जब रिश्ते तोले जाने लगें
सुबह के पाँच बजे थे।
भोर की रोशनी अभी ठीक से फैली भी नहीं थी,
लेकिन रसोई में मीरा का दिन शुरू हो चुका था।
चूल्हे पर चाय चढ़ी थी
और दिमाग़ में वही पुरानी उलझन—
आज जाना चाहिए या नहीं?
आज मीरा की जेठानी सुनीता
अपने नए घर का गृहप्रवेश कर रही थी।
किसी ने मीरा को फोन नहीं किया था।
न जेठानी ने,
न ससुराल के किसी और सदस्य ने।
फिर भी सास, पार्वती देवी ने
रात को साफ़ कह दिया था—
“बहू, कल सुबह तैयार रहना।
सबको जाना है।”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि वह जानती थी—
अगर सवाल पूछे,
तो जवाब ताने में बदल जाता है।
मन का डर...
मीरा को वहाँ जाना अच्छा नहीं लग रहा था।
पहले भी एक बार
वह बिना बुलावे गई थी।
उस दिन किसी ने सीधे अपमान नहीं किया था,
लेकिन नज़रें, अनदेखी और ताने—
सब कुछ बहुत साफ़ था।
वह सोच रही थी—
क्या हर बार मेरी चुप्पी
को मेरी कमजोरी समझा जाएगा?
तभी पति अजय की आवाज़ आई—
“मीरा, माँ ने कहा है
तो चलना पड़ेगा।”
मीरा ने बस चुपचाप सिर हिला दिया।
गृहप्रवेश वाला घर बड़ा था,
सजावट शानदार थी।
लेकिन घर के भीतर कदम रखते ही
मीरा को लगा,
जैसे वह किसी अपने घर में नहीं,
बल्कि किसी अजनबी जगह आ गई हो।
जेठानी सुनीता ने उसे देखा
और फिर नज़र फेर ली।
न कोई मुस्कान,
न कोई स्वागत।
मीरा चुपचाप एक कोने में बैठ गई।
वहाँ बैठी-बैठी उसने देखा—
जो लोग ज़्यादा पैसे वाले थे,
उन्हें आगे की कुर्सियाँ मिली थीं।
और जो रिश्ते में पास थे,
लेकिन गिफ्ट में हल्के—
उन्हें पीछे बैठाया गया।
मीरा ने साधारण-सा तोहफ़ा दिया था—
साफ़ दिल से,
अपनी सीमित हैसियत में।
सुनीता ने पैकेट हाथ में लिया,
एक पल तौलती-सी नज़र डाली
और बिना खोले अलग रख दिया।
मीरा का दिल बैठ-सा गया।
वह समझ गई—
यहाँ रिश्ते नहीं,
रकम देखी जाती है।
घर लौटने का सन्नाटा...
वापसी में अजय खामोश था।
मीरा भी।
घर पहुँचते ही पार्वती देवी ने पूछा—
“सब ठीक रहा?”
मीरा ने पहली बार हिम्मत करके कहा—
“नहीं माँ जी,
सब ठीक नहीं था।”
पार्वती देवी चौंकीं—
“क्या हो गया?”
मीरा ने धीरे-धीरे सब बताया।
अपमान नहीं—
बस अनदेखी…
जो अपमान से भी ज़्यादा चुभती है।
कुछ महीनों बाद
सुनीता के बेटे का मुंडन था।
फिर वही तैयारियाँ,
फिर वही दबाव।
इस बार मीरा ने साफ़ कहा—
“मैं नहीं जाऊँगी।”
पार्वती देवी नाराज़ हो गईं—
“बहू, रिश्ते निभाने होते हैं।”
मीरा ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“रिश्ते निभाने के लिए होते हैं माँ जी,
तोले जाने के लिए नहीं।”
अजय ने पहली बार खुलकर साथ दिया—
“माँ, मीरा सही कह रही है।”
यह सुनकर पार्वती देवी चुप हो गईं।
मुंडन में
मीरा और अजय नहीं गए।
लोगों ने पूछा—
“देवर-देवरानी नहीं आए?”
सुनीता का चेहरा उतर गया।
उसे पहली बार लगा—
शायद उसने कुछ खो दिया है।
कुछ दिनों बाद
सुनीता खुद मीरा के घर आई।
पहली बार
बिना ताने,
बिना शिकायत।
“शायद मैंने तुम्हें
कभी समझा ही नहीं,”
सुनीता ने धीरे से कहा।
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया—
बस चाय रख दी।
सीख:
रिश्ते तभी चलते हैं
जब सम्मान दोनों तरफ़ से हो।
जो रिश्ते आपकी चुप्पी पर टिके हों,
वे आपके बोलते ही हिल जाते हैं।
और जो हिल जाएँ—
उन्हें संभालने की ज़िम्मेदारी
किसी एक की नहीं होती।

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