छोटी मम्मी की एक हफ्ते की मेहमान–नवाज़ी

 

Elderly Indian aunt being warmly welcomed by her family, daughter-in-law performing aarti, children greeting her with love, emotional reunion at home.


अम्मा की मौत को दो साल हो चुके थे। घर चलता तो पहले जैसा ही था, पर दिलों में उनकी खाली जगह आज भी उतनी ही गहरी थी।

इन दो सालों में एक बार भी छोटी मम्मी (पिताजी की छोटी बहन) हमारी तरफ नहीं आई थीं। हर बार कहतीं—

“अरे बेटा, इस बार नहीं। तबियत ठीक नहीं।”

“अगले महीने पक्का आऊँगी।”

लेकिन महीने आते-जाते रहे।


और फिर एक दिन अचानक फोन आया—

“बेटा, मैं इस बार सच में आ रही हूँ। टिकट करवा ली है।”


मैं और नीलम (मेरी पत्नी) दोनों हैरान रह गए। पिताजी तो सुनते ही चुप हो गए—जैसे अम्मा की कोई पुरानी याद अचानक सामने आ गई हो।



पहला दिन: घर में पुराने दिनों की खुशबू...


सुबह-सुबह हम स्टेशन पहुँच गए। गाड़ी लगी तो दिखीं—

छोटी मम्मी वही पुरानी मुस्कान के साथ, पर चेहरे पर थकान की लकीरें साफ दिखाई दे रहीं थीं।


नीलम ने दौड़कर उनके पैर छुए।

छोटी मम्मी ने उसका सिर सहलाते हुए कहा—

“बहू नहीं, मेरी बेटी हो तुम।”


घर पहुँचे तो जैसे घर की दीवारें तक मुस्कुरा उठी हों।

नीलम भागकर रसोई में गई और उनके लिए गरम-गरम मूँग दाल की खिचड़ी बनाई।

पहला निवाला लेते ही छोटी मम्मी बोल उठीं—

“अरे, ऐसी खिचड़ी तो मुझे तुम्हारी अम्मा ही खिलाती थी…”


नीलम चुपचाप मुस्कुरा दी।



दूसरा दिन: रसोई ही सबसे बड़ा रिश्ता...


सुबह छोटी मम्मी बरामदे में बैठकर तुलसी में पानी डालती रहीं। पिताजी उन्हें देखते रहे—बिना कुछ बोले।


नीलम रसोई में थी। उसने धीमे से कहा—

“आज आपकी पसंद का आलू–पोस्ता बनाऊँ?”

छोटी मम्मी चौंककर बोलीं—

“तुझे मेरी पसंद कैसे याद?”

“फोन पर आपने कभी बताया था,” नीलम हँसकर बोली।


दोपहर में खाना लगा। छोटी मम्मी हर निवाला खाते-खाते अम्मा को याद करती रहीं।

घर का माहौल धीरे-धीरे फिर से उसी पुरानेपन में ढल रहा था।



तीसरा दिन: बच्चों की बातें और यादों का खेल...


दोनों बच्चे सुबह-सुबह उनके कमरे में घुस गए।

“दादी-चाची, कहानी सुनाओ!”


छोटी मम्मी ने शुरू किया—

अम्मा कैसे गर्मी में नीम की छांव में चारपाई डालकर सबको मैंगो फेंटा पिलाती थीं…

कैसे बारिश में सब भीगकर पकौड़ें खाने बैठ जाते थे।


नीलम रसोई से ये सारी बातें सुनती रही।

उसकी आँखों में भी एक नरमी उतर आई—जैसे वो भी किसी अपने की बातें सुन रही हो।


दोपहर बाद नीलम ने सूजी का हलवा बनाया। प्लेट रखकर बोली—

“आपके लिए खास।”


छोटी मम्मी की आँखें चमक उठीं—

“अम्मा की याद दिला दी तूने…”



चौथा दिन: मन की गाँठें खुलना...


बुधवार की दोपहर छोटी मम्मी और पिताजी बरामदे में बैठे थे।

छोटी मम्मी बोलीं—

“भइया, जब भाभी(अम्मा) बीमार पड़ी थीं, तब नीलम ने जितना संभाला… वो तो कोई बेटी भी न कर पाती।”


पिताजी ने नीलम की ओर देखा और पहली बार मुस्कुराए—

“हाँ, ये तो तुम लोगों का घर संभालने के साथ-साथ माँ को भी सम्भाल रही थी।”


नीलम ने धीमे से कहा—

“अम्मा कोई एक नहीं होती… घर की हर दीवार में रहती है।”


ये सुनकर छोटी मम्मी की आँखें छलक गईं।



पाँचवाँ दिन: बाजार की भाग-दौड़ और एक खास सौगात...


नीलम ने सुबह कहा—

“ज़रा गोभी, आटा और देसी घी ले आओ। आज छोटी मम्मी की पसंद के पराँठे बनेंगे।”


मैं बोला—

“अरे इतना झंझट क्यों? बाजार से पराँठे ले आते हैं।”

नीलम ने धीरे से कहा—

“ये उनका मायका है। यहाँ उन्हें ‘दुकान वाला स्वाद’ नहीं, ‘घर का एहसास’ मिलेगा।”


दोपहर बाद नीलम मुझे साथ लेकर बाज़ार गई।

साड़ी की दुकान में हरे रंग की हल्की रेशम की साड़ी चुनी।

मैंने पूछा—

“इतनी महंगी क्यों?”

नीलम बोली—

“कीमत साड़ी की नहीं… उनकी सबसे बड़ी भाभी के प्यार की है।”


मैं चुप हो गया।



छठा दिन: दुआओं की छतरी...


आज छोटी मम्मी पूरे घर में घूमकर आशीर्वाद देती रहीं।

बच्चों के सिर सहलाए—

“खूब पढ़ना, खूब बढ़ना।”

नीलम के हाथ थामकर बोलीं—

“तूने मेरे भइया का घर बचा लिया। खुश रह बेटी।”


शाम को आँगन में सब बैठकर बातें करते रहे।

छोटी मम्मी बोलीं—

“मायका जगह नहीं होता, अहसास होता है। और जब बहुएँ उसे सँभाल लेती हैं, तो घर अपने आप भर जाता है।”


नीलम ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप मुस्कुराती रही।



सातवाँ दिन: विदाई की चुभन और मिठास...


सुबह से ही माहौल भारी था।


नीलम ने उनके लिए दाल–पुरी और सूखे आलू बनाए।

फिर जाते समय हल्की हरी साड़ी उनके हाथ में रख दी—

“इसे पहनकर हमें याद कीजिएगा।”


छोटी मम्मी ने उसे गले लगाकर कहा—

“बहू नहीं—तू तो मेरी भाभी जैसी है। अम्मा की महक तेरे हाथों में है।”


स्टेशन पर गाड़ी छूटने लगी तो बच्चों ने रोते हुए उनका हाथ पकड़ा।

छोटी मम्मी ने खिड़की से हाथ हिलाते हुए कहा—

“अब कभी नहीं टालूँगी। तुम लोगों ने मुझे घर की नहीं, भाभी की याद दिला दी है।”



अंतिम भाव…


घर लौटते समय कार में सन्नाटा था।

लेकिन मन के अंदर एक हल्की-सी गर्मी थी—जैसे कोई पुराना रिश्ता फिर से सांस लेने लगा हो।


मैंने नीलम की ओर देखा।

वह शांत थी। पर उसकी आँखों में तृप्ति थी—

जैसे उसने सिर्फ मेहमान की खातिरदारी नहीं की,

बल्कि रिश्तों की सूखी शाखाओं पर फिर से कोमल पत्ते उगा दिए हों।


उस हफ्ते

 ने सिखाया—


“घर दीवारों से नहीं, उसे निभाने वाली बहू के दिल से चलता है।

जब वह मायके की इज़्ज़त और अपनी ससुराल का अपनापन साथ जोड़ ले,

तो मायका सिर्फ एक ठिकाना नहीं रहता—

वो रिश्तों की गर्माहट से भरा जीवंत एहसास बन जाता है।”


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