दो कमरों का घर… और छोटी बहू की बड़ी सोच

 

ससुर जी दोनों बहुओं को सोने के कंगन देते हुए, छोटी बहू भावुक और हैरान दिख रही है।


रोज़ की तरह सुबह के साढ़े सात बजे अलार्म बजने लगा था,

पर आज नीलम उससे पहले ही जाग गई थी।

बिना कुछ बोले फटाफट काम निपटाकर वो सामान पैक करने में लगी थी।


तभी उसकी नज़र अपने पति अमन पर पड़ी—

जो अभी भी कंबल ओढ़कर मज़े से सो रहा था।


नीलम बड़बड़ाने लगी— "इनको तो किसी चीज़ की चिंता ही नहीं!

बस सोते रहो… दुनिया जाए भाड़ में!"


बड़बड़ाते हुए नीलम ने अमन को जोर से हिलाया।

अमन चौंक कर उठ बैठा—


"क्या हुआ? भूकंप आया क्या?"


"भूकंप तुम्हारे दिमाग में आएगा!

साढ़े सात बजे जा रहे हैं और तुम्हें छोड़ना है मुझे स्टेशन तक!"


"स्टेशन? तुम कहाँ जा रही हो?"


"अरे अमन! भूल गए क्या?

पापा जी की अंतिम नौकरी वाला महीना चल रहा है।

इस बार उनकी विदाई में मैं भी रहूँगी।"


अमन ने उत्सुकता से पूछा— "पर तुम तो कभी वहाँ दो घंटे रुक नहीं पाती।

अब अचानक पाँच–छह दिन की बात कर रही हो?"


नीलम ने नज़रें चुराते हुए कहा— "हाँ तो? अब बदल नहीं सकती क्या?"


अमन को कुछ तो गड़बड़ लगी, पर चुप रहा।



नीलम के मन की बात…


नीलम के मन में पिछले कुछ दिनों से एक ही बात घूम रही थी—

अमन ने बताया था कि इस बार उसके पापा को रिटायरमेंट पर अच्छी–खासी रकम मिलने वाली है।


नीलम ने सोचा— "पैसा तो बहुत आएगा…

और मेरी जेठानी चुपचाप सब हाथ में ले लेगी।

मैं बेवकूफ थोड़ी हूँ!"


इसी “डर” में वह इस बार जाने को तैयार हुई थी।



ससुराल की ओर…


ट्रेन पकड़कर नीलम ससुराल पहुँची।

जहाँ वो पहले कमरे में छुपकर बैठ जाती थी,

आज सबको मुस्कान देकर नमस्ते कर रही थी।


सब हैरान थे।

जेठानी भी सोचने लगी—

“आज ये इतनी मीठी क्यों है?”


अगले तीन–चार दिन नीलम ने पूरी चाल चली—


• सासू माँ के पैर दबाना

• खाना बनाने में हाथ बँटाना

• बच्चों को पार्क ले जाना

• जेठानी को आराम करने कहना


पर उसके लाख कोशिशों के बाद भी

उसे पैसे वाली कोई बात पता नहीं चल पाई।



रिटायरमेंट का बड़ा दिन…


घर में रौनक थी। रिश्तेदार आए हुए थे।

ससुर जी की विदाई बहुत शान से हुई।

गिफ्ट, फूल, शुभकामनाएँ—सबकुछ बेहतरीन।


और नीलम बस एक ही बात सोच रही थी—


"अब तो पिताजी पैसों का ज़िक्र करेंगे…

बस मौका मिला तो पूछ ही लूँगी!"



अगली सुबह… सच सामने आया


अगले दिन ससुर जी ने सबको कमरे में बुलाया—


"बच्चो, मुझे आज एक जरूरी बात करनी है।"


नीलम का दिल धक-धक करने लगा।


ससुर जी बोले—


"आख़िरकार 36 साल बाद आज मैं चैन की साँस ले पाया हूँ।

रिटायरमेंट की जो रकम मिली है…

उसमें से आधी रकम से मैं और तुम्हारी माँ अपना सपना पूरा करेंगे।

हम दोनों तीर्थयात्रा पर जाएंगे—

काशी, बद्रीनाथ, दक्षिण के मंदिर… सब!"


नीलम का चेहरा गिरने लगा।


ससुर जी आगे बोले—


"और बची हुई राशि…

मैं अपने दोनों बेटों में बाँटना चाहता था,

पर इन्होंने साफ मना कर दिया।

कहा—

‘पापा, आपने हमें काबिल बना दिया।

ये पैसा आप अपने ऊपर खर्च कीजिए।’"


नीलम ने अमन को देखा—

वो गर्व से मुस्कुरा रहा था।


ससुर जी ने दो डिब्बे निकाले—


"इसलिए मैंने सोचा…

मैं अपनी बहुओं को अपनी तरफ से एक छोटा-सा तोहफ़ा दूँ।

ये सोने की चूड़ियाँ…

मेरी दोनों बेटियों के लिए।"


जेठानी ने खुशी से चूड़ियाँ ले लीं।

नीलम ने भी मुस्कुरा कर ले तो लिया,

लेकिन उसके अंदर मानो सब टूट गया।




कमरे में लौटकर नीलम चुप बैठी थी।

अमन धीरे से पास आया—


"क्या हुआ? इतनी चुप क्यों हो?"


नीलम की आँखें भर आईं।


"अमन…

मैं यहाँ किस सोच से आई थी…

और पापा जी ने कितनी बड़ी सोच दिखाई।

मैंने कभी सोचा ही नहीं था

कि जिस घर को मैं बोझ समझती हूँ,

वहीं इतना प्यार है।"


अमन मुस्कुराया—


"घर पैसे से नहीं चलता नीलम…

नियत से चलता है।"


नीलम के आँसू निकल पड़े।

उसे समझ आ गया था—

वो पैसा नहीं, रिश्ते खोने से

 बच गई है।



कहानी का संदेश:


रिश्ते विश्वास से चलते हैं,

लालच से नहीं।

पैसा कभी परिवार नहीं बनाता,

पर परिवार आपको लाख मुश्किलों से बचा सकता है।


#FamilyEmotion #SaasBahuStory



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