छुट्टी किसकी ज़रूरी है?
सुबह का समय था। रसोई में गैस पर चाय चढ़ी थी और साथ ही माहौल भी उबल रहा था।
“मम्मी जी, आप दीदी को एक बात साफ़ कह दीजिए,”
नेहा ने संयम रखते हुए कहा,
“वो जब भी आती हैं, मुझसे उम्मीद करती हैं कि मैं ऑफिस से छुट्टी ले लूँ। रोज़-रोज़ ऐसा संभव नहीं है।”
नेहा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सास शांति देवी भड़क उठीं।
“तुम होती कौन हो ये तय करने वाली कि मेरी बेटी कब मायके आए?”
उनकी आवाज़ तेज़ हो गई,
“बहू हो, बहू की तरह रहो।”
नेहा ने गहरी साँस ली।
“मम्मी जी, मुझे आपकी बेटी से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन मैं नौकरी करती हूँ। हर बार छुट्टी लेना आसान नहीं होता।”
“अरे बड़ी आई नौकरी वाली!”
शांति देवी ताना मारते हुए बोलीं,
“तेरी नौकरी से ही तो पूरा घर चल रहा है जैसे! हमारे ज़माने में ननद आती थी तो हम सब काम छोड़कर उसकी खातिरदारी करते थे।”
नेहा चुप रही।
लेकिन अंदर ही अंदर उसका सब्र टूट रहा था।
बार-बार मायका...
नेहा की ननद सुमन जब चाहे मायके चली आती थी।
उसके पति का ट्रैवल का काम था, बच्चे नहीं थे, और सास-ससुर दूसरे बेटे के पास रहते थे।
जब भी सुमन अकेली होती—
सीधा मायके।
और आते ही उसका एक ही सवाल होता—
“भाभी, आप आज घर पर रहोगी न?”
नेहा एक स्कूल में अकाउंट क्लर्क थी।
महीने का अंत, ऑडिट, फाइलें, सैलरी शीट—
काम की कोई कमी नहीं थी।
पिछली बार जब सुमन आई थी, उस समय स्कूल में वार्षिक रिपोर्ट का काम चल रहा था।
नेहा सुबह सबके लिए खाना बनाकर ऑफिस चली गई।
बस यहीं से बात बिगड़ी।
शिकायत का सिलसिला...
“मम्मी, देखिए न,”
सुमन ने थाली आगे खिसकाते हुए कहा,
“भाभी के रहते मुझे ठंडा खाना खाना पड़ रहा है।”
शांति देवी तुरंत भावुक हो गईं।
“हाय रे, एक ही तो बेटी है मेरी। उसके लिए भी छुट्टी नहीं ले सकती?”
“टीचर नहीं है, कोई बड़ी अफ़सर है क्या?”
सुमन ने बात बढ़ाई।
नेहा उस समय घर पर नहीं थी,
लेकिन शाम को जब पति अमित आया—
तो उसे सब कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा चुका था।
पति-पत्नी के बीच खटास...
रात को अमित ने नेहा से कहा,
“थोड़ा एडजस्ट नहीं कर सकती थी क्या?”
नेहा की आँखें भर आईं।
“मैं हर बार एडजस्ट ही तो कर रही हूँ।
पर मेरी नौकरी क्या मज़ाक है?”
अमित चुप हो गया।
आज फिर वही दिन...
आज फिर सुमन आने वाली थी।
नेहा तैयार होकर ऑफिस निकलने लगी।
शांति देवी ने रास्ता रोक लिया।
“मैंने कहा था न, सुमन आ रही है। फिर तू कहाँ जा रही है?”
नेहा ने शांत स्वर में कहा,
“मम्मी जी, आज भी ऑफिस में काम है। छुट्टी नहीं मिल सकती।”
इतने में सुमन आ गई।
“वाह भाभी!”
उसने व्यंग्य से कहा,
“टीचर ही तो हो, कोई जज तो नहीं जो छुट्टी न मिले।”
नेहा अब चुप नहीं रही।
सच की आवाज़...
“सुमन जी,”
नेहा ने साफ़ कहा,
“मेरी नौकरी भी ज़िम्मेदारी है।
मुझे भी जवाब देना पड़ता है।”
“आप जब चाहें यहाँ आ जाती हैं,
और चाहती हैं कि मैं सब छोड़कर आपके साथ बैठूँ।
ये कहाँ की बराबरी है?”
सुमन चौंक गई।
“और रिश्ते निभाने की बात…”
नेहा बोली,
“तो पहले आप भी निभाना सीखिए।
आपके सास-ससुर अकेले रहते हैं,
आप वहाँ क्यों नहीं जातीं?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पहली बार साथ...
तभी अमित बोला—
“नेहा गलत नहीं कह रही।”
शांति देवी कुछ कहने को हुईं,
लेकिन बेटे की तरफ़ देखकर रुक गईं।
सुमन को पहली बार एहसास हुआ—
कि हर रिश्ता ज़बरदस्ती नहीं चलाया जा सकता।
उस दिन के बाद सुमन पहले से कम आने
लगी।
और जब आती—
तो नेहा से छुट्टी की उम्मीद नहीं करती।
घर में शांति लौट आई थी।
क्योंकि
रिश्ते तब ही चलते हैं,
जब ज़िम्मेदारियों की क़दर हो।
सीख:
रिश्ते निभाने का मतलब यह नहीं होता कि एक ही व्यक्ति हर बार त्याग करे।
हर इंसान की अपनी ज़िम्मेदारियाँ होती हैं—चाहे वह बहू हो, बेटी हो या ननद।
जब तक हम एक-दूसरे के काम, समय और सम्मान की क़दर नहीं करते,
तब तक परिवार में शांति संभव नहीं होती।
समझदारी वहीं है, जहाँ रिश्ते ज़बरदस्ती नहीं, आपसी सम्मान से निभाए
जाएँ।

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