आख़िरी उम्मीद
"नहीं शांति, अब और नहीं!"
रामेश्वर जी की आवाज़ गूंज उठी थी, “मैंने जीवन भर सबका बोझ उठाया, अब अपने ही बच्चों के ताने नहीं सुन सकता। इस घर की दहलीज़ अब मुझे परायी लगती है।”
शांति देवी आँसू पोंछते हुए बोलीं,
“कितनी उम्मीदें थीं बेटा-बहू से... पर अब तो लगता है, अपने ही घर में मेहमान बन गए हैं हम।”
इतना कहते हुए दोनों उठे और अपने कमरे की ओर बढ़ गए। कमरे में एक कोने में रखी पुरानी अलमारी से शांति देवी ने धीरे-धीरे कुछ कपड़े और पुराना बटुआ निकाला।
रामेश्वर जी ने अपनी पुरानी चादर मोड़ी — वही जो उनके पोते अर्जुन ने उन्हें दी थी, जब स्कूल की ड्रॉइंग में पहला इनाम जीता था।
उसी वक्त बाहर से आवाज़ आई —
“दादा-दादी, आप लोग क्या कर रहे हो?”
अर्जुन भागता हुआ अंदर आया।
“कुछ नहीं बेटा, बस थोड़ी सफाई कर रहे हैं,” दादी ने मुस्कुराकर झूठ कहा।
लेकिन अर्जुन समझ गया — उसकी मासूम आँखों में डर झलक रहा था।
कुछ घंटे पहले की बात…
शाम को जब सब साथ बैठे थे, तो बहू ने कहा —
“माँजी-पिताजी, बिजली का बिल बहुत बढ़ गया है, आप लोग दिन भर टी.वी. चलाते रहते हैं, हमें भी खर्च उठाना पड़ता है।”
रामेश्वर जी ने शांत स्वर में कहा,
“बेटा, दिन में तो बस समाचार देखते हैं, ताकि वक्त कट जाए।”
“वक्त काटने का इतना शौक है तो गाँव चले जाइए, वहाँ खूब वक्त मिलेगा!”
बहू की बात तीर की तरह लगी।
बेटा, अमित, तब भी चुप रहा — जैसे कुछ सुना ही न हो।
शांति देवी का दिल भर आया।
उन्होंने सिर झुकाकर कहा, “ठीक है, बेटा, अब हम तुम्हें और बोझ नहीं बनेंगे।”
उस रात...
अर्जुन स्कूल से लौटा तो देखा, दादी का चेहरा लाल था, आँखें सूजी हुई थीं।
“दादी, आप रोईं क्या?”
“नहीं रे, आँख में धूल चली गई थी।”
“धूल या किसी का शब्द?” अर्जुन बोला — बच्चा था पर समझदार बहुत।
“दादी, अगर आप लोग गाँव चले गए तो मैं भी चलूँगा।”
“नहीं बेटा, हमें गाँव की हवा चाहिए, तुम्हें पढ़ाई करनी है,” दादी ने उसे सीने से लगाते हुए कहा।
अगली सुबह..
रामेश्वर जी और शांति देवी अपने पुराने गाँव की बस में बैठे थे।
पीछे अर्जुन का चेहरा खिड़की के पास रोता हुआ दिखा — बहू ने उसे पकड़ा हुआ था।
बस धीरे-धीरे शहर की सीमा पार कर गई।
गाँव पहुँचकर दोनों ने पुराना घर खोला — दीवारों में दरारें थीं, पर दिल में शांति थी।
धीरे-धीरे दोनों ने वहाँ फिर से जीने की कोशिश शुरू की — मिट्टी की खुशबू, नीम का पेड़ और पुराने पड़ोसी उनका सहारा बन गए।
कुछ महीने बाद..
एक दिन डाकिया चिट्ठी लाया —
“दादा-दादी, मैं बिना आपके बहुत उदास हूँ। मम्मी-पापा हमेशा काम में रहते हैं। मेरे कमरे में अब वो हँसी नहीं है जो आपकी गोद में होती थी। प्लीज़ वापस आ जाइए — आपकी अर्जुन।”
चिट्ठी पढ़कर दोनों की आँखों में आँसू आ गए।
रामेश्वर जी बोले, “शांति, देखो, यह बच्चा अब भी हमारे दिल की डोर बना हुआ है।”
“चलो, इसे एक बार देखने चलते हैं,” शांति देवी ने कहा।
जब दोनों घर पहुँचे, तो दरवाज़ा अमित ने खोला।
“पिताजी… माँजी… आप लोग?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
शांति देवी बोलीं,
“हमें अर्जुन की याद बहुत आई, इसलिए आ गए।”
इतना कहकर वे अंदर चली गईं।
अर्जुन भागता हुआ आया और दोनों के गले लग गया — “दादी! अब आप कहीं नहीं जाएँगी।”
अमित की आँखें भर आईं।
“माँ-पापा, माफ कर दीजिए, हमने बहुत बड़ा पाप किया। आपने जो सहा, वो कोई सह नहीं सकता। जब आप चले गए थे, तब घर की रौनक भी चली गई थी।”
बहू भी रोते हुए बोली,
“माँजी, माफ कर दीजिए… हमसे गलती हुई। आपकी मौजूदगी ही इस घर की बरकत है।”
कुछ महीनों बाद..
अब घर में सब कुछ पहले जैसा नहीं, बल्कि उससे बेहतर था।
सुबह रामेश्वर जी अख़बार पढ़ते, दादी और अर्जुन साथ में पौधे लगाते।
अमित और बहू अब हर हफ्ते अपने माता-पिता के साथ बैठकर बातें करते।
शांति देवी अक्सर मुस्कुराकर कहतीं,
“कभी-कभी दूर जाने से ही अपनों को पास लाया जा सकता है।”
अंतिम पंक्तियाँ...
जीवन में उम्र नहीं, सम्मान ज़्यादा मायने रखता है।
माता-पिता जब खामोश होते हैं, तो टूटे नहीं होते — बस, परख रहे होते हैं कि कौन उनका अपना है।
#ParivarKiKahani #DilSeJudaRishta

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