अधूरी सुबह का पूरा प्यार
आरव और सोनाली की शादी को साढ़े चार साल हो चुके थे।
बिल्कुल आम परिवार की तरह—
कभी हँसी-मज़ाक,
कभी बच्चों जैसी खट-पट,
और कभी छोटी-छोटी बातों पर लंबी बहसें…
दोनों नौकरी करते थे, पर सुबह की जिम्मेदारी ज़्यादातर सोनाली ही संभालती थी।
पर अभी दो महीने से उनका बेटा “विवान” आया था—
बस… सारा रूटीन ही उल्टा-पुल्टा हो चुका था।
एक सुबह…
आरव ने घड़ी देखी—7:15।
“सोनाली… उठो ना प्लीज़। मुझे 8 तक निकलना है। नाश्ता थोड़ा जल्दी बना दो…”
आरव धीरे-धीरे उठकर नींद में करवट बदलती सोनाली के पास आकर बैठ गया।
सोनाली ने धीरे से आँखें खोलीं—
“उठ गई हूं आरव… लेकिन विवान ने पूरी रात सोने नहीं दिया।
कभी रोना, कभी गोद, कभी दूध… एक मिनिट को भी चैन नहीं मिला।
तुम तो गहरी नींद में थे, तुम्हें पता भी नहीं चला।”
“अरे, अच्छा हुआ तुमने मुझे सोने दिया।
लेकिन अभी उठ जाओ प्लीज़… मीटिंग है मेरी।”
आरव ने जल्दी-जल्दी कहा।
सोनाली उठते हुए बोली—
“आरव, मेरा सिर भारी हो रहा है।
आज तुम चाय बना लो… और नाश्ता आज बाहर से मैनेज कर लेना प्लीज़।”
आरव के चेहरे पर हल्की चिढ़ आई—
“फिर बाहर का? परसों ही खाया था।
इतना पैसा भी उड़ाने लायक नहीं है।
और वैसे भी… हफ्ते में दो-तीन बार तुम नाश्ता नहीं बना पाती।”
सोनाली को बुरा लगा।
“क्या मैं जानबूझकर नहीं बनाती?
मैं पूरी रात बच्चे के साथ जागती हूं… और तुम्हें लगता है मैं बहाना कर रही हूं?"
आरव थोड़ा ऊँचे स्वर में बोला—
“ठीक है, मत बनाओ।
लेकिन फिर किसी ठीक-ठाक खाना बनाने वाली को रख लो।
हर बार पूरा बोझ सिर्फ मेरे ऊपर नहीं डाल सकते।”
सोनाली भी भड़क गई—
“रखी थी ना! जब विवान छोटा था!
तुम ही तो रोज शिकायत करते थे—
कभी दाल पतली, कभी सब्ज़ी फीकी, कभी नमक ज्यादा…
और ऊपर से कहते—‘इतने पैसे दे रहा हूं, काम तो ठीक करे!’
अब बताओ? क्या करूँ मैं?”
बात ऐसे बढ़ रही थी जैसे आग में घी डाला जा रहा हो।
आरव तिलमिलाया—
“हां, मैं बदल गया हूं! और तुम भी पहले जैसी नहीं रहीं!”
सोनाली भी गुस्से में बोल पड़ी—
“पहले जैसा एडजस्टमेंट तुम्हें आता ही नहीं!”
और दोनों में वही रोज का घिसा-पिटा तर्क-वितर्क…
आवाज़ें उठती गयीं…
और छोटी-सी बात बड़ा रूप ले गई।
बाद में आरव गुस्से में तैयार होकर बोला—
“लड़ाई करने में तो पूरा ज़ोर है तुम्हारा।
जैसे ही खाना बनाने को कहा… बस दूसरा रूप आ जाता है!”
सोनाली की आँखें भर आईं—
“तुम अब पहले जैसे नहीं रहे।”
और भावुक होकर बोली—
“जाओ… आज के बाद मुझसे बात मत करना।”
“मुझे भी कोई शौक नहीं!”
कहते हुए आरव तेज़ कदमों से बाहर निकल गया।
पूरे दिन की चुप्पी…
ना सोनाली ने फोन किया…
ना आरव ने।
विवान तो दोपहर में सो गया,
पर सोनाली का मन और बेचैन होता गया।
8 बजे…
9 बजे…
10 बजे…
हर मिनट बढ़ता जा रहा था
और उसके मन में अजीब-अजीब डर बैठ रहा था।
“आज इतने लेट कैसे?”
10:45 हो गए।
बारिश भी शुरू हो चुकी थी।
तेज़ हवा, बिजली चमकना, और मूसलाधार बारिश—
सब सोनाली की बेचैनी बढ़ा रहे थे।
उसने खुद को कोसा—
“मैंने क्यों कहा कि मुझसे बात मत करना… क्यों?”
11 बजे उसने कांपते हाथों से आरव को फोन लगाया—
स्विच ऑफ।
अब तो सोनाली का दिल मुँह को आ गया।
आँखों से आँसू बहने लगे।
विवान सो रहा था,
और वह खिड़की पर खड़ी आँसुओं के बीच सड़क को देख रही थी।
उसने तुरंत आरव के दोस्त करण को फोन किया—
“करण, आरव तुम्हारे साथ हैं? अभी तक घर नहीं आए…”
करण चिंतित होकर बोला—
“नहीं भाभी… मैं देखता हूं। आप परेशान मत होइए।”
सोनाली की सांसें जैसे अटक गई थीं।
11:12 बजे — डोरबेल
डोरबेल बजते ही सोनाली दौड़कर दरवाजे तक पहुंची।
दरवाजा खुला—
सामने आरव…
पूरी तरह भीगा हुआ।
सोनाली उसे देखते ही फूट-फूटकर रो पड़ी—
“कहां थे आरव? फोन स्विच ऑफ क्यों था?
बारिश में भीगकर क्यों आए? मैं बहुत डर गई थी…”
आरव ने उसे पकड़कर कहा—
“अरे, कुछ नहीं हुआ!
चार्जर ऑफिस में रह गया… फोन बंद हो गया।
बारिश में गाड़ी फंस गई थी, इसलिए लेट हो गया।
और… हां थोड़ा नाराज़ भी था, इसलिए किसी के फोन से फोन नहीं किया।”
सोनाली आँसू पोंछते हुए बोली—
“आज ही ऐसा होना था आरव…
मुझे बहुत पछतावा हो रहा था कि मैंने वो बातें क्यों कहीं।
चाहे कितना भी गुस्सा हो, ऐसे शब्द नहीं बोलने चाहिए।”
आरव मुस्कुराया—
“बिल्कुल सही कहा।
घर से बाहर जाते समय तो अच्छे शब्द ही बोलने चाहिए।
न जाने किस पल कौन सा शब्द सच हो जाए।”
सोनाली का सिर उसके कंधे पर था—
“मुझे माफ कर दो…”
“तुम्हें भी…
और गलती थोड़ी मेरी भी थी,”
आरव ने उसके बाल सहलाते हुए कहा।
“बच्चा छोटा है… जिम्मेदारी ज़्यादा है… मुझे समझना चाहिए था।”
आरव ने जूते उतारते हुए पूछा—
“अच्छा, खाना क्या बनाया है?
आज तो ऑफिस में भी बस समोसा खाया। बहुत भूख लगी है।”
सोनाली की आँखें चमक उठीं—
“आपको पता है… मैंने सोचा था कि आपकी नाराज़गी कैसे दूर करूंगी।
आपके पसंद का ढाबा-स्टाइल दाल तड़का और जीरा राइस बनाया है!”
आरव बच्चे की तरह खुश हो गया—
“अरे वाह… मुझे पता था तुम मुझे भूखा नहीं सोने दोगी।”
सोनाली हँसते हुए बोली—
“और ये देखो…”
उसने फ्रिज से एक छोटा बॉक्स निकाला—
“आपके पसंद की ठंडी रसगुल्ला भी रखे हैं।”
आरव ने भी मज़ाक में कहा—
“तो ये रही आपकी पसंद की चीज…”
उसने बैग से एक छोटा पैकेट निकाला—
ताज़ा मीठा पान।
“बारिश में भी गाड़ी रोककर तुम्हारे लिए बनवाया है।
मुझे पता है, तुम्हें कितना पसंद है।”
आरव मुस्कुराया।
सोनाली खिल उठी—
“ये सब कर रहे थे? और मैं इधर डर रही थी!”
दोनों हँस पड़े…
और अगले ही पल एक-दूसरे को कसकर गले लगा लिया।
कहानी का अर्थ:
कभी-कभी छोटी बातों पर बड़ी बहस हो जाती है।
पर पति-पत्नी का रिश्ता लड़ाई से नहीं टूटता…
चुप्पी और ईगो से टूटता है।
जिस दिन हम “गलती मेरी भी थी” बोलना सीख जाते हैं—
उसी दिन रिश्ते मजबूत हो जाते हैं।
#LifeLessons #RelationshipGoals

Post a Comment