बॉस की लेट मीटिंग — बस यही रोज़ का बहाना बन गया था अब।
घर पहुंचते-पहुंचते दरवाज़े पर लाइट बंद थी। डोरबेल दबाई तो कुछ देर बाद अंदर से बेटे आर्यन की आवाज़ आई —
"कौन है?"
"मैं हूं बेटा, पापा।"
दरवाज़ा खुला तो वो आंखें मलते हुए बोला,
"पापा, इतनी रात हो गई। मम्मी तो सो गई हैं। खाना फ्रिज़ में रखा है।"
मैंने सिर हिलाया —
"ठीक है, तुम जाओ सो जाओ।"
वो पल भर के लिए रुका, फिर बोला,
"कल जल्दी आना पापा, मेरे स्कूल में ड्रॉइंग कंपटीशन है।"
"हाँ बेटा, जरूर।" मैंने बस यूं ही कह दिया।
वो मुस्कराकर अंदर चला गया। मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा — जैसे किसी सन्नाटे में खुद को तलाश रहा हूं।
रसोई में जाकर खाना गरम करने की हिम्मत नहीं हुई। प्लेट में ठंडी रोटियाँ और सब्ज़ी वैसे ही पड़ी थीं। मैंने फ्रिज़ का दरवाज़ा खोला तो अंदर एक टिफ़िन रखा था। उस पर एक छोटा-सा कागज़ चिपका था, जिस पर लिखा था — “रवि के लिए”।
पत्नी ने अब नाम लेना भी छोड़ दिया था, सिर्फ़ जिम्मेदारी निभा रही थी — जैसे घर की बाकी चीज़ें निभाती है।
सोफे पर बैठा था कि अचानक मेज पर एक पुरानी फ़ाइल नज़र आई। मैंने खोली तो अंदर एक पीली पड़ चुकी चिट्ठी रखी थी।
ऊपर लिखा था — "बेटे रवि के नाम — पापा की आख़िरी चिट्ठी"।
दिल धक से रह गया।
पिताजी को गुज़रे पूरे आठ साल हो गए थे। शायद मां ने ये फाइल संभालकर रखी थी। मैं कभी खोल ही नहीं पाया था।
कांपते हाथों से चिट्ठी खोली —
**“रवि,
मुझे नहीं पता जब तू ये चिट्ठी पढ़ेगा तो मैं रहूंगा या नहीं। लेकिन एक बात कहना चाहता हूं —
बेटा, ज़िंदगी का असली सुख पैसे में नहीं, अपनेपन में है।
जब तू छोटा था, मैं रोज़ तुझे साइकिल पर बिठाकर स्कूल छोड़ने जाता था। तब लगता था कि तू बड़ा होकर मुझे गर्व देगा। तू दिया भी — आज तेरे नाम पर पूरी कंपनी चलती है। लेकिन बेटा, उस दिन जब तू दिल्ली चला गया था नौकरी के लिए, तब से घर में एक सन्नाटा उतर आया था।
तू फोन करता है, पर तेरी आवाज़ में वो अपनापन नहीं रहता। जैसे हर बात जल्दी में कह रहा हो।
तेरी मां तुझसे बहुत प्यार करती है, लेकिन तुझे फोन नहीं करती, क्योंकि कहती है कि ‘बेटा व्यस्त होगा।’
रवि,
एक दिन जब तू पिता बनेगा, तब समझेगा कि अपने बच्चों के साथ बिताया हर मिनट कितनी बड़ी पूंजी होती है।
अगर मैं ना रहूं, तो तेरी मां का ध्यान रखना।
और जब कभी बहुत थक जाए ना, तो बस मां के हाथ की बनी चाय याद कर लेना — वही ज़िंदगी का असली स्वाद है।”
तुम्हारा
पापा”
मेरी आंखें भर आईं। इतने साल बीत गए थे, पर ये शब्द ऐसे चुभे जैसे कल ही बोले गए हों।
मैं सोचने लगा —
पापा ने कभी शिकायत नहीं की, पर मैं ही हमेशा भागता रहा।
मां के जाने के बाद मैं और भी अकेला हो गया था, पर कभी समझ नहीं पाया कि वो खालीपन पैसे नहीं भर सकते।
सुबह जब आंख खुली तो पहली बार घर में सन्नाटा अच्छा नहीं लगा।
पत्नी रसोई में थी। बेटे की आवाज़ आई —
“मम्मी, पापा स्कूल छोड़ने चलेंगे ना आज?”
वो हिचकिचाई —
“बेटा, पापा तो बहुत व्यस्त रहते हैं…”
मैंने बीच में कहा —
“नहीं, आज मैं चलूंगा।”
आर्यन की आंखों में चमक आ गई।
“सच पापा?”
“हाँ बेटा, अब हर शनिवार मैं तुम्हारे साथ स्कूल जाऊँगा।”
वो भागकर आया और मेरे गले लग गया।
पत्नी भी चुपचाप मुस्कराई।
उस दिन ऑफिस जाने में देर हुई, पर दिल को सुकून था।
रास्ते में मैंने पापा की चिट्ठी फिर से निकाली, और मोबाइल पर मां की एक पुरानी फोटो देखी।
अचानक लगा जैसे वो दोनों मेरे साथ बैठे हों, और कह रहे हों —
“अब समझ आया बेटा, घर ही असली जगह है।”
सीख:
हम अक्सर ज़िंदगी में वो सब पाने की दौड़ में रहते हैं
जो ज़रूरी नहीं,
और जो सच में ज़रूरी होता है — परिवार, समय और अपनापन — उसे खो देते हैं।
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