रिश्तों का आईना

 

An Indian couple standing in a tense moment inside their home, the woman visibly upset and the man quietly hurt, showing emotional conflict in a family setting.


शाम के लगभग आठ बज रहे थे। घर में ट्यूबलाइट की हल्की सफ़ेद रोशनी के बीच नंदिनी रसोई में चपातियाँ सेंक रही थी। तभी पीछे से आरव की आवाज आई,


“सुनो नंदिनी… एक बात कहनी थी।”

वो धीरे-धीरे डाइनिंग चेयर खींचकर बैठ गया।


“हम्म… बोलो।”

नंदिनी ने बिना उसकी तरफ देखे कहा।


“माँ और पूजा दीदी कल सुबह हमारे घर आ रही हैं… बस एक दिन रुकेंगी।”


पलभर में नंदिनी का चेहरा बदल गया।

उसने गर्म तवा सिंक में पटक दिया।


“क्यों आ रही हैं? यहाँ क्या खास है?”


आरव ने शांत स्वर में कहा,

“कुछ खास नहीं… बस तुमसे मिलना चाहती हैं।”


“तुम कहना क्या चाहते हो? मैं किसी की नर्स नहीं हूँ। तुम्हारी मम्मी और दीदी आएँगी तो मैं क्यों खाक सेवा करूँ?”

नंदिनी तीखी आवाज में बोली।


“नंदिनी… ऐसी बातें मत करो। वो एक दिन के लिए—”


“बस!”

नंदिनी ने उसे बीच में ही रोक दिया,

“अगर वो कल आ रही हैं तो मैं आज ही मायके जाऊँगी। अभी!”


“रात के आठ बजे मायके? ऐसी कौन-सी आग लगी है?”

आरव थक चुका था।


“तुमने जानबूझकर मुझे देर से बताया है… ताकि मैं निकल न सकूँ। मुझे सब पता है!”


आरव उठकर बाहर बालकनी में चला गया।

मूड उसका भी खराब हो चुका था।


उधर नंदिनी अपने कमरे में गई, बैग में कपड़े डाले और फोन पर अपने भाई राघव को कॉल कर दिया।



राघव की एंट्री...


थोड़ी देर में राघव अपनी बाइक लेकर पहुँच गया।

सिर्फ उन्नीस साल का था — पढ़ाई करता, सीधा-सादा लड़का।


दरवाजे के पास खड़े आरव से उसने धीरे से पूछा,

“क्या हुआ जीजाजी? दीदी ने अचानक क्यों बुलाया?”


अंदर से नंदिनी की झल्लाई आवाज आयी—

“तू जीजाजी से क्यों पूछ रहा है? चल!”


राघव सकपका गया। उसने आरव की ओर देखा, पर आरव ने सिर्फ एक हल्की सी उदास मुस्कान दी।

नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ा और गुस्से-गुस्से में बाहर निकल गई।



आरव की रात...


आरव ने कमरे में जाकर लाइट बंद की।

सोफ़े पर बैठते-बैठते उसने सिर थाम लिया।


आठ महीने की शादी… और आठ महीने की रोज़-रोज़ की कड़वाहट।

उसने कितने सपने देखे थे नंदिनी को घर लाने के।


माँ मीरा जी और बड़ी बहन पूजा के साथ वह अकेला ही रहता था।

पिताजी बहुत पहले गुजर गए थे।

मीरा जी ने घरों में खाना बनाकर और सिलाई करके दोनों बच्चों को बड़ा किया था।


जब आरव की प्राइवेट नौकरी पक्की हुई थी, उसने माँ का सिलाई का काम बंद करवा दिया।

“अब आराम करो माँ… आपकी जिम्मेदारी मेरी।”


शादी भी बड़े अरमानों से की गई थी।

लेकिन नंदिनी को ससुराल के रिश्तों में कभी दिलचस्पी नहीं थी।

वह सिर्फ आरव तक सीमित थी और उसके मम्मी-दीदी उसे बिलकुल पसंद नहीं थीं।


कई बार अनबन होती, झगड़े होते, और पड़ोसियों तक आवाजें जातीं।

आखिर शांतिपूर्ण माहौल के लिए आरव माँ-बहन से अलग किराए के घर में रहने लगा—

ताकि टकराव कम हो जाए।


लेकिन नंदिनी का रवैया कभी नहीं बदला।


माँ के पास...


रात लगभग दस बजे, आरव ने घर बंद किया और माँ के घर पहुँच गया।


मीरा जी ने दरवाजा खोला तो उसे देखते ही सब समझ गईं।

उनकी आँखें भर आईं, पर वह मुस्कुराईं।


“आ जा बेटा… खाना खा ले पहले।”


खाना खाते समय उन्होंने एक शब्द नहीं कहा।

सिर्फ प्यार से परोसा, सिर सहलाया।


अगला पूरा दिन आरव ने वहीं बिताया।

वो शांत था, पर भीतर बहुत टूटा हुआ।


शाम को माँ ने कहा,

“बेटा, घर जा… कल ऑफिस है।”


आरव ने हल्की मुस्कान दी,

“हाँ माँ… आज शायद वो घर लौट आई होगी।”



जैसा कि आरव ने सोचा था,

नंदिनी घर लौट आई थी।

लेकिन दोनों ने एक-दूसरे से बात नहीं की।



अगला रविवार...


अभी सुबह हुई ही थी कि नंदिनी ने उत्साहित होकर कहा,


“आरव! आज कहीं मत जाना। दीदी-जीजाजी आ रहे हैं। साथ में मम्मी-पापा और राघव भी। आज सब यहीं लंच करेंगे और फिर हम सब शाम को चलेंगे घूमने।”


आरव ने सिर्फ एक शब्द कहा —

“हम्म।”


वो तैयारियों में लग गई।

चमकते चेहरे, खुशी से भरी आवाज—

जैसे कल का गुस्सा उसने महसूस ही नहीं किया हो।


कुछ देर बाद मायके वाले आ भी गए।

दरवाजा खुला हुआ था।


“अरे दामादजी कहाँ हैं?”

उसके पापा ने सोफे पर बैठते हुए पूछा।


नंदिनी अंदर गई… पर कमरे खाली थे।


“पता नहीं पापा… अभी तो यही थे।”


फोन लगाया—

पहले नहीं उठाया… फिर तीन बार बाद उठाया।


“कहाँ हो?”


आरव का ठंडा जवाब आया—

“मेरा वहाँ क्या काम? तुम्हारे मायके वाले हैं… तुम बैठो।”

और फोन काट दिया।


नंदिनी सन्न।

मायके वाले हैरान।

वातावरण गरम।


दीदी बोलीं,

“ये क्या बिहेवियर है?”


मम्मी बोलीं,

“क्या आपकी मम्मी ने आपको यही सिखाया है—कि बहू के मायके वालों की बेइज़्ज़ती की जाए?”



रात को आरव घर आया।

नंदिनी ग़ुस्से से तपती हुई वहीं खड़ी थी, चेहरा तमतमाया हुआ और आँखों में तेज़ चिंगारियाँ जल रही थीं।


“तुम्हें पता था सब आ रहे हैं। फिर क्यों गायब हो गए?”


आरव शांत स्वर में बोला,

“वही वजह है… जो तुम्हारे मायके जाने की होती है।”


सास बोलीं,

“ये क्या तरीका है?”


आहिस्ता से आरव बोला,

“नहीं मम्मीजी… ये तरीका आपकी बेटी ने ही मुझे सिखाया है।”


सब स्तब्ध।


आरव ने आगे कहा—

“जब मेरी माँ और बहन आती हैं, नंदिनी घर छोड़कर चली जाती है। पिछले हफ्ते रात को गई थी। राघव लेकर गया था। पूछ लीजिए।”


राघव नीचे नजरें गड़ाए खड़ा था।


आरव ने साफ कहा—

“अब से आपकी बेटी जो करेगी, वही मैं करूँगा।

अगर उसके मायके वाले आएंगे, मैं घर से चला जाऊँगा।

रिश्ते एकतरफा नहीं निभते।

अगर वो निभाएगी, तो मैं भी निभाऊँगा।

वरना जो आज हुआ… अब हमेशा होगा।”


कमरे में सन्नाटा फैल गया।



कुछ हफ्तों बाद...


नंदिनी ने कई दिन आरव से बात नहीं की।

लेकिन आरव भी चुप रहा — बिना लड़ाई, बिना मनाने की कोशिश के।


दो-तीन बार फिर उसके मायके वाले आए और आरव सचमुच घर से चला गया।


धीरे-धीरे रिश्तेदारों ने प्रश्न पूछने शुरू कर दिए—

“तुम्हारा दामाद क्यों नहीं आता?”


तभी नंदिनी को समझ आया—

जिस चोट का दर्द उसे आज लगा है,

वही दर्द आरव की माँ और बहन भी झेलती थीं।


थोड़े दिन बाद उसने खुद फोन किया—

“आरव… बात करनी है।”


और इसी कॉल के बाद

नंदिनी ने पहली बार

आरव की माँ से आकर माफी मांगी।


रिश्ते धीरे-धीरे सामान्य होने लगे।

क्योंकि उसने सीख लिया था —

रिश्ते सिर्फ अपने नहीं होते… दूसरे के भी उतने ही जरूरी होते हैं।




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