दो चेहरों का खेल

 

An emotional scene showing a tired young Indian daughter-in-law resting on a bed while her mother-in-law stands in the background, reflecting family pressure and expectations in a traditional household.


शाम के करीब पाँच बज रहे थे।

रसोई में हल्की-हल्की गैस की आवाज आ रही थी, पर घर में एक बेचैनी सी छाई थी।

सासुमा बार-बार मोबाइल लेकर इधर-उधर चक्कर काट रही थीं।

चेहरा तमतमाया हुआ, होंठ बुदबुदाते हुए—


“हे भगवान… मेरी बेटी के साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं!”


उधर ड्राइंग रूम के कोने में खड़ी अनामिका सब देख-सुन रही थी।

उसे समझ आ रहा था कि कुछ बड़ा होने वाला है।


तभी फोन फिर बजा।

सासुमा ने झट से उठाया—


“हाँ नीना, रो मत बेटा… आराम से बताओ, आखिर हुआ क्या है?”

क्या?

तुम्हारी सास ने यूँ ही कह दिया—

‘मायके जाकर इलाज करवाओ’?

क्यों?

तुम उनके घर की बहू नहीं हो क्या?”


उनके चेहरे पर गुस्सा और चिंता एक साथ उतर आए।


“अच्छा… अच्छा… रोना नहीं। मैं आ रही हूँ।

मैं अभी आती हूँ। अभी!”


फोन कटते ही उन्होंने घर भर में आवाज़ लगा दी—

“राहुल!! जल्दी आओ!”


राहुल बैग नीचे रखते हुए आया,

“क्या हुआ माँ? प्लीज थोड़ा शांत हो जाइए।”


“शांत? मेरी बेटी को उसके ससुराल वालों ने ऐसा बोल दिया!

बहू बनाकर ले गए थे या नौकरानी?”


राहुल ने कहा—

“माँ, नीना के ससुराल वाले बुरे नहीं हैं… शायद कुछ गलतफहमी हो।”


“गलतफहमी नहीं, ये सीधी बेइज्जती है!”

सासुमा चीख पड़ीं।


अनामिका चुपचाप सब सुन रही थी।

दिल में हजार सवाल उठ रहे थे…

क्योंकि आज ही तो उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था…

लेकिन तब सासुमा को उसकी बीमारी नाटक लग रही थी।




सुबह—जिसकी चुभन अभी भी बाकी थी...


सुबह अनामिका का सिर भारी था।

शरीर में दर्द, चक्कर, और तेज़ कमजोरी…

उसने सोचा था—“बस पाँच मिनट और लेट जाऊँ।”


पर तभी रसोई से तेज़ बर्तनों की पटक-पटक की आवाज आई।

सासुमा बड़बड़ा रहीं थीं—


“उफ्फ ये बहू लोग! जब देखो बहाना!

घर का काम करे तो कैसे?

कामचोरी की रानी कहीं की!”


राहुल कमरे में आया और अनामिका को लेटा देखकर भड़क गया—


“ये क्या है अनु?

माँ अकेले काम कर रही हैं और तुम यहाँ सो रही हो?

तुम्हें शर्म नहीं आती?”


अनामिका ने उठने की कोशिश करते हुए कहा—

“राहुल… मेरी तबीयत ठीक नहीं है। सच में बहुत दर्द है…”


“बस-बस! हर महीने की कहानी!”

राहुल ने हाथ झटककर कहा—

“तुम्हारी ये ‘बीमारियाँ’ तभी आती हैं जब काम करना होता है।”


उसी वक्त सासुमा कमरे में आईं,

चेहरा सख्त।


“ये कोई बीमारी-वमारी नहीं।

दर्दनिवारक गोली खाओ और उठो।

घर का काम पड़ा है।”


“मम्मी जी… कितनी बार गोली खाऊँ?

अब तो हालत और बिगड़ रही है।”

अनामिका की आवाज़ काँप गई।


सासुमा ठंडे स्वर में बोलीं—

“अगर इतनी ही बीमारी है तो अपने मायके को बोलो इलाज करवाने।

हमारे पास इतना पैसा नहीं है फालतू के खर्चों के लिए।”


अनामिका का दिल वहीं टूट गया था।

उसे लगा—

क्या वह इस घर में सिर्फ काम करने की मशीन है?



शाम—अब वही सास अपनी बेटी के लिए धरना देने को तैयार


घर से निकलने से पहले अनामिका ने हिम्मत करके पूछा—


“मम्मी जी, कहा जा रही हैं इतनी जल्दी?”


सासुमा गुस्से से बोलीं—

“नीना के ससुराल! मेरी बेटी के साथ बुरा हुआ है।

उसे कह दिया—मायके जाकर इलाज करवाओ।

ये किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं!”


अनामिका ने धीमे से कहा—

“हो सकता है गुस्से में कह दिया हो उन्होंने।

वैसे दीदी का इलाज भी तो वही करवा रहे हैं…”


सासुमा एकदम पलट पड़ीं—

“बहू! तू मत बोल बीच में।

मेरी बेटी बीमार है, उसके दर्द को मैं समझती हूँ!”


अनामिका ने गहरी साँस ली और बोली—


“ये बात अच्छी कही आपने, मम्मी जी।

बहू भी बीमार पड़ सकती है।

और उसकी बीमारी भी नाटक नहीं होती।


सुबह आपने और राहुल ने जो कहा…

उस हिसाब से तो मेरे माता-पिता को भी यहाँ आकर लड़ना चाहिए था।

लेकिन मैंने कभी शिकायत की ही नहीं।

क्योंकि मेरे संस्कार मुझे सिखाते हैं—

घर की बात घर में ही रखो।”


कमरे में एक पल को सन्नाटा छा गया।

राहुल ने नज़रें चुरा लीं।


अनामिका ने धीरे से कहा—

“पर रिश्तों में एक ही बीमारी है…

एक बेटी का दर्द दिखता है,

पर बहू का नहीं।”

और वो चुपचाप अपने कमरे में चली गई।



नीना के घर का सच...


जब सासुमा और राहुल नीना के घर पहुँचे,

दरवाज़ा नीना की सास ने तुरंत खोला।


“अरे आइए बहनजी…

देखिए, नीना की तबीयत थोड़ी खराब है, हम लोग देखभाल कर रहे हैं।”


नीना सोफ़े पर लेटी थी,

उसका पति उसके पैरों पर मलहम लगा रहा था।

ससुर दवाई लेकर आए थे।

सास उसके सिर पर ठंडी पट्टी रख रही थी।


नीना ने मुस्कुराकर कहा—

“अरे मम्मी, आपने क्यों तकलीफ़ की?

सब लोग बहुत ध्यान रख रहे हैं मेरा।

सुबह गुस्से में दो बात बोल दी गई…

पर वो लोग खुद ही बाद में माफ़ी मांग चुके हैं।”


सासुमा का चेहरा एकदम ढीला पड़ गया।

जो तूफ़ान वो लेकर आई थीं…

वो घर में मौजूद प्यार देखकर फुस्स हो गया।


“ओह… अच्छा… थ... ठीक है।”

उनकी आवाज़ हल्की काँप गई।


राहुल ने भी देखा—

नीना के ससुराल में कोई उसे तंग नहीं कर रहा था।

बल्कि सब उसे आराम दे रहे थे।



घर लौटते हुए…


कार में वापसी का सफ़र बिल्कुल शांत था।

राहुल बार-बार अनामिका की कही बातें याद कर रहा था।

सासुमा भी सोच में थीं…

पर इगो इतनी भारी थी कि स्वीकार न कर सकीं।




घर पहुँचकर भी… बदलाव नहीं...


अनामिका ने दरवाज़ा खोला।

सासुमा ने उसे देखा…

पर नजरें फेर लीं।


वह समझ गई—

उनके दिल में बेटी के लिए जगह हमेशा ज़्यादा रहेगी।

बहू के लिए नहीं।


अनामिका ने बस मन ही मन कहा—


“दर्द तो वही असली है

जिसे हर बार अनदेखा किया जाए।”


और घर में फिर वही दिनचर्या शुरू हो गई—

किसी के लिए नियम अलग,

किसी के लिए अलग।


लेकिन यह कहानी अनामिका के मन में हमेशा दर्ज रह गई—


“औरत के दो चेहरे नहीं होते…

पर समाज उसके दो रूप बना देता है—

एक बेटी,

एक बहू।”


#SasuralReality #DaughterVsDaughterInLaw


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