रिश्तों की गर्माहट
सुबह का समय था। सर्दियों की हल्की धूप पुराने रेलवे क्वार्टर के टूटे-फूटे बरामदे में झर रही थी। उसी बरामदे में एक आदमी अपनी लकड़ी की बैसाखियों के सहारे धीरे–धीरे चलने की कोशिश कर रहा था। उम्र करीब 40 साल, चेहरे पर थकान, पर आँखों में एक अजीब सी शांति।
उसका नाम था देव प्रताप सिंह।
कभी देव एक मशहूर आर्किटेक्ट था। कई बड़े–बड़े सरकारी प्रोजेक्ट उसने डिजाइन किए थे। लेकिन दो साल पहले हुए एक निर्माण हादसे में वह अपने एक पैर से चलने की क्षमता खो बैठा। जिस साइट पर उसने खुद इमारत बनाने का नक्शा बनाया था, उसी जगह पर गिरकर उसकी जिंदगी बदल गई थी।
पहले जहां घर में उसके कदमों की धमक गूंजती थी, अब बैसाखियों की कमजोर ठक–ठक सुनाई देती थी। पत्नी राधिका पहले संभालने की कोशिश करती रही, लेकिन धीरे–धीरे उसमें भी झुंझलाहट बढ़ने लगी।
“देव, कब तक ऐसे चलेगा? दवाइयाँ, किराया, राशन… सब मुझसे नहीं संभलता!”
देव शांत आवाज में कहता, “मैं कोशिश कर रहा हूँ राधिका… किसी छोटे डिज़ाइन काम की तलाश—”
राधिका ताना मारती,
“कौन देगा काम? ऐसी हालत में?”
देव के मन में वह हर ताना हथौड़े की कील की तरह धँस जाता।
खामोशी उसका सबसे बड़ा साथी बन गई।
वह रात जिसने सब बदल दिया...
एक रात बारिश बहुत तेज हो रही थी। बिजली भी चली गई थी।
राधिका थककर बोली,
“देव, मैं टूट चुकी हूँ इस बोझ तले। हर तरफ बस चिंता, दबाव, खर्चे… तुम समझते क्यों नहीं!”
देव कुछ सेकेंड तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला—
“अगर मैं बोझ बन गया हूँ… तो शायद मुझे ही हट जाना चाहिए।”
और वह अपने कमरे की तरफ बढ़ने के बजाय बाहर चला गया।
राधिका चुप रही…
दरवाज़ा बंद हो गया।
बारिश और तेज हो गई।
देव भीगता हुआ पुराने रेलवे स्टेशन के पीछे वाली खाली जगह में जा बैठा।
भीगा शरीर… टूटे सपने…
दूर कहीं ट्रेन की सीटी गूँज रही थी।
उसी समय एक सफेद कार उसके पास आकर रुकी।
एक आदमी उतरा—करीब 45 साल का, सलीकेदार कपड़े, शांत चेहरा।
“माफ़ कीजिए… क्या आप देव प्रताप सिंह ही हैं?”
देव चौंका—
“हाँ… लेकिन आप कौन?”
आदमी मुस्कुराया,
“मैं अर्जुन मेहता, मेहता इंफ्राटेक का डायरेक्टर। हमें आपका भेजा हुआ ‘लो-हाइट मोबाइल रैम्प सिस्टम’ का डिज़ाइन मिला है। हमने उसे टेस्ट किया… और वह कमाल का है।”
देव को याद आया—कई महीने पहले उसने अपना डिज़ाइन कई संस्थानों को भेजा था, पर कहीं से जवाब नहीं आया।
अर्जुन फिर बोला,
“कल हमारे चेयरमैन आपसे मिलना चाहते हैं। क्या आप आएंगे?”
देव हिचकिचाया,
“मेरी… हालत देख रहे हैं ना?”
अर्जुन झुककर बोला,
“हमें आपकी हालत नहीं—आपकी काबिलियत चाहिए।”
अगली सुबह, देव ने अपनी सबसे अच्छी—लेकिन पुरानी—शर्ट पहनी।
बाल ठीक किए। पुराना फाइल बैग उठाया।
और बैसाखियों के सहारे मेहता इंफ्राटेक के हेड ऑफिस पहुँचा।
सिक्योरिटी गार्ड से लेकर स्टाफ तक—सब उसे देखकर हैरान थे।
एक लाचार सा आदमी…
एक बड़ी कंपनी में?
रिसेप्शनिस्ट बोली,
“आप किससे मिलना चाहते हैं?”
देव शांत स्वर में—
“अर्जुन मेहता जी से।”
उससे पहले कि वह कुछ कहती, लिफ्ट से अर्जुन खुद दौड़ता हुआ नीचे आया।
सबके सामने वह देव के सामने झुका और बोला—
“वेलकम मिस्टर देव प्रताप सिंह।”
पूरा ऑफिस देखता रह गया।
चेयरमैन से मुलाकात...
देव को लिफ्ट से लेकर 12वीं मंज़िल के विशाल मीटिंग रूम में ले जाया गया।
वहाँ खड़े थे —
कृष्णकांत मेहता, कंपनी के चेयरमैन।
70 की उम्र, पर आत्मा अब भी जवान।
उन्होंने देव का हाथ पकड़कर कहा—
“आप जैसे लोग समाज बदलते हैं। हम चाहते हैं कि आप हमारे एक्सेसिबिलिटी इनफ्रास्ट्रक्चर हेड बनें।”
देव के हाथ काँप गए।
“सर… मैं तो ठीक से चल भी नहीं—”
चेयरमैन ने बीच में ही कहा,
“पैर से नहीं, दिमाग से काम करना होता है बेटे।”
कमरे में तालियां गूँज उठीं।
देव की आँखों में आँसू थे—लेकिन सपने वाले आँसू।
शाम की इवेंट—और राधिका का सच...
उसी शाम एक छोटी प्रेस मीट थी।
देव अब टीम के बीच बैठा था—काबिल और सम्मानित।
उसी समय पीछे एक जानी पहचानी आवाज आई—
“देव…!”
देव ने मुड़कर देखा—
वह थी राधिका।
वह स्कूल की मीटिंग के लिए उसी बिल्डिंग में आई थी।
देव को उस माहौल में देखते ही उसका दिल कांप गया।
“देव… तुम यहाँ? किसी काम से आए हो?”
देव शांति से बोला,
“हाँ… लेकिन काम माँगने नहीं।”
अर्जुन पीछे से आया—
“मैडम, ये हमारे नए एक्सेसिबिलिटी हेड हैं… श्री देव प्रताप सिंह।”
राधिका के हाथ से फाइल गिर गई।
चेहरा सफेद पड़ गया।
उसी वक्त चेयरमैन कृष्णकांत मेहता भी आए।
उन्होंने सबके सामने कहा—
“देव जी सच में हमारी कंपनी की रीढ़ हैं। इनके डिज़ाइन से देश के हजारों दिव्यांग लोगों को नई जिंदगी मिलेगी।”
राधिका की आँखों से तेज आँसू बहने लगे।
वह धीरे से बोली—
“देव… मैंने तुम्हें समझा ही नहीं… मैं गलत थी।”
देव मुस्कुराया,
“अगर तुम मुझे नहीं छोड़ती… तो शायद मैं खुद को कभी नहीं ढूँढ पाता।”
हॉल तालियों से गूंज उठा।
देव का भाषण...
देव मंच पर गया।
लाइट्स, कैमरे… पूरा हॉल भरा हुआ था।
देव ने धीमी लेकिन मजबूत आवाज में कहा—
“दो साल पहले मैंने चलने की ताकत खो दी थी… पर आज मैं खड़े होने की ताकत पा चुका हूँ।
दिव्यांग हम नहीं हैं… कमी दुनिया की सोच में है।”
हॉल में खड़े लोग रो पड़े।
तालियाँ रुक ही नहीं रही थीं।
कुछ हफ्ते बाद—देव की सबसे बड़ी जीत....
देव अपनी बेटी आर्या के स्कूल पहुँचा।
आज उसका “स्पेशल टैलेंट शो” था।
आर्या मंच पर गई और बोली—
“मेरे पापा चल नहीं सकते…
लेकिन उनके सपनों की उड़ान इतनी ऊँची है कि उसे कोई रोक ही नहीं सकता।”
पूरा सभागार खड़ा हो गया।
तालियाँ, चीखें, सिटियाँ—सब देव के लिए।
देव की आँखों में चमक थी—
एक ऐसी चमक जो तकलीफों से नहीं, जीत से पैदा होती है।
सीख / संदेश:
जब जिंदगी रास्ता बंद कर देती है, तब एक नया रास्ता आपकी हिम्मत बनाती है।
कमजोरी शरीर में होती है, इंसान के इरादों में नहीं।

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