सुनहरी साड़ी
सुबह के सात बजे थे। घर में सन्नाटा था।
सिर्फ बर्तन की खनखनाहट और गैस पर रखी चाय की धीमी-धीमी उबलती आवाज़...
सुनीता किचन में खड़ी थी, मगर मन कहीं और था।
पति राजीव अख़बार पढ़ते हुए बोले —
“सुनीता, आज शाम को तैयार रहना, शर्मा जी के बेटे की शादी में चलना है।”
सुनीता ने बिना ऊपर देखे कहा —
“मुझे नहीं जाना।”
राजीव ने अख़बार नीचे रखा —
“क्यों? सब ऑफिस वाले होंगे, सबकी बीवियाँ आएंगी... तुम्हें भी तो थोड़ा बाहर निकलना चाहिए।”
“नहीं, मुझे अच्छा नहीं लगता ऐसे बड़े लोगों के बीच। सब एक-दूसरे को ऊपर-नीचे देखते हैं, किसने क्या पहना, किसके गले में क्या है...”
कहते हुए सुनीता की आवाज़ भारी हो गई।
राजीव ने ध्यान से उसे देखा।
सिर्फ तीन साल हुए थे उनके छोटे शहर से दिल्ली आने के।
यहां के चमक-दमक वाले माहौल में सुनीता अभी भी अपने छोटे शहर की सादगी में ही थी।
वह पहले स्कूल में टीचर थी, मगर यहां आकर नौकरी छोड़ दी, ताकि बच्चों की पढ़ाई और घर की जिम्मेदारी निभा सके।
राजीव जानते थे — उनकी पत्नी के मन में एक झिझक है, जो अक्सर समाज की बातों से और गहरी हो जाती है।
“तुम्हें पता है ना, शर्मा जी की बीवी कैसे हर बार ताना देती हैं — ‘आपकी बीवी तो बहुत सिंपल हैं’।”
राजीव के शब्द जैसे तीर की तरह चुभे।
सुनीता ने बस इतना कहा —
“तो रहने दीजिए... सिंपल ही ठीक है। दिखावा करने से आत्म-सम्मान नहीं बढ़ता।”
राजीव चुप हो गए।
मगर उनके मन में कुछ चलने लगा था।
दोपहर में ऑफिस जाते वक्त उन्होंने रास्ते में एक साड़ी की दुकान देखी।
मन में आया — सुनीता कभी कुछ मांगती नहीं। सबका ध्यान रखती है, पर अपने लिए कुछ नहीं।
वो दुकान में घुसे और बहुत देर तक साड़ियाँ देखते रहे।
अंत में एक हल्के सुनहरे रंग की सिल्क साड़ी चुनी — ना बहुत भारी, ना बहुत हल्की — बस उतनी ही सुंदर जितनी सुनीता खुद थी।
शाम को घर लौटे तो सुनीता बच्चों के साथ होमवर्क करा रही थी।
राजीव ने बैग से पैकेट निकाला और उसके सामने रख दिया।
“ये क्या है?”
“बस... तुम्हारे लिए।”
सुनीता ने साड़ी खोली, उसकी आंखें नम हो गईं।
“इतनी महंगी साड़ी... क्यों लाए?”
“क्योंकि तुम उसकी हकदार हो।
जबसे हम दिल्ली आए हैं, तुमने अपनी सारी पसंद, सारे शौक, सब छोड़ दिए।
मुझे लगता है, अब वक्त है कि तुम फिर से वही सुनीता बनो — जो हर जगह आत्मविश्वास से खड़ी रहती थी।”
सुनीता चुप रही।
बहुत देर तक साड़ी को सहलाती रही।
फिर धीरे से बोली —
“अगर मैं ये साड़ी पहनूं तो... चलेंगे हम शादी में?”
राजीव मुस्कुरा उठे — “चलेंगे। और इस बार, सिर ऊँचा रखकर।”
रात को शादी में जब सुनीता ने वह साड़ी पहनी, तो सबकी नज़रें बस उसी पर थीं।
शर्मा जी की बीवी भी बोलीं —
“अरे वाह, सुनीता जी! आज तो आप किसी रानी से कम नहीं लग रहीं।”
सुनीता मुस्कुराई, पर इस बार उसकी मुस्कान में आत्म-संतोष था, कोई बनावटीपन नहीं।
वह जान गई थी — साड़ी की कीमत नहीं, उसके पीछे के प्यार और सम्मान की कीमत होती है।
वापस लौटते वक्त कार में हल्की सी हँसी गूँज रही थी।
राजीव ने कहा —
“देखा, अब सब कहेंगे — राजीव की बीवी तो बहुत ग्रेसफुल है।”
सुनीता ने मुस्कुराकर जवाब दिया —
“और मैं कहूंगी — ये ग्रेस आपके भरोसे से आया है।”
राजीव ने उसका हाथ थाम लिया।
बाहर स्ट्रीट लाइट्स साड़ी के सुनहरे रंग पर चमक रहीं थीं —
जैसे किसी स्त्री की गरिमा और आत्म-सम्मान का प्रतीक...
सीख:
कभी-कभी किसी रिश्ते को सजाने के लिए बड़े शब्द नहीं, बस थोड़ा विश्वास और सम्मान काफी होता है।
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