फासले

 

Three generations embracing in a modest living room — a daughter-in-law crying in an elder woman’s lap while the son watches smiling, sunlight through a window.


रीना को शादी के बाद बहुत प्यार मिला था।

अच्छा घर, समझदार पति अरविंद और सोने जैसे दिल वाली सास उमा।

रीना हमेशा कहती थी, “सास नहीं, मेरी दूसरी मां हैं उमा।”


लेकिन रिश्ते कभी-कभी धीरे-धीरे बदल जाते हैं।

जैसे पानी में बिना आवाज़ के बर्फ जम जाए…

वैसा ही कुछ उनके घर में हुआ।



रोज़ झगड़े की वजह समझ नहीं आ रही थी...


कई दिनों से उमा देख रही थीं—

रीना और अरविंद के बीच किसी बात को लेकर तनाव है।

ना पहले जैसा हँसना, ना पहले जैसी बातें।

छोटी-सी बात पर दोनों नाराज़।


उमा ने कई बार पूछा,

“रीना बेटा, क्या हुआ?”

रीना बस इतना कहती—

“कुछ नहीं मां, आप चिंता मत कीजिए।”


और कमरे से निकल जाती।


अरविंद भी बस मुस्कुराकर कह देता,

“ऑफिस का स्ट्रेस है मां।”


पर उमा जानती थीं, बात कुछ और है।



एक रात सब हद पार हो गई...


रात को तेज़ आवाज़ें आने लगीं।

रीना और अरविंद में इतनी जोरदार बहस कि उमा को बीच में आना पड़ा।


“अरे, क्या हो गया तुम दोनों को?”

उमा ने पूछा।


रीना गुस्से से बोली—

“आप अपने बेटे से पूछिए!”

और कमरे से बाहर चली गई।


उमा का दिल टूट गया।

रीना ने कभी उनसे ऐसे बात नहीं की थी।


अरविंद भी झुंझलाया हुआ घर से बाहर चला गया।

उमा समझ रही थीं—

ये झगड़ा साधारण नहीं है।



सच सामने आया...


अगली सुबह अरविंद चुपचाप नाश्ता कर रहा था।

उमा उसके पास बैठीं।

“बेटा, मुझसे मत छुपा। क्या बात है?”


अरविंद की आंखें भर आईं।

“मां… रीना चाहती है कि आप गांव जाकर रहें।

उसका कहना है कि हम अपने हिसाब से नहीं जी पा रहे।”


उमा जैसे पत्थर बन गईं।

रीना—जिसने उनके पैरों में घुटनों के बल बैठकर कहा था

“आप मेरे लिए मां जैसी हैं”—

वही रीना उन्हें बोझ समझने लगी?



रीना की मां की असलियत...


कुछ समय बाद उमा को सच्चाई पता चली।

रीना की मां पम्मी, बहुत तेज़ बोलने वाली और हावी रहने वाली स्त्री थी।

रीना हर बात उन्हीं से पूछती थी।

पम्मी ने धीरे-धीरे रीना के दिमाग में यह बात बैठाई—

“सास के रहते तुम लोग कहां खुलकर जी पाओगे?

उन्हें अलग कर दो।”


रीना शुरू में हिचकिचाई थी,

लेकिन मां की बातों में आ गई।



उमा का फैसला...


उमा ने अरविंद का दुख देखा।

देखा कि बेटा मां और पत्नी के बीच पिस रहा है।

उमा ने उसी रात कहा—

“मैं गांव चली जाती हूं।

शायद मेरे हटने से सब ठीक हो जाए।”


अरविंद रो पड़ा।

“मां, मैं आपको नहीं जाने दूंगा।”


पर उमा ने कहा—

“कभी-कभी पीछे हट जाना ही जीत होती है।”


और गांव चली गईं।



घर पर पम्मी का राज...


उमा के जाते ही पम्मी और रीना की बहनें घर में आ बसीं।

पूरा माहौल बदल गया—


• बाहर का खाना

• बिखरा घर

• रीना का ऑफिस छोड़कर शॉपिंग चल देना

• पम्मी का अरविंद को ताने देना


अरविंद बस एक मेहमान की तरह रह गया।

उसे अपनी मां की बहुत याद आती,

लेकिन उमा ने कहा था—

“रिश्ते बचा लो बेटा।”



बीमारी ने सबक सिखाया...


एक दिन अचानक रीना को तेज़ बुखार चढ़ गया। उसे लगातार उलटी और दस्त होने लगे, और उसका पूरा शरीर टूटने लगा।

अरविंद उसे अस्पताल ले गया।

डॉक्टर ने कहा—

“लापरवाही और बाहर के खाने से हालत खराब हुई है।”


पम्मी और दोनों बहनें दो दिन साथ रहीं,

फिर बहाने बनाकर सब अपने-अपने घर चली गईं।


रीना अकेली बिस्तर पर पड़ी रो रही थी।

सोच रही थी—

“जिन्हें मैंने अपने से ज्यादा माना,

वे मुश्किल में मुझे छोड़कर चली गईं।”


और उसे अपनी सास याद आने लगी—

वो उमा,

जो बिना बोले उसका हर दर्द समझ लेती थीं।



रीना दवा खाकर सो गई थी।

उठी तो लगा कोई उसके बाल सहला रहा है।

आंखें खोलीं—

उमा सामने थीं।


रीना फूट-फूटकर रो पड़ी।

“मां… मुझे माफ कर दो।

मैं गलत थी।”


उमा ने उसे गले लगा लिया।

“मां-बेटी के बीच माफी कैसी?”


उसी पल अरविंद भी अंदर आया।

वह सुबह-सुबह गांव जाकर अपनी मां को लेकर आया था।


रीना और उमा को गले लगते देखकर उसकी आंखें भर आईं।

“अब सब ठीक है,”

अरविंद बोला।


रीना ने सिर हिलाया—


“हां, अब सब ठीक है।”



सीख:

कभी–कभी रिश्ते गुस्से से नहीं टूटते,

गलत सलाह से टूट जाते हैं।

मां–बेटे और सास–बहू के रिश्ते

दूरी से नहीं,

समझ और सम्मान से चलते हैं।


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