बहू का स्वाद
“अरे रीना! फिर वही बेस्वाद दाल बना दी तूने? ये हाथों में नमक की समझ कब आएगी तुझे?”
रसोई से निकलती हुई सासु माँ ने ताने के अंदाज़ में कहा।
रीना मुस्कुरा कर बोली,
“माँ जी, आज डॉक्टर ने कहा है कि आपको नमक थोड़ा कम खाना चाहिए, इसलिए…”
“ओह! तो तू अब डॉक्टर से ज़्यादा समझदार हो गई? अरे बेटा, उम्र हमारी है, शरीर हमारा है, तू चिंता मत कर। बस खाना ठीक से बना।”
रीना चुप रही। उसने बस सिर झुका कर सब्ज़ी में करछी चलानी शुरू कर दी।
रवि, जो उसी समय ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था, आवाज़ सुनकर रसोई में आया —
“माँ, अब बस भी करो। रीना दिनभर काम करती है, थोड़ा तो आराम से बोलो।”
“अरे तू बीच में मत बोल बेटा, आजकल की बहुएँ कुछ सीखती नहीं और उल्टा सिखाने चली आती हैं।”
इतना कहकर सासु माँ झल्लाते हुए बाहर चली गईं।
रीना ने एक हल्की साँस ली और धीरे से बोली,
“मैं तो चाहती थी कि माँ का ब्लड प्रेशर बढ़े नहीं… लेकिन शायद मेरा ही बढ़ जाएगा।”
रवि मुस्कुरा दिया।
“चलो, मैं चलता हूँ, टिफिन दे दो।”
रीना ने झटपट टिफिन पैक किया। आज उसने सब्ज़ी में हल्का नमक रखा था और साथ में थोड़ा सा आचार रख दिया था ताकि स्वाद बना रहे। रवि को भी हल्का खाना पसंद नहीं था, लेकिन उसने कुछ कहा नहीं — शायद इसलिए कि सुबह-सुबह लड़ाई नहीं चाहता था।
हर दिन का वही सिलसिला..
रीना की शादी को अभी छह महीने हुए थे। शुरू-शुरू में उसने बहुत कोशिश की कि घर के हर सदस्य की पसंद-नापसंद समझे। पर हर बार कुछ न कुछ गलती निकल ही जाती।
कभी दाल पतली होती, कभी रोटी ज्यादा सिक जाती, कभी सब्ज़ी में मसाला “ज्यादा” या “कम” हो जाता।
और जब-जब रीना कुछ नया बनाती, तो घर में मानो भूचाल आ जाता।
“हमारे घर में ये सब नहीं चलता।”
“इतनी बड़ी-बड़ी रेसिपी मत बना, सीधा-सादा खाना बना।”
धीरे-धीरे रीना ने कोशिश छोड़ दी। वही पुराने तरीके, वही रुटीन खाना। लेकिन मन तो किसी का भी कभी-कभी नया स्वाद चाहता ही है।
वो रविवार की सुबह...
उस दिन रविवार था। सब लोग घर पर थे। रीना ने सोचा,
“आज कुछ नया बना देती हूँ — पास्ता!”
रवि ने मुस्कुरा कर कहा,
“वाह! कई दिनों बाद कुछ अलग।”
पर जैसे ही सासु माँ ने देखा कि रसोई में कुछ गोरे रंग की चीज़ उबल रही है, उन्होंने पूछा —
“ये क्या बना रही है तू?”
“माँ जी, पास्ता... सबके लिए।”
“पास्ता! हे भगवान! ये सब अंग्रेज़ी खाने हमारे घर में?”
“माँ जी, बस एक बार चखकर देखिए, अच्छा लगेगा।”
“मुझे तो रोटी-सब्ज़ी ही चाहिए, ये सब बच्चों के खाने हैं।”
रवि बीच में बोला,
“माँ, एक दिन कुछ अलग खा लेने से क्या होगा?”
“तू भी अब अपनी बीवी के रंग में रंग गया है,” सासु माँ ने गुस्से से कहा और कमरे में चली गईं।
रीना चुप रही, लेकिन उस दिन पहली बार उसने अपने लिए प्लेट में पास्ता डाला और बालकनी में जाकर खा लिया।
थोड़ी देर में रवि भी आया और बोला,
“सच कहूँ, बहुत स्वादिष्ट है।”
रीना मुस्कुरा दी — “कम से कम किसी को तो अच्छा लगा।”
अगले हफ़्ते जब मोहल्ले की औरतें घर आईं, तो उनमें से एक बोली —
“बहन जी, कल आपकी बहू ने जो पास्ता दिया था, बहुत मज़ेदार था।”
सासु माँ ने हैरान होकर पूछा — “पास्ता?”
“हाँ हाँ, उसने कल मंदिर में बच्चों को दिया था। सब बच्चे खुश थे।”
सासु माँ को पहली बार थोड़ा गर्व हुआ कि उनकी बहू कुछ अच्छा करती है।
शाम को उन्होंने खुद रीना से पूछा —
“वो पास्ता कैसे बनाती है तू?”
रीना चौंकी, “माँ जी, सिखा दूँ क्या?”
“हूँ… हाँ, एक बार बना कर दिखा।”
उस दिन रीना ने फिर वही पास्ता बनाया, इस बार सासु माँ के साथ।
उन्होंने भी चखा और बोलीं,
“अरे, ये तो सच में बुरा नहीं है।”
रवि हँस पड़ा — “अब माँ जी को भी पास्ता पसंद आ गया!”
सासु माँ ने हँसते हुए कहा,
“कभी-कभी बदलाव भी अच्छा होता है बहू।”
रीना के चेहरे पर सच्ची मुस्कान आई।
उस दिन उसे लगा कि उसकी मेहनत आखिरकार रंग लाई।
अब घर में हफ़्ते में एक दिन “रीना डे” होता था — जिस दिन वो अपनी पसंद का खाना बनाती थी।
सासु माँ भी अब कह देतीं,
“देखो आज बहू क्या नया बना रही है।”
रीना के लिए वो दिन किसी जीत से कम नहीं था।
क्योंकि उसे पता था
स्वाद सिर्फ खाने में नहीं होता, रिश्तों में भी होता है। बस थोड़ा समझ, थोड़ा अपनापन और थोड़ा बदलाव चाहिए।
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