अनकही मुलाक़ात

 

अस्पताल के बेड पर बेहोश पड़ी 18 साल की लड़की का क्लोज़-अप, पास में बैठी मासी उसका हाथ पकड़े रो रही है।


जीवन में कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो वक्त के साथ मिटते नहीं, बस हमें भीतर से खोखला करते रहते हैं।

मेरे दिल में भी एक ऐसा ही दर्द है — अपनी भांजी अनन्या से आख़िरी बार न मिल पाने का।


अनन्या…

हम सबकी चहेती, मुस्कुराती हुई, हमेशा खिलखिलाती रहने वाली लड़की।

घर की सबसे छोटी… पर हिम्मत सबसे बड़ी।


बारहवीं के बाद उसे शहर से बाहर कोटा भेज दिया गया। डॉक्टर बनना उसका सपना था।

बड़े लोग कहते — “वो तो पढ़ाई में डूब जाएगी… किसी को याद भी नहीं करेगी।”

पर सच इससे बिलकुल उलट था।


अनन्या की दुनिया सिर्फ पढ़ाई नहीं थी…

उसकी दुनिया थी मां, और थोड़ी-सी मैं।


वो हर रात वीडियो कॉल करती…

“मासी, बस एक साल है… आप आओगी न मिलने?”

पर हर बार या तो मेरा काम आ जाता या वो पढ़ाई में व्यस्त रहती।

मुलाक़ात कभी हो ही नहीं पाई।


धीरे-धीरे कोटा की जिंदगी उस पर बोझ बनने लगी।

हर दिन वही हॉस्टल का कमरा, वही क्लास, वही नोट्स…

कभी-कभी उसकी आवाज़ में थकान साफ सुनाई देती—


“मासी… यहां बहुत अकेलापन है। काश आप पास होतीं।”


मैं हर बार उसे दिलासा देती,

“बस कुछ महीनों की बात है बेटा… फिर जब डॉक्टर बनोगी, कितने लोग तुम पर गर्व करेंगे।”


लेकिन शायद मैं उसकी थकान समझ ही नहीं पाई।




अचानक एक दिन…


हमारे यहां एक शादी थी।

मैंने सोचा इस बार अनन्या को चौंकाते हैं…

मैं और पति उसके लिए उसकी पसंद की ढेर सारी चीजें लेकर कोटा पहुंच गए।


हॉस्टल पहुंचकर पता चला —

वो एक दिन पहले ही परीक्षा खत्म होने पर घर निकल गई थी।


दिल भारी हो गया।

हम वापस होटल लौट आए।


रात 8 बजे फोन आया—

अनन्या का एक्सीडेंट हो गया है…

स्थिति नाजुक है… तुरंत आ जाइए।


मेरे हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा।

मैं घबराहट में बस भगवान से यही प्रार्थना करती रही—


“कृपा करना… बस उसे बचा लेना…”


सफर के दौरान मैंने उसका आख़िरी मैसेज देखा—


“मासी, आखिर कोटा की जेल से छुट्टी मिल गई… घर आ रही हूँ। बहुत खुश हूँ।”


उसके साथ एक चमकती हुई मुस्कुराती स्माइली।


मेरी आंखों में न जाने कितनी बार आंसू भर आए।



अस्पताल में…


जब कमरे में पहुंची,

अनन्या सफेद बिस्तर पर शांत पड़ी थी।

चेहरा बिल्कुल वैसा ही था — मासूम, नील सा चमकता।


कहीं कोई खरोंच तक नहीं थी।

पर डॉक्टरों ने बताया—


“सिर के अंदरूनी हिस्से में चोट है… ब्रेन में हैमरेज… कोमा में है।”


मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अनन्या… मासी आ गई है बेटा… उठो…”


मैं घंटों उसके पास बैठी रही,

उसके बाल सहलाती,

उससे बातें करती रही…


पर वो नहीं उठी।



और फिर…


अचानक उसकी उंगलियों में हल्की-सी हरकत हुई…

एक तेज झटका…

और सब शांत।


डॉक्टरों ने सिर झुका लिया।


अनन्या…

सबकी प्यारी अनन्या…

चली गई।


उसका आख़िरी मैसेज फिर याद आया—

“जेल से छुट्टी मिल गई मासी…”


काश…

वो कोटा की जेल थी,

ना कि ये जिंदगी की जेल।


सिर्फ 18 साल की उम्र में…

जब उसे दुनिया देखनी थी…

सपने पूरे करने थे…

जब उसके पंख बस खुल ही रहे थे…


वो उड़ान भरने से पहले ही…

हमेशा के लिए चुप हो गई।



आज भी…


जब भी कोटा का नाम सुनती हूँ,

दिल में एक दर्द उठता है।

वो अधूरी मुलाक़ात…

वो आखिरी वीडियो कॉल…

वो मासूम मुस्कान…


सब कुछ दिल में चुभता रहता है।


अनन्या का न मिल पाना,

मेरे दिल का एक ऐसा दर्द बन गया है

जो शायद जिंदगी भर साथ रहेगा।

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