❝ बहू भी बेटी, बेटी भी बहू ❞
घर में सुबह से ही हलचल मची थी। टीवी चल रहा था, बच्चा रो रहा था, और रसोई में बर्तन खड़खड़ा रहे थे। उधर बैठक में कपड़े और खिलौने ऐसे बिखरे पड़े थे जैसे किसी मेले की तैयारी हो रही हो।
कुसुम छत से सूखते कपड़े उतार कर दौड़ती हुई नीचे आई ही थी कि तभी बेल बजी।
“लो आ गए!… अरे नंदिनी और रवि आ गए!” वह खुशी से बोल पड़ी।
नंदिनी—उसकी बड़ी बेटी—छह महीने बाद मायके आ रही थी। मां का मन तो सुबह से ही दरवाजे की ओर लगा हुआ था।
नंदिनी अंदर आते ही कुसुम से लिपट गई,
“मां, कितना मिस किया मैंने तुम्हें!”
कुसुम ने भी उसे कसकर पकड़ लिया,
“बस बस… चल, पहले बैग रख दे, फिर ठीक से मिल लेना।”
रवि ने भी हाथ जोड़कर नमस्ते किया और मुस्कराया।
रसोई का रणभूमि...
उधर रसोई की हालत ऐसी थी कि मानो कोई तूफान आकर गुज़र गया हो। मगन—कुसुम का छोटा बेटा—चाय बना चुका था, पर 10 कप और बन जाने लायक बर्तन पड़े थे।
और सुमन—मगन की पत्नी—उसकी 4 महीने की बेटी को गोद में लिए थकी-मांदी सी बैठी थी। बच्ची बस गोद में ही चुप रहती थी। जैसे ही उतारो, फूट-फूटकर रोना शुरू।
कुसुम खीजकर बोली,
“अरी सुमन, ज़रा मेरे पीछे-पीछे आ… ये रसोई कैसे संभालेगी?”
सुमन थकी आवाज़ में बोली,
“मांजी, रात भर नहीं सोई हूं… बच्ची बस गोद में ही सोती है।”
कुसुम ने होंठ भींच लिए। उसे बहू की मजबूरी समझ आती थी, पर घर का काम उसे फिर भी भारी लगता था।
बेटी ने आते ही मोर्चा संभाला...
नंदिनी ने मां का चेहरा देखते ही समझ लिया कि अंदर कुछ तूफ़ान चल रहा है।
उसने हंसते हुए मां के कंधे पर हाथ रखा,
“चलो बताओ, कौन-सी लड़ाई लगी है यहां?”
कुसुम ने रो-रोकर अपना सारा दुखड़ा बता दिया—कामवाली आज फिर नहीं आई, सुमन की बच्ची लगातार रो रही है, घर बिखरा पड़ा है… और वह अकेले सब सँभालते-सँभालते थक चुकी है।
तभी नंदिनी तुरंत रसोई में घुस गई।
“मां, तुम जाओ! पहले जी भरकर दामाद जी से बातें करो। मैं सब देख लूंगी।”
कुसुम ने जल्दी से कहा,
“नहीं! तू मेहमान है। क्या काम करवाऊंगी?”
“मेहमान?” नंदिनी ने आंखें नचा कर कहा,
“यह घर मेरी मां का है, और मैं यहां मेहमान? चलो हटो, काम मैं कर लूंगी।”
और सचमुच, नंदिनी कमर में साड़ी खोंसकर युद्ध मोड में आ गई।
15 मिनट में रसोई चमकने लगी।
ननद–भाभी की प्यारभरी तकरार...
नंदिनी बच्ची को लेने सुमन के कमरे में गई।
बच्ची गोद में आते ही शरारत से मुस्कराई।
सुमन ने कहा,
“मेरे पास तो रो-रोकर नाक नीली कर देती है।”
नंदिनी बोली,
“क्यों रे, तू भी बहू की तरह नाटक करती है क्या?”
सुमन हंस दी,
जब नंदिनी ने बच्ची को गोद में लिया और कहा—
“भाभी, इसे तो मैं अपने साथ ले जाऊँगी।”
तब सुमन हँसकर मज़ाक में बोली—
“हां हां, ले जाना… दो दिन में तुम्हारा दिमाग खा जाएगी!”
नंदिनी ने प्यार से बच्ची को झुलाते हुए कहा,
“अच्छा सुनो, नाश्ता क्या बनाऊं?”
सुमन ने चुटकी ली,
“क्यों, तुम्हारे पति (रवि) को मेरे हाथ का खाना अच्छा नहीं लगता क्या?”
“अरे नहीं, तुम्हारे कबाब तो आज तक फेमस हैं!” नंदिनी ने जवाब दिया।
सुमन का दिल फूल गया।
दिन भर नंदिनी ने अपनी धाक जमा दी।
सफाई, नाश्ता, चाय… सब फटाफट।
कुसुम और रवि बातों में लगे रहे।
सुमन बच्ची के साथ।
शाम तक पूरा घर चमक उठा।
और कुसुम हर थोड़ी देर में कहती,
“देखो, मेरी बेटी कितनी समझदार है।”
सुमन यह सुनकर चुप रह जाती।
कभी-कभी उसे सचमुच लगता कि सास के मन में कहीं-ना-कहीं फर्क है—
बेटी एकदम आसमान… बहू जमीन?
शाम को सब बाजार गए।
नंदिनी के लिए एक खूबसूरत जैकेट और जींस ली गई।
वापस आकर कुसुम नंदिनी को जींस पहनकर घूमते देखती रही—
उसकी आंखें गर्व से भर गईं।
सुमन हल्की मुस्कान में सब छुपा गई।
क्योंकि शादी के बाद कुसुम ने सुमन से कहा था,
“बहू ऐसी जींस-विंस पहनकर अच्छी नहीं लगती।”
तभी नंदिनी ने मिट्टी के तंदूर को गरम करके बेहतरीन चिकन-नान तैयार कर लिया।
रवि उछल पड़ा,
“कल हम भी तंदूर खरीदेंगे!”
कुसुम बोली,
“क्यों पैसे ख़राब करते हो? यह वाला ले जाओ!”
सुमन की सांस अटक गई—
“ये तो मेरा है…”
पर वह चुप रही।
नंदिनी तुरंत समझ गई।
उसने कहा,
“नहीं मां, हमारे पास मेजर साहब तंदूर सस्ते में दिला देंगे। दो-दो तंदूर का क्या करूंगी?”
सुमन ने राहत की सांस ली।
बेटी चली गई, घर फिर शांत...
अगले दिन नंदिनी और रवि चले गए।
घर सूना पड़ गया।
कुसुम हर थोड़ी देर में कहती,
“अरे नंदिनी होती तो…”
“नंदिनी ऐसा करती…”
सुमन सुन-सुनकर भीतर ही भीतर टूटने लगी।
क्या वह इस घर में सिर्फ काम करने आई है?
क्या उसका कोई अपना स्थान नहीं?
बहू की चालाक—पर प्यारभरी—योजना...
होली आने वाली थी।
सुमन ने फैसला किया—
अब वह इस घर में सिर्फ बहू बनकर नहीं रहेगी… बेटी बनकर रहेगी!
होली की सुबह…
सुमन जींस और कुर्ता पहनकर निकली।
हाथ में गुलाल और चेहरे पर शरारत।
वह दौड़कर कुसुम के पास गई,
“होली मुबारक हो मां!”
और नंदिनी की तरह दोनों गालों पर किस कर दिया।
साथ ही गुलाल मल दिया।
कुसुम दंग रह गई।
कमल, उसके पति, हंस पड़े।
सुमन ने झूमते हुए कहा,
“आज से मैं बहू नहीं… बेटी हूं!”
फिर उसने पूरे घर में रौनक लगा दी—
पकौड़ी, दहीबड़े, गुजिया…
चाय-पानी…
मेहमानों का स्वागत…
सब संभाल लिया।
कुसुम रसोई में गई भी तो वह बोली,
“मां, आज तुम नहीं! तुम मेहमानों से मिलो, मैं संभालती हूं।”
छुटकी भी दादी की गोद में आज बिल्कुल नहीं रोई।
जैसे वह भी इस मिशन में शामिल थी!
अंत में… दिल पिघल गया
ऊपर से कमल ने मुस्कराते हुए आवाज दी,
“अरे बहु, एक दहीबड़ा और देना!”
रसोई से सुमन हँसती हुई बोली,
“अरे पिताजी, यहाँ कोई बहू-वहू नहीं… आपकी अपनी बेटी काम पर लगी है!”
कुसुम भावुक हो गई।
उसने सुमन को गले लगाया।
“सच में… तू बेटी जैसी ही है। मेरा घर तेरे आने से घर लगता है।”
सुमन मुस्कराई,
“और मैं? मैं तो पहले से ही आपको मां कहती हूं… फर्क सिर्फ आपके दिल में था।”
कमल हंस पड़े,
“और मेरी क्या स्थिति है इस घर में?”
सब ठहाका मारकर हंस दिए।
घर में पहली बार बहू और बेटी की दीवार नहीं थी…
सिर्फ दो बेटियों का खुला, स्नेह भरा अपनापन था।

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