माँ का कमरा
तीन महीने बीत चुके थे, फिर भी माँ के फोन नहीं आए थे। पहले तो रोज़ आती थीं — सुबह, दोपहर, शाम — किसी न किसी बहाने। कभी पूछतीं, “खाना खाया बेटा?” तो कभी कहतीं, “नई रेसिपी बताऊँ?”
अब मोबाइल की स्क्रीन पर उनका नाम दिखे, ऐसा भी महीनों से नहीं हुआ था।
कब तक माँ को मैं अपने साथ रख पाता! शादी के बाद घर की जगह छोटी लगने लगी थी, और मीरा — मेरी पत्नी — साफ़-साफ़ कह चुकी थी कि “माँ को यहाँ रखना आसान नहीं होगा, उनकी दवाइयाँ, उनका चलना-फिरना... सब बहुत झंझट है।”
मैं जानता था, मीरा गलत नहीं थी, बस थोड़ी व्यावहारिक थी। और सच कहूँ तो, मैं खुद भी इसी “व्यावहारिकता” में सुकून खोजने लगा था।
इसलिए, माँ को छोटे भाई दीपक के घर भेज दिया गया था — कुछ महीनों के लिए। वैसे भी हम तीन भाई थे, तो तय किया गया था कि माँ हर चार महीने में एक घर में रहेंगी।
हमने इसे “बराबरी” का नाम दिया था।
आज ऑफिस से लौटते वक्त गाड़ी में बैठा, तो सड़क किनारे वही बुजुर्ग महिला दिखीं — सफ़ेद बाल, झुकी कमर, और एक छोटे बच्चे का हाथ पकड़े मुस्कुरा रही थीं।
उन्हें देखकर अनजाने में मन में हलचल हुई — माँ भी अब ऐसी ही हो गई होंगी… पतली, झुकी हुई, पर मन से उतनी ही मज़बूत।
घर पहुँचा तो मीरा ने कहा, “तुम्हारी माँ ने फोन किया था। कह रही थीं, दीपक के बच्चों की परीक्षा चल रही है, तो वो परेशान हैं। शायद माँ को कुछ दिन और वहीं रहना पड़े।”
मीरा के स्वर में कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि राहत थी।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप अपने कमरे में चला गया। माँ की पुरानी फ़ोटो देखता रहा — एक में वह मुझे स्कूल भेज रही थीं, दूसरी में मेरे साथ पहली साइकिल की सवारी कर रही थीं।
रात में नींद नहीं आई। सोचा, कल माँ से बात करूँगा।
अगले दिन सुबह-सुबह ऑफिस पहुँचते ही फोन मिलाया। उधर से दीपक की पत्नी रजनी ने उठाया, “भैया, माँ अभी सो रही हैं। रात में थोड़ी तबियत खराब थी।”
“क्या हुआ?”
“कुछ खास नहीं, बस कमजोरी है। उम्र भी तो हो गई है न।”
वो बातें कहकर जल्दी से फोन रख दिया।
मेरा मन काम में नहीं लग रहा था।
दोपहर को मैंने छुट्टी ली और ट्रेन की टिकट बुक कराई।
रात की ट्रेन थी। गाड़ी चली, तो बचपन की सारी यादें आँखों के सामने घूमने लगीं —
माँ कैसे मुझे रोज़ पढ़ाई कराती थीं, रात को देर तक मेरा इंतज़ार करती थीं, और जब मैं बीमार पड़ता था तो दिन-रात मेरे सिरहाने बैठी रहती थीं।
माँ का कमरा, जो पहले पूरे घर का दिल था — अब किसी के हिस्से में नहीं था।
सुबह जब मैं दीपक के घर पहुँचा, माँ खिड़की के पास चारपाई पर बैठी थीं। धूप की एक पतली किरण उनके चेहरे पर पड़ रही थी।
मुझे देखते ही बोलीं —
“आ गए बेटा? अब तो बहुत बड़े आदमी बन गए हो... पर चेहरे पर वो मुस्कान नहीं रही।”
मैं चुप था। बस सिर उनके गोद में रख दिया।
माँ के हाथ काँप रहे थे, पर उनका स्पर्श अब भी वैसा ही था — सुकून देने वाला।
“माँ, अब आप मेरे साथ चलिए।”
“नहीं बेटा, अब मेरा क्या है? मैं यहाँ ठीक हूँ।”
मैंने उनके हाथ थाम लिए —
“नहीं माँ, अब आपके लिए अलग कमरा नहीं होगा। आपका कमरा अब मेरे दिल में होगा।”
माँ की आँखों से आँसू बह निकले।
धीरे से बोलीं —
“मुझे पता था, मेरा बेटा एक दिन ज़रूर समझेगा।”
अगले दिन मैं माँ को लेकर वापस लौट आया।
मीरा ने जब दरवाज़ा खोला, तो माँ को देखकर कुछ क्षण के लिए चुप रह गई। फिर धीरे से बोली, “माँ, अंदर आइए।”
वो लम्हा मेरे जीवन का सबसे सुकून भरा था।
आज माँ के कमरे से फिर वही खुशबू आती है — पूजा की, दवाइयों की, और स्नेह की।
अब जब माँ मुस्कुराती हैं, तो लगता है घर फिर से घर बन गया है।
संदेश:
कभी-कभी "बराबरी" के नाम पर हम ममता को बाँट देते हैं,
पर बुज़ुर्गों का प्यार हिस्सों में नहीं बँटता —
वो तो पूरा दिल माँगता है।
#माँका_कमरा #रिश्तोंकी_गर्माहट

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