मैं कामवाली नहीं… घर की महारानी हूं!
दरवाज़ा खुलते ही मैंने अपनी चप्पल ज़ोर से पटकी और बोली—
“ओ मैडम साहिबा! पहले मुझे यह बताइए—आप मुझे समझती क्या हैं?”
आपके घर में आते ही आप मुझे आवाज़ देती हैं—
“ए बाई! ए कामवाली! ए झाड़ू-पोंछा वाली!”
जरा कान खोलकर सुन लीजिए—
मैं कोई 'ए–बे–सी' नहीं हूं।
मेरा नाम है—शांति।
और नाम से बुलाना हो तो ठीक,
नहीं तो सिर्फ ‘मेड’ कहिए।
बाकी नौकरानी-वौकरानी तो मैं किसी की भी नहीं।”
मैं जिस घर जाती हूं, वहां मैं रानी बनकर रहती हूं।
नौकरी को मैं अपनी जूती की तरह रखती हूं—
मिज़ाज खराब हुआ तो उसी वक्त दोटकिया नौकरी को लात मारकर निकल जाऊं।
यह मत भूलिए—
गरज आप को है मेरी।
मेरे हाथों का काम देखने वाली दस और सोसायटियाँ लाइन में खड़ी हैं।
टाइम की टेंशन मुझसे मत कीजिए
मैडमजी, आप लोग घड़ी में बंधे रहते होंगे—
मैं नहीं।
मैं अपनी मर्जी से उठती हूं,
आराम से चाय पीती हूं,
अपने बच्चों को स्कूल भेजती हूं,
ज़रा सा मेकअप करके, चुटकी बजाकर निकलती हूं।
आप अगर बोलें—
“बाई, टाइम पर आया करो!”
तो मैं साफ कह दूंगी—
“टाइम पर काम कराना हो तो रोबोट खरीद लो,
मैं इंसान हूं…और वह भी स्टाइल वाली!”
मोबाइल मेरा है… और बातें भी मेरी..
मैं फोन पर किसी से भी जितनी देर चाहूं बात करूं—
यह आपका काम नहीं है।
आप कहें—
“बाई, काम पड़ा है, फोन मत चलाओ!”
तो मैं पलट कर बोल दूंगी—
“काम भागा नहीं जा रहा मैडम,
पहले मेरी बात खत्म होने दीजिए।”
जब भी मुझे चाय की तलब लगेगी,
मैं खुद बोलकर बनवाऊंगी—
“एक कड़क, मीठी, दूध-झाग वाली स्पेशल चाय बना दीजिए।
तभी मेरा मोटर चलता है।”
वरना काम तो क्या,
मैं झाड़ू भी नहीं उठा सकती।
टीवी देखना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार...
दोपहर को अगर मैं 10 मिनट टीवी चला लूं,
अपना सीरियल देख लूं,
तो आपकी आंख न फड़के।
मैं सीरियल से बहुत कुछ सीखती हूं—
कौन सा डिटर्जेंट पाँच हाथों का झाग देता है,
कौन सा बर्तन धोने वाला जेल सौ नींबू की शक्ति देता है।
ये सब ज्ञान मैं अपने भले के लिए तो ले ही रही हूं,
आप के घर का भी फायदा हो रहा है!
सास–ससुर? माफ़ करना मैडम!...
आपके घर में बूढ़े सास–ससुर रहते हों
तो मैं काम ही नहीं लेती।
क्योंकि वे तो झाड़ू की तरह सिर पर पड़े रहते हैं—
“ये कर! वो कर! ऐसे क्यों किया! वहां क्यों नहीं झाड़ा!”
बहू पर तो चलती नहीं,
और अपनी सारी भड़ास हम पर निकालते हैं।
मैं ऐसे घरों में कदम नहीं रखती।
बच्चे शैतान हों तो दो थप्पड़ मेरा प्यार है...
अगर आपके बच्चे परेशान करें
और मैं प्यार से एक चपत लगा दूं,
तो सीधे थाने मत भाग जाना।
मेरे अपने बच्चे भी हैं,
उन्हें भी मैं कभी-कभी कूट देती हूं।
आपके बच्चे भी मेरे जैसे ही हैं—
थोड़ी बहुत डांट-फटकार से बड़े ही होंगे।
छुट्टियाँ = मेरी मर्यादा..
हफ्ते में एक छुट्टी तो फिक्स।
उसके अलावा—
– तीज-त्योहार
– घर में शादी
– बीमारी (सच्ची-झूठी दोनों)
– रिश्तेदार की मौत (वह भी कई बार)
ये सब छुट्टियाँ मुझे मिलनी ही मिलनी हैं।
अगर मेहमान आपके घर आने वाले हों,
तो छुट्टी करना मेरा बुनियादी हक है।
एडवांस? वो तो मिलेगा ही...
माह की शुरुआत में ही मैं बोल दूंगी—
“मैडम, चार–पाँच हजार एडवांस कर दो न।”
आप नानुकर करेंगी,
पर देंगे आप ही,
क्योंकि दूसरा चारा नहीं।
और काटूँगी मैं सिर्फ सौ-दो सौ।
कभी-कभी पूरा लेकर ही गायब भी हो सकती हूं।
अरे…हाथ की सच्ची हूं,
प्रैक्टिस्ड हूं।
चीजें गुम हों तो शक मत करना...
सूई–धागा तक मैंने कभी नहीं चुराया।
बाकी चीजों का क्या है—
घर में इतने लोग आते-जाते हैं।
कौन कब उठाए, मुझे थोड़े पता चलता है?
हां…
खबर देना मेरा काम है।
कौन कब बाहर जाता है,
अलमारी की चाबी कहां है,
किस का नया फोन आया…
मुझे सब पता रहता है।
मैं कुछ नहीं करती…
बस दूसरों को रास्ता दिखा देती हूं।
**आपके साहब और साहबजादे?
वो तो खुद फिसलते हैं**
अगर झाड़ू लगाते समय मेरी साड़ी ज़रा ऊपर उठ जाए,
या ब्लाउज थोड़ा डीप हो,
और साहब की निगाहें फिसल जाएं—
तो इसमें मेरी क्या गलती?
जो बख्शीश देगा,
मैं थोड़ी मना करूंगी?
और आपको बताएगी भी क्यों?
घर की इज्ज़त घर में ही रहे यह मेरा भी उसूल है।
हमारी यूनियन सब संभालती है...
हम मेडों की यूनियन है।
मैं उसकी सचिव हूं।
हर महीने मीटिंग होती है—
कहाँ कितना वेतन बढ़वाना है,
कहाँ हड़ताल करनी है,
कहाँ धमकी देनी है—
सब डिसाइड होता है।
मालकिन गलत निकली तो
हम थाने-कचहरी तक जाने में
ज़रा भी नहीं डरते।
कानून अक्सर मजदूर के साथ ही रहता
है—
यह हम भली-भांति जानती हैं।
अंत में मैं साफ बोल देती हूं—
“मैडम, आपको काम पर रखना हो तो शांति की शर्तों पर रखिए।
वरना मैं तो चली…”
पल्लू झटकते हुए,
अकड़ दिखाते हुए,
मैं दरवाज़े की ओर मुड़ गई।
शांति पल्लू झटकते हुए जाने लगी ही थी कि मैडम ने अचानक आवाज़ दी—
“रुको शांति… जरा ये बताओ,
तुम इतनी अकड़ में क्यों हो?
हमने तो तुम्हारा कुछ बिगाड़ा भी नहीं…”
शांति मुड़ी, गहरी सांस ली और बोली—
“अकड़ नहीं है मैडम…
ये तो मेरी ढाल है।
जो हर घर में मुझे अपमान से बचाती है।”
मैडम चौंक गईं—
“किस बात का अपमान?”
शांति हँसी, मगर आंखें भीग गईं—
शांति का सच — जिसे वह कभी दिखाती नहीं थी...
“आप जैसे पढ़े-लिखे लोग हम पर दया नहीं करते मैडम,
हम पर हुक्म चलाते हैं।
हमारे मन की सुनते नहीं,
सिर्फ हमारी मजबूरी देखते हैं।
एक घर में मुझे ‘महारानी’ कहा जाता है—
दूसरे घर में मुझे ‘बाई’ कहकर ऐसे दौड़ाया जाता है
जैसे मैं इंसान नहीं, मशीन हूं।
किसी घर में मुझे अपने हाथ का बचा-खुचा खाना मिलता है,
किसी घर में बच्चे मुझे पत्थर की तरह बोलते हैं—
‘ए बाई, ये कर! वो कर!’
आप लोग भूल जाते हैं—
हम भी इंसान हैं,
हमारे भी सपने हैं,
हम भी प्यार, सम्मान और अच्छाई समझते हैं।”
मैडम बिल्कुल शांत।
पहली बार उन्होंने शांति को इस नजर से देखा—
जैसे वह कामवाली नहीं,
एक थकी हुई औरत, एक जुझारू मां,
और एक सम्मान की भूखी इंसान हो।
शांति ने और बताया—
“मैं जानती हूं, मेरा रवैया कठोर है।
पर आपने कभी सोचा है मैडम…
अगर मैं नरम पड़ गई
तो लोग मुझे पैरों तले कुचल देंगे।
कभी किसी ने मुझसे पूछा ही नहीं—
‘शांति, तुम्हें क्या तकलीफ़ है?’
‘तुम्हारी जिंदगी कैसी है?’
‘तुम्हें कैसा बर्ताव पसंद है?’
इसलिए मैं पहले ही अपने नियम बता देती हूं…
ताकि बाद में कोई मुझे दबा ना सके。”
मैडम की आंखें नम हो गईं
उन्होंने धीरे से कहा—
“शांति…
हमसे गलती हुई।
हम भी तुम्हें मशीन की तरह देखने लगे थे।
पर तुम सही कहती हो—
इंसान को इंसान की तरह ही व्यवहार मिलना चाहिए।”
शांति ने पहली बार मुस्कुराकर देखा—
“बस यही तो कहना चाहती हूं मैडम…
सम्मान दीजिए,
काम खुद-ब-खुद हो जाएगा।”
और कहानी का असली संदेश यहीं खुलता है
मैडम ने कहा—
“आज से तुम बाई नहीं…
हमारे घर की सदस्य हो।
हम भी बदलेंगे,
तुम भी बदलो।”
शांति ने हिचकते हुए कहा—
“मैं भी अपनी अकड़ थोड़ी कम कर दूंगी मैडम…
पर आप भी मेरी बात सुना कीजिए।”
दोनों ने एक-दूसरे की ओर मुस्कुराकर देखा—
और उस दिन से दोनों की जिंदगी बदल गई।
कहानी का मूल भाव:
✔ हर इंसान सम्मान, आदर और सुने जाने के योग्य है।
✔ घरेलू काम करने वाली महिलाएँ मज़बूरी नहीं, संघर्ष में जीने वाली मज़बूत औरतें होती हैं।
✔ मालिक और मेड का रिश्ता उतार चढ़ाव से नहीं, समझ और सम्मान से चलता है।
✔ हक़ और मर्यादा दोनों तरफ होने चाहिए।
✔ किसी की अकड़ के पीछे अक्सर दर्द छिपा होता है।

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