मेरे फैसले… मेरी ज़िन्दगी
सुबह के साढ़े नौ बज रहे थे। घर के बड़े हॉल में सोफ़ा, कुर्सियाँ, तकिए, सब गोल घेरा बनाकर लगाए गए थे। और उस घेरे में बैठे थे—घर के सारे “बड़े-बड़े फैसले लेने वाले लोग”।
विषय वही था…
मैं।
और मेरी आदतें, खामियाँ, कमियाँ, और मेरे ज़रूरी काम-काज।
मैं रसोई में खड़ी थी और हॉल से आती आवाज़ें दीवारों से टकराकर मेरे कानों में पड़ रही थीं।
“आज ही फैसला करना होगा। सीमा का रवैया अब और नहीं चलेगा।”
मेरी सास सुनीता देवी ने कड़क आवाज़ में कहा।
“हाँ माँ, बिल्कुल! हर चीज़ में इतनी ढील? कोई टाइम मैनेजमेंट नहीं!”
बोला मेरे पति, करण।
आज घर में मेरी ही “मीटिंग” होनी थी—जैसे मैं कोई प्रोजेक्ट हूँ और ये लोग मेरे मैनेजर।
घर में मेरे ससुर महेश जी, सासू माँ, पति करण, ननद निधि, जेठानी रचना भाभी, जेठ दीपक—सब मौजूद थे। और आज सबकी ज़ुबान ने शिकायतों की लाइन लगा दी थी।
मैंने चाय की ट्रे उठाई और हॉल में गई। देखते ही मेरी सास ने ताना मारा—
“लो जी, इतनी देर में चाय लाई है। अब बताओ, क्या ऐसे घर चलता है?”
मैं चुप रही। मुस्कराई भी नहीं। बस ट्रे टेबल पर रख दी।
मैं सीमा सक्सेना… इस घर की बहू।
एक सरकारी बैंक में काम करती हूँ।
शादी को पाँच साल हो चुके हैं।
और जितने साल हुए हैं—उतने ही साल ये लोग मेरी “कमियाँ” ढूँढते रहे हैं।
आज सबने मिलकर तय किया कि अब मेरी “काउंसलिंग” की जाएगी।
और इसके लिए उन्होंने मेरे मायके वालों को भी बुलाना था—
लेकिन मेरी माँ की जगह…
उन्होंने मेरे छोटे भाई आरव को बुलाया।
आरव… जो आज ही दिल्ली से आया था पहली नौकरी ज्वॉइन करने के बाद।
जिसकी टाई मैं बाँधा करती थी।
जिसकी स्कूल फीस मैं देती रही।
जो कभी किसी से आँख मिलाकर बात भी नहीं करता था।
आज वही मेरे “बड़ों” के सामने बैठकर मेरी रिपोर्ट सुनने वाला था।
आरव का आना...
डोरबेल बजी।
मैंने दरवाज़ा खोला।
वहाँ आरव खड़ा था—शांत चेहरा, लेकिन सवालों से भरी आँखें।
“दीदी…”
बस इतना ही बोला।
मैंने सिर हिलाया और उसे अंदर ले आई।
हॉल में तिरछी निगाहें उस पर गिरीं, पर उसने सबको सम्मान से नमस्ते किया।
किसी ने जवाब नहीं दिया।
करण ने हाथ से इशारा किया—“बैठ जाओ।”
मतलब… आज बहू तो आरोपी हुई ही, उसका भाई भी बेइज्जती के लिए बुलाया गया है।
शिकायतों की बरसात...
मेरी सास शुरू हुईं—
“अरे बेटा, तुम्हारी दीदी कोई काम ठीक से नहीं करती। सप्ताह में दो बार मेरे घुटनों की दवा देनी भूल जाती है।”
“और सुबह चार रोटियाँ माँगोगे तो दो ही मिलेंगी,” ननद ने मुँह बनाकर कहा।
जेठानी भाभी ने भी तड़का लगाया—
“घर आए मेहमानों को भी खड़े-खड़े पानी देती है। बैठकर बात करने का भी शिष्टाचार नहीं।”
जेठ बोले—
“और इतना कमाती है फिर भी पूछो तो हिसाब नहीं बताती।”
पति करण, जो सबसे बड़ा जज बनकर बैठे थे—
“आरव, बात सीधी है—तुम्हारी दीदी में अनुशासन की कमी है। हमारी कोशिश बस इतनी है कि वो सुधर जाए।”
आरव चुप।
मैं चुप।
कमरा चीख-चीखकर उनकी एकतरफा सुनवाई का तमाशा देख रहा था।
अब मेरी बारी थी...
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“आरव… सुनो।
क्योंकि आज फैसला मेरा नहीं—मेरे बारे में है।”
सब शांत हो गए।
मैंने एक-एक को देखना शुरू किया।
“ये लोग कहते हैं मैं दवा देना भूल जाती हूँ…
लेकिन मम्मी जी सोशल मीडिया पर रोज़ तीन घंटे रील देखकर समय नहीं भूलतीं।
भूल सिर्फ तब होती है…
जब जिम्मेदारी मुझे सौंपनी होती है।”
सासु माँ का चेहरा उतर गया।
मैंने आगे कहा—
“निधि को बुरा लगता है कि उसकी माँ उसके कमरे की सफाई करे…
पर उसे ये बुरा नहीं लगता कि नौकरी से लौटने के बाद भी सारा काम सीमा ही संभालती है?
तुम्हारी ज़रूरतें तुम्हारे लिए होंगी निधि…
मेरी नहीं।”
निधि का मुँह सूख गया।
“रचना भाभी को खाना परोसना मेरा फर्ज़ लगता है…
जबकि वो खुद दो कदम चलकर प्लेट उठा लें तो अनादर हो जाएगा?”
भाभी नज़रें झुकाकर बैठ गईं।
फिर मैंने पति करण की तरफ देखा—
“आपको मेरे पैसे कहाँ जाते हैं, इसका हिसाब चाहिए?
जबकि आधी सैलरी आपके पापा के कर्ज़ में जाती है।
बच्चों की फीस मैं भरती हूँ।
घर का राशन मैं लाती हूँ।
और फिर भी—मेरे खर्चे पर उँगली?”
करण कुछ बोल ही नहीं पाया।
मैंने गहरी सांस ली।
“सच कहूँ…
मेरी ज़रूरतें मैं तय नहीं करती—ये लोग करते हैं।
और जब मैं अपने लिए खड़ी होती हूँ, तो उन्हें बुरा लगता है।”
आरव का जवाब—सबको हिला देने वाला...
आरव कुर्सी पर से उठा।
उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला—
“दीदी, मैं सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूँ…”
सब उसके मुँह की तरफ देखने लगे।
“अगर दीदी इतनी खराब, इतनी लापरवाह, इतनी जिम्मेदारीहीन है…
तो फिर ये लोग सात साल से इन्हें अपने घर में क्यों रखे हुए हैं?”
कमरा सन्न।
फिर आरव ने जेब से फोन निकाला—
“दीदी, चलो।
अभी चलो।
तुम्हारी नौकरी है, कमाई है, इज़्ज़त है।
तुम्हें यहाँ किसी की जरूरत नहीं।
और यहाँ किसी को तुम्हारी कद्र नहीं।”
उसके शब्दों ने कमरे की हवा जमा दी।
सास घबराईं—
“अरे बेटा, ऐसे गुस्से में फैसले नहीं लिए जाते…”
“आंटी,” आरव ने शांति से कहा,
“गुस्सा मुझे नहीं है।
गुस्सा आपके शब्दों में है, आपकी बातों में है।
दीदी को यहाँ रखकर आपको खुशी नहीं…
बस सुविधा मिलती है।”
करण को जैसे करंट लगा—
“आरव, तुम ओवररिएक्ट कर रहे हो!”
आरव हल्का-सा मुस्कुराया—
“अगर मैं ओवररिएक्ट कर रहा हूँ तो दीदी को रहने दो।
अगर नहीं… तो मुझे जाने दो।”
सास, जेठानी, जेठ—सबके चेहरे उतर चुके थे।
अंत में ससुर बोले—
“नहीं बेटा, सीमा कहीं नहीं जाएगी।
हमने गलत किया कि तुम्हें बुलाया।
ऐसा फिर नहीं होगा।”
आरव ने बस इतना कहा—
“अच्छा है, समझ आ गया।”
वो मुझे देखकर बोला—
“दीदी, अब अपनी ज़रूरतें खुद तय करना।
अगर कोई दखल दे—तो बोल देना कि ये हक सिर्फ सीमा का है।”
मैंने सिर हिलाया।
और शायद पहली बार…
मैंने खुद को मजबूत महसूस किया।
उस दिन के बाद…
घर में कोई भी अब मेरी शिकायतों पर पंचायत नहीं बैठाता था।
मेरी फैसले कोई और तय नहीं करता था।
और मैं?
मैंने सीखा—
सम्मान माँगा नहीं जाता।
कमाया भी नहीं जाता।
वो बस—हक बनकर लिया जाता है।

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