दिखावे का बोझ

 

An emotional Indian woman sitting quietly in a modest home, reflecting silent struggle and domestic reality.


सुबह के पाँच बज रहे थे।


अनिता की नींद मोबाइल की अलार्म से नहीं,

पीठ में उठे दर्द से खुली।


वह चुपचाप पलंग से उतरी, ताकि मनोज की नींद न टूटे।

कल देर रात तक वह दोस्तों के साथ बैठा रहा था—

किसी की नई गाड़ी,

किसी की प्रमोशन पार्टी,

किसी की बेटी की शादी की चर्चा।


अनिता को आदत थी—

उसकी थकान किसी चर्चा में शामिल नहीं होती थी।


रसोई में घुसते ही उसने सबसे पहले गैस जलाई।

चाय चढ़ी,

टिफ़िन बने,

सब्ज़ी कटी,

दाल धुली।


बीच-बीच में वह बच्चों के कमरे में चली जाती—

कभी उनके कंबल ठीक करती,

कभी बिखरी हुई कॉपियाँ ढूँढती,

तो कभी इधर-उधर पड़े मोज़ों को जोड़ती।


मनोज उठकर आया तो बोला—

“आज शर्मा जी के घर जाना है।

उनकी सालगिरह है।

तुम ठीक-ठाक तैयार रहना।”


अनिता ने सिर हिला दिया।


उसने यह नहीं पूछा—

क्यों ज़रूरी है जाना?

क्योंकि उसे जवाब पता था—

“बड़े लोगों से रिश्ते रखने चाहिए।”



तुलना का ज़हर...


शाम को तैयार होते समय

मनोज आईने में खुद को देखता रहा।


“तुम ये साड़ी क्यों पहनती हो हर बार?

थोड़ा मॉडर्न भी हुआ करो।

देखो, शर्मा जी की पत्नी—

कितनी एलिगेंट रहती है।”


अनिता ने कुछ नहीं कहा।


वह सोच रही थी—

अगर मैं कह दूँ कि शर्मा जी खुद कितने समझदार हैं,

तो क्या यह तुलना सही लगेगी?


नहीं।

तब वह बदचलन कहलाएगी।



शर्मा जी के घर में सब चमकता था—

फर्श,

झूमर,

लोगों की हँसी।


अनिता को वहाँ हमेशा अपनी कुर्सी छोटी लगती थी।


खाने की मेज़ पर किसी ने कहा—

“आप क्या करती हैं?”


“स्कूल में पढ़ाती हूँ,”

अनिता ने विनम्रता से कहा।


सामने बैठी महिला मुस्कुराई—

“अच्छा…

आजकल तो प्राइवेट ट्यूशन में ही ज़्यादा कमाई हो जाती है।”


मनोज चुप रहा।


वह चुप रहना जानता था—

जब बात उसकी पत्नी की होती थी।



घर की दीवारें...


घर लौटते समय ऑटो में

मनोज ने कहा—

“तुम ज़्यादा बोलती क्यों नहीं?

थोड़ा खुला करो।”


अनिता के मन में कुछ टूट गया।


खुलना?

कहाँ?

किसके सामने?


जिस घर में उसकी हर बात

शिकायत कहलाती थी,


जहाँ सवाल करना बदतमीज़ी था

और चुप रहना ही

समझदारी,


वहाँ खुलने की गुंजाइश

आख़िर बची ही कहाँ थी?



कुछ दिनों बाद

मनोज के मामा की बेटी की शादी का बुलावा आया।


पाँच सितारा होटल।

डेस्टिनेशन वेडिंग।


मनोज की आँखें चमक उठीं।


“ऐसी शादी मिस नहीं कर सकते।

पूरा खानदान होगा।”


अनिता ने डरते हुए कहा—

“इतना खर्च…

हम संभाल नहीं पाएँगे।”


मनोज भड़क गया—

“तुम्हें बस पैसों की चिंता रहती है।

इज़्ज़त का भी कोई मोल होता है।”


अनिता समझ गई—

इज़्ज़त का मोल

हमेशा उसी से चुकाया जाता है

जिसके पास आवाज़ कम होती है।



गहनों का दर्द...


रात गहरी हो चली थी।

घर के सारे कमरे सो चुके थे, पर अनिता की आँखों में नींद नहीं थी।

वह चुपचाप अलमारी के पास बैठी, तिजोरी खोली और अपने गहने निकालकर हथेलियों पर रख लिए।


एक-एक गहना जैसे बीते समय की कहानी सुना रहा था।

इन चूड़ियों में उसकी माँ की नम आँखें थीं—

बेटी की विदाई के वक़्त छुपाए गए आँसू।


इस हार में पिता की वर्षों की मेहनत थी—

ओवरटाइम, अधूरी इच्छाएँ और बेटी के भविष्य की चिंता।


अनिता ने गहनों को देर तक निहारा।

ये सिर्फ़ सोना नहीं थे,

ये उसके मायके का भरोसा थे,

उसकी अस्मिता की आख़िरी पूँजी।


उन्हें गिरवी रखने का ख़याल

उसके दिल पर बोझ बनकर उतर आया।


और अब—

उन्हें गिरवी रखने की तैयारी।


वह रोई नहीं।

बस देर तक बैठी रही।



शादी वाले दिन

जब स्टेशन पहुँचे,

तो पता चला—


उनका नाम सूची में नहीं।


“सीमित मेहमान हैं,”

फोन पर जवाब मिला।


मनोज का चेहरा

एक पल में खाली हो गया।


वह वही आदमी था

जो दूसरों की हैसियत गिनता था,

और आज खुद

सूची से बाहर था।



घर लौटकर

मनोज सोफे पर बैठ गया।


अनिता ने चुपचाप बच्चों को खाना दिया।


उस रात कोई झगड़ा नहीं हुआ।


बस एक भारी चुप्पी थी।



रात काफ़ी बीत चुकी थी।

कमरे में अँधेरा था, पर मनोज की आँखों में नींद नहीं थी।


काफ़ी देर की चुप्पी के बाद उसने धीमे स्वर में कहा—

“शायद… हम उन लोगों के नहीं हैं।”


उसके शब्द हवा में लटक गए—

थके हुए, टूटे हुए।


अनिता ने करवट बदली।

उसकी आवाज़ बहुत हल्की थी,

मानो खुद से ही कह रही हो—


“हम अपने थे,

और अपने ही रह सकते थे…

काश यह बात

हम पहले समझ पाए होते।”


कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

पर इस बार वह सन्नाटा

दर्द के साथ

एक सच्चाई भी छोड़ गया था।


मनोज के पास

कोई जवाब नहीं था।


अनिता पहली बार

खुद को हल्का महसूस कर रही थी—

क्योंकि आज

दिखावे का बोझ

उसने उतार दिया था।


यह कहानी उन रिश्तों पर आधारित है, 

जहाँ दिखावे की कीमत अक्सर किसी एक को चुकानी पड़ती है।




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