आसमान का हक
आंगन में रखी पुरानी लकड़ी की बेंच पर बैठी शारदा बहुत देर से एक ही दिशा में देखे जा रही थी। सामने अमरूद का पेड़ था, जिसकी टहनियाँ हवा में धीरे-धीरे हिल रही थीं। पत्तों की सरसराहट उसे किसी अनकहे संवाद की तरह लग रही थी—जैसे समय उससे कुछ कहना चाहता हो।
पास की मेज़ पर एक खुली कॉपी रखी थी। उसके पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे थे। शारदा उन्हें पलटने नहीं दे रही थी, न ही बंद कर रही थी। जैसे चाहती हो कि शब्द खुद बोलें, खुद उसे याद दिलाएँ कि कभी वह भी अपने मन की बातें लिखा करती थी।
घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं।
आज हर मिनट उसे भारी लग रहा था।
आज उसकी बेटी आर्या पहली बार देश से बाहर जा रही थी।
शारदा उठी और कॉपी उठाकर अलमारी की ओर बढ़ी। वही अलमारी, जिसे उसने वर्षों से खोला नहीं था। जैसे उसमें केवल किताबें नहीं, उसका अतीत बंद था। कॉपी रखते समय उसका आँचल अलमारी के कोने में अटक गया। उसने हल्के से छुड़ाया और मुस्कुरा दी।
उसे लगा, जैसे अलमारी भी उससे कह रही हो—
अब मुझे भी आज़ाद कर दो।
उसने अलमारी खोली। भीतर किताबें सजी थीं—कुछ के पन्ने पीले पड़ चुके थे, कुछ अब भी अपनी पुरानी खुशबू सँभाले हुए थीं। शारदा ने एक किताब निकाली, धूल झाड़ी और कुछ पल उसे सीने से लगाए खड़ी रही।
उसकी आँखें भर आईं।
कभी शब्द उसके अपने थे।
कभी सपने उसके अपने थे।
फिर धीरे-धीरे सब कुछ पीछे छूटता चला गया।
शादी के शुरुआती दिन बुरे नहीं थे। अजय पढ़ा-लिखा था, नौकरी करता था। शारदा को लगा था कि वह उसे समझेगा। लेकिन समय के साथ बातें बदलने लगीं।
“इतना पढ़ना ज़रूरी है?”
“हर वक्त किताबें?”
ये सवाल पहले हल्के थे, फिर तंज़ बन गए।
शारदा चुप रह जाती।
आर्या के जन्म के बाद उसकी दुनिया उसी नन्ही जान में सिमट गई। रात-रात भर जागना, दिन में घर संभालना—सब करते हुए भी वह खुश थी। लेकिन घर में किसी और की उम्मीदें पल रही थीं।
“लड़की ही हुई है…”
“अब बेटा होना चाहिए।”
ये शब्द शारदा के मन में कहीं गहरे धँस जाते।
आर्या बड़ी होने लगी। वह आसमान को देखकर सवाल पूछती—
“माँ, आसमान इतना दूर क्यों है?”
“माँ, क्या मैं भी पायलट बन सकती हूँ?”
शारदा उसे सीने से लगा लेती।
“तुम जो चाहो बन सकती हो।”
यही बात अजय को सबसे ज़्यादा खटकती थी।
“लड़की को ज़्यादा सपने मत दिखाओ,”
“ज़मीन पर रहना सिखाओ।”
एक दिन बात बहुत बढ़ गई।
अजय ने साफ़ कह दिया—
“या तो मेरी बात मानो, या यह घर छोड़ दो।”
उस रात शारदा बहुत देर तक जागती रही।
सुबह आर्या ने उसे गले लगाकर कहा—
“माँ, डर मत… मैं हूँ ना।”
और उसी पल शारदा ने फैसला कर लिया।
घर छोड़ना आसान नहीं था।
ज़िंदगी और भी कठिन हो गई।
छोटा-सा किराए का कमरा,
कम पैसे,
ढेर सारी चिंताएँ।
दिन में काम,
शाम को आर्या की पढ़ाई,
रात को थकान से चूर शरीर।
कई बार वह बाथरूम में चुपचाप रोती।
कई बार मन टूटने को होता।
लेकिन आर्या की आँखों में चमक देखकर वह खुद को संभाल लेती।
आर्या पढ़ाई में तेज़ थी।
उसके सपने बड़े थे।
और शारदा ने कभी उसके पंख नहीं काटे।
सालों की मेहनत, त्याग और संघर्ष के बाद आज वही सपना सच हो रहा था।
शारदा खिड़की के पास खड़ी हो गई।
आसमान साफ़ था।
हल्के बादल तैर रहे थे।
फोन की घंटी बजी।
“हैलो?”
“शारदा… मैं अजय बोल रहा हूँ।”
कुछ पल के लिए उसका दिल काँपा, लेकिन आवाज़ स्थिर रही।
“कहो।”
“सुना है… आर्या विदेश जा रही है?”
“हाँ।”
“तुमने उसे बहुत ऊपर पहुँचा दिया।”
शारदा हल्के से मुस्कुराई।
“मैंने बस उसे उसका हक़ दिया।”
उधर कुछ देर चुप्पी रही।
फिर धीमी आवाज़ आई—
“क्या अब भी मेरे लिए तुम्हारी ज़िंदगी में कोई जगह है?”
शारदा ने आसमान की ओर देखा।
उसे लगा, जैसे उसके सारे सवालों के जवाब उसी नीले विस्तार में लिखे हों।
“कुछ दरवाज़े,” उसने शांत स्वर में कहा,
“समय पर न संभाले जाएँ, तो फिर सिर्फ़ यादों में ही खुले रहते हैं।”
फोन कट गया।
शाम ढल रही थी।
शारदा ने दीपक जलाया।
मन में शांति थी।
आँखों में संतोष।
कहीं बहुत ऊपर, उसकी बेटी अपने सपनों की ओर उड़ रही थी।
और शारदा को लगा—
आज उसने भी अपने जीवन का सबसे लंबा, सबसे कठिन,
और सबसे सुंदर सफ़र पूरा कर लिया है।

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