खामोश कॉल
रात के ठीक दो बजे थे।
घर में हर तरफ़ सन्नाटा था।
अचानक ड्राइंग रूम में रखा फोन ज़ोर-ज़ोर से बज उठा।
नींद में डूबी सीमा घबराकर उठ बैठी।
“इतनी रात को…?”
फोन उठाया तो उधर से कांपती आवाज़ आई—
“मैडम… मैं स्कूल का सिक्योरिटी गार्ड बोल रहा हूँ। आप और आपके पति तुरंत आइए। पुलिस और मीडिया भी आ रही है… मामला बहुत गंभीर है।”
सीमा के हाथ से फोन छूट गया।
“क्या हुआ?”
बगल में सो रहे पति विकास ने घबराकर पूछा।
सीमा के होंठ सूख चुके थे—
“कॉल… रिया के स्कूल से थी…”
सब कुछ था, बस वक्त नहीं...
विकास एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर था।
सीमा एक नामी आर्किटेक्ट।
शानदार बंगला, दो गाड़ियाँ, हर साल विदेशी ट्रिप—
ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल परफेक्ट लगती थी।
उनकी 15 साल की बेटी रिया पढ़ाई में होशियार थी।
लेकिन घर में उसकी आवाज़ धीरे-धीरे गायब होती जा रही थी।
सुबह विकास जल्दी निकल जाता—
“लेट हो रहा है, शाम को बात करेंगे।”
शाम को सीमा थकी हुई लौटती—
“अभी सिर दर्द है बेटा, बाद में।”
बाद में…
जो कभी आता ही नहीं।
वो सवाल जो कभी नहीं पूछा गया...
रिया अक्सर कमरे में अकेली बैठी रहती।
मोबाइल में घंटों कुछ देखती, कुछ पढ़ती।
वो चाहती थी कोई पूछे—
“आज तुम ठीक हो?”
“कुछ परेशान तो नहीं?”
लेकिन उससे ज़्यादा सवाल फोन और लैपटॉप सुनते थे।
धीरे-धीरे रिया ने बाहर दुनिया में सहारा ढूँढ लिया—
सोशल मीडिया, नए दोस्त, ग्रुप चैट्स।
वहाँ उसे तारीफ़ मिलती थी।
वहाँ कोई सुनता था।
तुलना का ज़हर...
स्कूल के दोस्त अक्सर कहते—
“तेरे पापा तो इतने बड़े आदमी हैं, फिर तू इतनी सिंपल क्यों रहती है?”
कोई कहता—
“आजकल ब्रांड्स ही पहचान होते हैं।”
रिया चुप रहती, लेकिन अंदर कुछ टूटता जाता।
उसे लगने लगा—
शायद प्यार भी उसी को मिलता है
जिसके पास दिखाने के लिए ज़्यादा हो।
वो रात...
उस रात रिया ने कहा था—
“मम्मी, मैं सहेली के घर पढ़ने जा रही हूँ।”
सीमा ने बिना देखे कहा—
“ठीक है, जल्दी आ जाना।”
किसी ने नहीं पूछा—
कौन-सी सहेली?
कब लौटेगी?
उसी रात…
एक रूफटॉप पार्टी थी।
शोर, म्यूज़िक, नशा…
और एक गलत फैसला।
छत की रेलिंग पर खड़े होकर
किसी ने वीडियो बनाने को कहा।
रिया का पैर फिसला।
आईसीयू के बाहर
सीमा और विकास पत्थर बने खड़े थे।
डॉक्टर बोले—
“सिर में गहरी चोट है। दुआ कीजिए।”
सीमा रोते हुए बोली—
“मैंने अपनी बेटी को सुना ही नहीं…”
विकास की आवाज़ भर्रा गई—
“मैं मीटिंग्स में इतना उलझा रहा कि उसे देख ही नहीं पाया।”
अलमारी में छुपी आवाज़...
घर से कपड़े लाने गया विकास
पहली बार रिया के कमरे में देर तक रुका।
तकिए के नीचे
एक छोटी-सी डायरी मिली।
उसमें लिखा था—
“मुझे डर लगता है।
सबके बीच होते हुए भी अकेलापन चुभता है।
मम्मी-पापा बहुत अच्छे हैं,
पर शायद उनके पास मेरे लिए समय नहीं।”
अगली लाइन ने उसे तोड़ दिया—
“काश कोई मुझसे पूछता
कि मैं ठीक हूँ या नहीं।”
एक सुबह, जो सब कुछ बदल गई...
सुबह चार बजे
डॉक्टर बाहर आए।
“हमें अफ़सोस है…”
सीमा की चीख पूरे अस्पताल में गूँज गई।
विकास वहीं ज़मीन पर बैठ गया।
अब सब कुछ था—
लेकिन रिया नहीं।
अधूरी चिट्ठी...
डायरी के आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
“पापा,
अगर कभी छुट्टी मिले
तो मेरे साथ मॉर्निंग वॉक पर चलिएगा।
मुझे आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं।
मैं इंतज़ार कर लूँगी।”
विकास उस पन्ने को सीने से लगाए
फूट-फूटकर रो पड़ा।
रिया की याद में स्कूल में सभा हुई।
विकास ने कांपती आवाज़ में कहा—
“बच्चों को महंगे तोहफ़े नहीं,
आपका समय चाहिए।
अगर आपने उन्हें सुना नहीं,
तो एक दिन आप उन्हें हमेशा के लिए खो सकते हैं।”
पूरा हॉल खामोश था।
आज उस घर में
हर शाम बच्चों की आवाज़ें गूंजती हैं।
सीमा और विकास ने
एक छोटा-सा ओपन लिसनिंग सेंटर शुरू किया है।
दरवाज़े पर लिखा है—
“यहाँ बच्चे सुने जाते हैं।”
रिया लौटकर नहीं आई,
लेकिन उसकी चुप्पी
कई घरों को बोलना सिखा गई।
संदेश:
> बच्चे आपकी दौलत नहीं,
आपका वक्त चाहते हैं।
जो आज नहीं दिया,
कल माँगने का मौका भी नहीं मिलेगा।

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