एक पिता की आख़िरी ड्यूटी

 

अस्पताल के बेड पर लेटे एक बुज़ुर्ग पिता का भावुक क्लोज़अप, हाथ में पुराना बायोडाटा और आँखों में उम्मीद।


शाम के पाँच बज रहे थे।

कॉलेज की कैंटीन धीरे-धीरे खाली हो रही थी।

काउंटर पर बैठी कैशियर लड़की, रिद्धि, बिलों की गिनती में लगी थी कि तभी दरवाज़े पर धीमे-धीमे कदमों की आवाज़ आई।


उसने सिर उठाया तो देखा—

एक बूढ़ा आदमी, लगभग 65–68 साल का,

झुके कंधे, धूल से भरे पुराने जूते,

और हाथ में एक कपड़े का पुराना बैग लिए हुए…

साँसें जैसे थोड़ी भारी थीं।


रिद्धि ने चौंककर पूछा,

“जी… हाँ? आप किससे मिलना चाहते हैं?”


बूढ़े ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की,

“बेटा… कैंटीन मैनेजर से मिलना था… नौकरी के लिए।”


रिद्धि के हाथ रुक गए।

इतनी उम्र में नौकरी?


उसने तुरंत मैनेजर रोहन को बुलाया।


रोहन बाहर आया,

और सामने खड़े आदमी को देखकर कुछ पल के लिए चुप रह गया।

आदमी की आँखों में कोई चमक नहीं थी…

सिर्फ़ एक दबा हुआ डर,

जैसे कहीं से वापस भेज न दिया जाए।


रोहन ने नरमी से पूछा,

“बाबा, आपको किस तरह की नौकरी चाहिए?”


बूढ़ा धीरे से बोला,

“जो भी काम दे दोगे बेटा…

टेबल साफ़ करना… चाय पहुँचाना…

मैं सब कर लूँगा।

बस… काम मिल जाए।”


उसकी आवाज़ में कोई लालच नहीं था…

बस थोड़ी-सी इज़्ज़त माँगने की खामोश इच्छा।


रोहन ने कहा,

“पहले बैठिए बाबा।”


वह धीमे-धीमे कुर्सी पर बैठा,

बैग खोला…

और एक पुराना, मोड़-तोड़ वाला कागज़ निकाला।


“ये… मेरा बायोडाटा है बेटा।”


रोहन ने जब कागज़ खोला तो दिल थम गया—


नाम: रामलाल तिवारी

उम्र: 67 वर्ष

योग्यता: 8वीं पास

अनुभव:

– रेलवे स्टेशन पर 28 साल चाय बेचने की दुकान

– साफ़-सफ़ाई

– पैसे का हिसाब-किताब

– यात्रियों को पानी/चाय देना

दुकान बंद होने का कारण:

– मालिक का देहांत

– जगह खाली करवाई गई


और सबसे नीचे एक लाइन—


“मेरे बेटे की नौकरी छूट गई है।

बहू बीमार रहती है।

पोता कॉलेज जाना चाहता है… पर फीस नहीं भर पा रहे।

मैं बूढ़ा हूँ, पर बोझ नहीं बनना चाहता।

काम कर सकता हूँ।”


रोहन ने धीरे से पूछा,

“बाबा… आप यह उम्र में क्यों काम करना चाहते हैं? आराम करिए।”


बाबा की आँखें अचानक भर आईं।

“बेटा… आराम तब होता है जब घर में चूल्हा जलता रहे।

पोता पढ़ना चाहता है— बहुत मन लगाकर पढ़ता है।

हर बार फीस न भर पाने पर…

मैं उसे टूटते हुए देखता हूँ।”


उन्होंने काँपते हाथ से आँखें पोंछीं,

“बूढ़े हाथ कमाएँगे तो ही उसका भविष्य बनेगा।”


रिद्धि के गले में भी कुछ अटक गया।


रोहन ने उनसे पूछा,

“कहीं से मदद नहीं मिलती?”


रामलाल ने सिर झुका लिया,

“सरकारी मदद के लिए कहा था…

पर काग़ज़ कभी पूरे नहीं होते।

बेटा मेहनत करता है पर रोज़ का काम है…

कभी मिलता है, कभी नहीं।

बहू दमा की मरीज है… दवाइयाँ महँगी हैं।”


बाबा हँसने की कोशिश करते हैं,

पर आवाज़ थरथरा जाती है,

“बस बेटा… ज़िंदगी ने इतना समय दे दिया,

अब मैं भी उसे थोड़ी मदद दे दूँ।”


रोहन ने गहरी साँस ली।

फिर कैंटीन मालिक, सुजीत सर, के केबिन में गया।


पूरा किस्सा बताया।

सुजीत सर कुछ देर चुप रहे…

फिर बोले,


“रोहन, यह आदमी सिर्फ़ नौकरी नहीं मांग रहा…

अपनों के लिए आख़िरी साँस तक खड़े रहने का हौसला मांग रहा है।

उसे रख लेते हैं।

हल्का-फुल्का काम…

और हर महीने 2,000 का अतिरिक्त भत्ता देंगे…

जिसे ‘इंसेंटिव’ बताएँगे।

उसे दया नहीं, सम्मान चाहिए।”


रोहन बाहर आया।

रामलाल बाबा बेचैनी से दरवाज़े की तरफ देख रहे थे—

शायद डर रहे हों कि कहीं मना न कर दिया जाए।


रोहन मुस्कुराया,

“बाबा… आपकी नौकरी लग गई।”


रामलाल ने पहले सोचा मज़ाक होगा।

दो सेकंड बाद आँखों से पानी गिरने लगा।


“स…सच बेटा?

मैं काम कर सकता हूँ…

बहुत ईमानदारी से करूँगा।”


रिद्धि ने कहा,

“बाबा, अब आप हमारी कैंटीन के ‘रामलाल दादा’ हो।

हम सबका ख्याल रखना है।”


बूढ़ा हाथ जोड़ने लगा तो सबने रोक लिया।



अगले दिन…


बाबा अपने पुराने, मगर धुले हुए कुर्ते में आए।

जेब में किसी मंदिर की फूल-माला का सूखा तिनका रखा था।

शायद खुशकिस्मती के लिए।


उन्होंने

टेबल साफ़ किए,

नाश्ता बाँटा,

पानी रखा,

छात्रों से मुस्कुराकर बात की।


छात्र उन्हें “दादा” कहकर पुकारने लगे।


काम करते हुए कई बार हाथ काँपते…

पर दिल हमेशा मज़बूत दिखता।


कभी-कभी जेब से अपने पोते की मार्कशीट निकालकर देखते।

हर नंबर को प्यार से छूते,

जैसे कह रहे हों—

“देख, दादा तेरे लिए खड़ा है।”




पहली तनख्वाह — 7,500 + 2,000 इंसेंटिव...


रामलाल दादा ने लिफाफा खोला

तो आँखें भर आईं।


“बेटा…

इतने पैसे मैं कहाँ देखता था!

इससे तो घर चल जाएगा…

मेरे पोते की फीस भी भर जाएगी…”


रिद्धि मुस्कुराई,

“बाबा, यह आपके हक़ के पैसे हैं।

आप मेहनत करते हैं… इसी का फल है।”




तीन महीने बाद…


एक दिन दादा कैंटीन नहीं आए।

फोन करने पर पोते ने कहा,


“दीदी… दादा की तबीयत ख़राब है।

पापा उन्हें अस्पताल ले गए हैं।”


रिद्धि, रोहन और सुजीत सर तुरंत पहुँचे।


रामलाल दादा बेड पर लेटे थे।

ऑक्सीजन लगी थी,

पर उन्हें देखकर भी मुस्कुरा दिए।


“रोहन बेटा…

माफ़ करना…

आज कैंटीन नहीं जा पाया…”


रोहन की आँखें भर आईं,

“दादा… ऐसी क्या बात कर रहे हो?”


बाबा ने धीमे से कहा,

“आज मेरे पोते के कॉलेज की फीस भरनी थी…

डर था… कहीं देर न हो जाए…”


सुजीत सर ने उनका हाथ पकड़ा,

“दादा, आपकी फीस हम सुबह ही जमा कर आए।

आपकी चिंता हमने रख ली है।”


बाबा की आँखों से आँसू बह निकले।

“भगवान तुम सबको खुश रखे…

तुमने मुझे…

बूढ़ा नहीं…

एक पिता का कर्तव्य पूरा करने का मौका दिया…”


दो सेकंड बाद…

उनकी उँगलियों की पकड़ ढीली हो गई।


रामलाल दादा…

हमेशा के लिए चले गए।



उस दिन कैंटीन बंद रही।

कॉलेज ने घोषणा की:


“रामलाल तिवारी हमारे कर्मचारी नहीं…

परिवार का हिस्सा थे।”


कॉलेज प्रशासन ने तय किया—

उनके पोते की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी कॉलेज उठाएगा।


सुजीत सर ने उनके नाम पर एक फंड बनाया—

“रामलाल दादा शिक्षा सहायता कोष”

जिससे गरीब छात्रों की फीस भरी जाने लगी।



कभी-कभी लोग अपना परिचय काबिलियत से नहीं देते…

बल्कि अपने संघर्ष से देते हैं।



रामलाल दादा ने सिखाया—

इज़्ज़त उम्र से नहीं… नीयत से मिलती है।

और कभी-कभी…

एक बूढ़े पिता की आख़िरी ड्यूटी

पूरी दुनिया को इंसानियत का पाठ पढ़ा जाती है।


#EmotionalStory #HumanityLives



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