जिस दिन अम्मा दिखाई देना बंद हो गई
अम्मा को सबसे ज़्यादा अच्छा लगता था—
सुबह का समय।
जब घर सच में घर हुआ करता था,
और लोग केवल लोग नहीं, अपने होते थे।
अब सुबह भी वैसी नहीं रही थी।
खिड़की के बाहर से अख़बार वाला हॉर्न बजाकर निकल जाता,
लेकिन कोई अम्मा से नहीं पूछता—
“चाय पीओगी?”
पहले पूछते थे।
अब मान लेते थे—
“अम्मा को क्या ही चाहिए।”
यह शहर का नया इलाका था।
ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, सीसीटीवी कैमरे।
इसी इलाके के सबसे अच्छे घर में अम्मा रहती थीं,
पर हक़ और अपनापन अब सिर्फ़ दस्तावेज़ों तक सिमट गया था।
बेटा अनिरुद्ध
यहाँ का जाना-माना वकील था।
उसकी पत्नी राधिका
क्लब, NGO और सोशल मीटिंग्स में व्यस्त रहती थी।
लोग कहते थे—
“बहुत सभ्य परिवार है।”
अम्मा सुनती थीं।
मुस्कुरा देती थीं।
घर में हर चीज़ की जगह तय थी—
जूते कहाँ रहेंगे,
कौन-सा कपड़ा कब पहनना है,
कब कौन बोलेगा।
घर में सब कुछ अपनी जगह पर था, बस अम्मा की जगह हर दिन थोड़ी-सी कम होती जा रही थी।
उनका कमरा पहले नीचे था।
फिर ऊपर हो गया।
फिर स्टोर के पास।
“सीढ़ियाँ कम चढ़नी पड़ेंगी।”
कहकर सबने खुद को तसल्ली दे दी।
अम्मा की आदत थी—
थोड़ा-थोड़ा खाकर
किसी से बात करना।
पर अब
बात करने वाला कोई नहीं था।
अनिरुद्ध सुबह जल्दी निकल जाता।
राधिका देर से उठती।
कामवाली सरोज आती,
घर चमकाती,
और चली जाती।
घर साफ़ रहता था,
पर खाली।
एक दिन अम्मा ने सरोज से पूछा,
“बेटी, आज क्या बना है?”
सरोज चौंकी।
“अरे अम्मा, आपको तो वही खाना दिया जाता है ना…
जो मैडम तय करती हैं।”
अम्मा कुछ नहीं बोलीं।
बस समझ गईं—
अब उनका स्वाद भी
उनका नहीं रहा।
धीरे-धीरे
उनकी थाली से चीज़ें गायब होने लगीं।
पहले घी।
फिर दही।
फिर फल।
“इस उम्र में ज़्यादा खाने की आदत ठीक नहीं होती।”
राधिका अक्सर ऐसे ही कह दिया करती थी।
अम्मा को याद आया—
जब अनिरुद्ध छोटा था,
तो आधी रोटी खुद खाकर
आधी उसे खिला देती थीं।
तब संयम कोई शब्द नहीं था,
वह बस माँ का स्वभाव था।
एक रात
अम्मा को तेज़ बुख़ार आया।
उन्होंने आवाज़ लगाई—
“अनिरुद्ध…”
टीवी चल रहा था।
आवाज़ दब गई।
उन्होंने फिर कोशिश की।
आवाज़ काँप गई।
कोई नहीं आया।
सुबह
सरोज ने देखा—
अम्मा ज़मीन पर बैठी थीं।
डॉक्टर आया।
दवा लिखी।
राधिका ने दवा रख दी।
“समय से ले लेना माँ जी।”
अम्मा ने दवा देखी—
और पहली बार सोचा—
अगर मैं न लूँ तो?
उस दिन
उन्होंने दवा नहीं ली।
न किसी को बताया।
न किसी को दोष दिया।
बस देखा—
क्या कोई पूछेगा?
किसी ने नहीं पूछा।
तीन दिन बाद
अम्मा खुद चलकर बैंक गईं।
वहाँ किसी ने उन्हें पहचाना नहीं।
पर उन्होंने खुद को पहचान लिया था।
खाते बदले।
नॉमिनी बदले।
वसीयत लिखी।
किसी के खिलाफ नहीं—
अपने लिए।
उन्होंने गाँव फोन किया।
पुराना घर खुलवाया।
वहाँ धूल थी,
पर ताले नहीं।
जब अनिरुद्ध को पता चला
कि खेत की कमाई नहीं आई,
तो वह चौंका।
“माँ से पूछो।”
राधिका ने कहा।
अम्मा ने पहली बार
फोन पर साफ़ कहा—
“अब मैं तुम्हारे हिसाब से नहीं जीती।”
अनिरुद्ध हँसा।
“माँ, नाटक मत करो।”
अम्मा ने फोन काट दिया।
एक हफ्ते बाद
वे गाँव चली गईं।
न ढोल,
न विदाई।
बस एक छोटा सा बैग
और सीधा कद।
गाँव में
लोगों ने पूछा—
“अकेली कैसे?”
अम्मा बोलीं—
“पहली बार अकेली नहीं हूँ,
पहली बार अपने साथ हूँ।”
अब वहाँ
हर दोपहर
बच्चे आते हैं।
कोई उन्हें अम्मा कहता है,
कोई दादी।
वे पढ़ाती नहीं,
बस बैठती हैं।
क्योंकि
जिसने जीवन पढ़ लिया हो,
उसे किताब खोलने की ज़रूरत नहीं होती।
शहर में
अनिरुद्ध का घर
अब भी चमकता है।
पर
जब कोई पूछता है—
“माँ कैसी हैं?”
वह जवाब बदल देता है।
और गाँव में
एक बूढ़ी औरत
हर रात
शांति से सोती है।
क्योंकि
अब उसे
किसी के उठने का इंतज़ार नहीं होता।
अंतिम बात :
कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में
तब तक जगह देते हैं,
जब तक हम उनके लिए सुविधा बने रहते हैं।
जिस दिन हम
आईना बन जाते हैं—
वे हमें छोड़ देते हैं।
और उसी दिन
हम खुद को पा लेते हैं।

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