पुरानी डायरी का आख़िरी पन्ना
रात के ठीक 1:47 बजे फोन की घंटी बजी।
वृद्धाश्रम के वार्ड में ड्यूटी पर बैठी नर्स अनु चौंक पड़ी।
इतनी रात में कॉल?
आमतौर पर आधी रात को सिर्फ दवा की अलार्म होती है, कोई मरीज नहीं।
लाइन उठाते ही वार्ड बॉय की घबराई हुई आवाज़ आई—
“मैडम… जल्दी आ जाइए… कमरा नंबर 7 में कुछ गड़बड़ है।”
अनु ने फाइल बंद की, स्टेथोस्कोप उठाया और तेज क़दमों से गलियारे में बढ़ गई।
गलियारा शांत था, सिर्फ ट्यूबलाइट की हल्की झनकार और दूर से आती कुत्तों की आवाज़।
कमरा नंबर 7 का दरवाज़ा आधा खुला था—ये बात ही असामान्य थी, क्योंकि उस कमरे में जो रहती थीं… वह हमेशा दरवाज़ा अंदर से बंद रखती थीं।
वो कमरा— जहां 82 साल की मालती देवी रहती थीं।
अनु ने जैसे ही दरवाज़ा धकेला, उसके पैर थम गए।
कमरे की दीवारें लाल रौशनी में डूबी थीं।
टेबल लैंप के नीचे एक पुरानी डायरी खुली पड़ी थी।
और दीवार पर काले चारकोल से सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“आख़िरी हिसाब आज पूरा होगा।”
अनु का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
कुछ कदम आगे बढ़कर उसने देखा…
मालती देवी पलंग पर लेटी थीं—साँस बंद, चेहरा शांत, लेकिन आँखें आधी खुली हुईं… जैसे किसी को आते देखते-देखते सो गई हों।
उनके हाथ में वही डायरी थी—जिसे वह हमेशा अपने तकिये के नीचे छुपाकर रखती थीं।
कमरा अजीब-सा ठंडा था।
अनु ने धीरे से फुसफुसाया—
“मालती दादी…?”
पर जवाब तो आना ही नहीं था।
छह महीने पहले...
मालती देवी को उनके दोनों बेटों ने यहाँ छोड़ा था—
बड़ा बेटा राजेश, छोटा महेश।
दोनों शहर में रहते थे, दोनों कमाते थे, दोनों के पास सब सुविधाएँ थीं…
बस माँ के लिए जगह नहीं थी।
उन्होंने वही पुरानी लाइन दोहराई—
“माँ, यहाँ आपकी अच्छी देखभाल होगी। आप आराम करेंगे। हम हर हफ्ते मिलेंगे।”
लेकिन मालती देवी जान गई थीं—
अब वह किसी के घर का हिस्सा नहीं, बोझ बन चुकी हैं।
उन्होंने विदा लेते समय सिर्फ इतना पूछा था—
“जाते-जाते एक बार पीछे मुड़कर देखोगे…? बस इतना काफी होगा।”
पर दोनों जल्दी में थे।
किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वृद्धाश्रम की दिनचर्या..
मालती देवी कम बोलतीं, ज्यादा लिखतीं।
उन्होंने दूसरों से बातचीत बंद कर दी थी।
बस अकेले बैठकर पुरानी डायरी में शब्द लिखती रहतीं।
अनु ने कई बार पूछा—
“दादी, क्या लिखती रहती हो?”
वह मुस्कुरातीं—
“कभी खोई बातें, कभी खाली रिश्ते… जिनके जवाब किसी के पास नहीं होते।”
मालती देवी हर शाम खिड़की के पास बैठतीं और धीरे से कहतीं—
“आज आए होंगे… शायद ट्राफिक में फँस गए होंगे।”
अनु अक्सर सोचती— कैसा विश्वास है, जो टूटने के बाद भी ज़िंदा रहता है?
एक दिन अनु कमरे की सफाई कर रही थी, तभी उसे अलमारी में एक पुराना डिब्बा मिला।
जिसके ऊपर लिखा था—
“किसी अपने के नाम नहीं।”
अनु ने खोलने की कोशिश की…
पर वह बंद था।
मालती देवी ने दूर से देखते हुए कहा—
“मत खोलो। कुछ दरवाज़े तब ही खुलते हैं, जब दिल में जगह बची हो।”
अनु चुप हो गई।
मौत से एक दिन पहले..
मालती देवी बहुत बेचैन थीं।
उन्होंने अनु को बुलाकर कहा—
“मेरी डायरी का आख़िरी पन्ना मैं आज लिखूँगी… तुम चाहो तो कल पढ़ लेना।”
अनु ने पूछा—
“दादी, क्या लिख रही हो?”
मालती देवी ने गहरी आवाज़ में कहा—
“सच। इतना बड़ा कि शायद मेरे बेटे उसे पढ़ भी न पाएँ।”
रात में कमरे से हल्की खड़-खड़ाहट आती रही—
जैसे कोई चारकोल से दीवार पर लिख रहा हो।
अगला दिन – दोनों बेटे आए...
राजेश और महेश अगले दिन वृद्धाश्रम पहुँचे।
उनके चेहरों पर माँ को खोने का दर्द नहीं, बल्कि बस ‘नियम निभाने’ वाली ठंडी-सी नज़र थी।
राजेश बोला—
“माँ का सामान दे दीजिए। हमें जल्दी निकलना है।”
अनु ने शांत स्वर में कहा—
“उनका एक आख़िरी संदेश भी है… जो उन्होंने खासतौर पर आपके लिए छोड़ा है।”
दोनों चौंके।
डायरी का आख़िरी पन्ना खोलते ही दोनों की साँसें रुक गईं।
उसमें बड़े साफ अक्षरों में लिखा था—
**“मैंने तुम्हें भूख में खिलाया,
डर में छुपाया,
बीमारी में जगकर रातें काटी…
और तुमने मुझे अकेलेपन में मौत तक पहुँचाया।
अब हिसाब बराबर है।
मैं चली गई…
पर अपराध-बोध हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा।”**
दोनों के हाथ काँपने लगे।
उसी वक्त अनु ने दीवार की तरफ इशारा किया—
“ये भी उन्होंने लिखी है—
‘आख़िरी हिसाब आज पूरा होगा।’”
राजेश और महेश के चेहरे पीले पड़ गए।
दोनों लड़खड़ाने लगे।
महेश अचानक फर्श पर गिर पड़ा—सांस तेज़, दिल पर हाथ।
राजेश ने चीख़ा—
“भाभी… पानी… कोई बुलाओ!”
लेकिन कुछ ही मिनटों में वह भी गिर पड़ा।
डॉक्टर आए—
पर नतीजा साफ था।
दोनों की मौत एक ही समय, एक ही वजह से—
अत्यधिक भावनात्मक शॉक।
अंतिम सच...
कोई श्राप नहीं।
कोई आत्मा नहीं।
कोई जादू नहीं।
मारा उन्हें वही दर्द—
जिसे उन्होंने खुद अपनी माँ को दिया था।
मालती देवी की डायरी में पहला पन्ना लिखा था—
“माँ कभी नहीं मरती… वह बस दिल में जगह बदल लेती है।”
और आख़िरी पन्ना—
“कुछ रिश्ते आवाज़ नहीं देते… बस जवाब लेते हैं।”
वृद्धाश्रम में आज भी
वो कमरा खाली है।
दीवार पर काले चारकोल से लिखी वह लाइन आज भी वैसे ही बनी हुई है—जैसे समय ने उसे छूने की हिम्मत ही न की हो।”
“आख़िरी हिसाब आज पूरा होगा।”
कहा जाता है, रात को देर से उस कमरे से पन्नों के पलटने की आवाज़ आती है—
जैसे डायरी में कोई नया सच लिखा जा रहा हो।
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