"बहू ने कहा – मैं अपने माता-पिता को बोझ नहीं बनाऊंगी"

एक सम्मानित और आत्मनिर्भर बहू रसोई में खड़ी है, चेहरे पर शांति लेकिन आँखों में दृढ़ता है। सास और ननद कमरे में बैठे हैरान हैं — बहू ने अभी-अभी अपने मायके के सम्मान की रक्षा की है।


शाम के सात बज रहे थे।

संध्या ऑफिस से थकी-हारी घर लौटी ही थी। जूते उतारे भी नहीं थे कि सास शांता देवी की आवाज गूँज उठी —

“अरे बहू! आज बड़ी देर लगा दी। देख, खाना बना है कि नहीं? मैं तो दोपहर में ही थक गई थी।”


संध्या ने मुस्कराकर कहा,

“माँजी, बस पाँच मिनट दीजिए, अभी बना देती हूँ।”


असल में आज संध्या का दिन दफ़्तर में बहुत भारी था। प्रोजेक्ट की डेडलाइन, ऊपर से ट्रैफिक का झंझट — लेकिन फिर भी उसने बिना कुछ कहे, सीधा किचन की ओर चली गई।

वहीं कमरे में ससुर जी अख़बार पढ़ रहे थे और पति रवि मोबाइल में व्यस्त थे।


तभी ऊपर के कमरे से रवि की बहन कविता उतरती है —

“माँ, वो जो प्लॉट देखा था न, वही वाला लेना पड़ेगा। आज ब्रोकर ने कहा कि रेट बढ़ने वाले हैं।”


“हाँ बेटा, ले लेना चाहिए। वैसे भी अगले साल तेरे छोटे भाई की शादी हो जाएगी, तो घर बड़ा होना ही चाहिए।”

शांता देवी ने जवाब दिया।


संध्या को सुनाई दिया तो उसने चाय चढ़ाते हुए मुस्कराकर कहा,

“माँजी, लेकिन घर तो पहले ही बड़ा है, तीन कमरे खाली हैं।”


कविता बोली —

“अरे भाभी, तीन कमरे तो हैं, पर ऊपर की मंज़िल पर दूसरा किचन और एक गेस्ट रूम भी होना चाहिए न! मेहमान आते हैं तो जगह कम पड़ जाती है।”


शांता देवी ने धीरे से कहा,

“हाँ, बहू, तू भी सुन ले, हमने सोचा है कि ऊपर वाली मंज़िल पर दूसरा किचन और एक कमरा बनवाना पड़ेगा।”


संध्या ने कहा, “ठीक है माँजी, अच्छा विचार है, लेकिन फिलहाल तो इतने पैसे नहीं हैं न?”


“अरे पैसे की क्या चिंता?” शांता देवी बोलीं —

“तेरे पापा जी रिटायर हुए हैं अभी दो महीने पहले। तू उनसे कह दे, थोड़ा-बहुत मदद कर देंगे तो काम आसान हो जाएगा।”


संध्या कुछ देर के लिए निशब्द हो गई।

“माँजी, मेरे पापा की रिटायरमेंट की रकम उनकी ज़िंदगी भर की मेहनत है। वो पैसा उनके बुढ़ापे का सहारा है।”


कविता तुरंत बोली —

“अरे भाभी, इतनी भावुक मत बनो। माँ की बात बुरी लगी क्या? बेटियाँ तो अपने माँ-बाप से सब लेती हैं, फिर तुम क्यों नहीं?”


संध्या ने अपनी आवाज़ शांत रखते हुए कहा —

“जीजी, मैं अपने माता-पिता से लेने के लिए नहीं, देने के लिए पैदा हुई हूँ। उन्होंने मुझे पढ़ाया-लिखाया, नौकरी के काबिल बनाया। अब उनसे पैसे मांगना मुझे ठीक नहीं लगेगा।”


शांता देवी बोलीं —

“बहू, तू तो ऐसे बोल रही है जैसे हम तेरा हक़ छीन रहे हैं। बेटी होकर क्या कुछ नहीं कर सकती अपने ससुराल के लिए?”


संध्या का चेहरा लाल हो गया, मगर उसने संयम से कहा —

“माँजी, बेटी होकर मैं अपने ससुराल का मान रख सकती हूँ, मेहनत कर सकती हूँ, पर अपने माँ-बाप की जमा पूँजी नहीं मांग सकती। वो भी तब, जब मैं खुद कमा रही हूँ।”


इतना कहकर वह चुपचाप कमरे में चली गई।


शाम को रवि आया तो घर का माहौल कुछ अजीब था। माँ ने पहले ही शिकायत कर दी —

“देख बेटा, तेरी बीवी को ज़रा-सा कहना भी ग़लत लगता है। हम तो बस इतना कह रहे थे कि ऊपर का काम हो जाए, तो घर बड़ा लगने लगेगा।”


रवि ने संध्या को बुलाया,

“क्या बात है, माँ कह रही हैं कि तूने उनसे ऊँची आवाज़ में बात की?”


संध्या ने शांत लहज़े में सब कुछ बताया —

कैसे माँजी और दीदी ने कहा कि अपने पापा से पैसे मांगो, और कैसे उनके बारे में अपशब्द बोले कि “अब बुढ़ापे में पैसा रखकर क्या करेंगे।”


रवि एक पल के लिए सन्न रह गया।

उसने माँ की ओर देखा —

“माँ, आपने सच में ऐसा कहा?”


शांता देवी बोलीं,

“तो क्या हुआ? बेटियाँ अपने पापा से नहीं मांगेंगी तो कौन देगा? हम तो घर के लिए ही कह रहे थे।”


रवि ने थोड़ा सख़्त होकर कहा,

“माँ, ये घर मेरा और संध्या का है। और घर के लिए मेहनत भी हम दोनों की है। हमें किसी से भीख मांगने की ज़रूरत नहीं। पापा जी ने अपने बच्चों को सम्मान से जीना सिखाया है, किसी पर बोझ बनना नहीं।”


कविता कुछ बोलने लगी तो रवि ने कहा,

“दीदी, अगर जीजा जी के परिवार वाले आपसे ऐसी डिमांड करें तो क्या पापा से पैसे लेकर देंगी? फिर क्यों चाहती हैं कि मेरी पत्नी अपने माता-पिता से मांगे?”


घर में सन्नाटा छा गया।

शांता देवी कुछ देर तक खामोश रहीं, फिर बोलीं —

“बेटा, मेरा इरादा बुरा नहीं था। बस सोच रही थी सबके लिए अच्छा हो।”


संध्या ने नम्रता से कहा —

“माँजी, मैं जानती हूँ। लेकिन कभी-कभी अच्छा सोचते-सोचते भी शब्द ऐसे निकल जाते हैं जो दिल दुखा देते हैं।”


उस रात पहली बार घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ। रवि ने खुद खाना बनाया और सबको साथ बिठाकर खिलाया।

संध्या ने भी कहा —

“अब ये घर मेरा भी है, मैं ही इसे संभालूंगी। लेकिन अपने माँ-पापा से मदद नहीं लूंगी, क्योंकि उनके लिए अब मेरी मदद ज़रूरी है।”


शांता देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा —

“तू सच में अच्छी बहू ही नहीं, अच्छी बेटी भी है।”



सीख:

> रिश्तों की नींव प्यार और सम्मान पर टिकती है, पैसों पर नहीं।

जो बहू अपने मायके का मान रखती है, वही ससुराल का भी मान बढ़ाती है।


#बहूका_सम्मान #मायकेकी_इज़्ज़त



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.