जब एक बहू ने अपनी चुप्पी तोड़ी
“अरे सीमा बहू! ये क्या हाल बना रखा है? पायल, बिछुए, चूड़ियाँ… सब कहाँ हैं? ऐसे ही चली आई? जाओ, जाकर ढंग से तैयार होकर आओ!”
शांति देवी ने कमरे से निकलते ही डांट लगा दी।
सीमा ने धीरे से कहा,
“माँजी… हाथ-पैर में घाव हो गए थे, इसलिए उतार दिए।”
शांति देवी की त्यौरियाँ चढ़ गईं—
“घाव हो या पहाड़ टूट पड़े, सुहाग का सिंगार कभी नहीं हटाया जाता! ये सिंगार ही एक औरत को पूर्ण स्त्री बनाता है। मेरा बेटा तेरे सुहाग का आधार है। उसकी लंबी उम्र के लिए तुझे सिंगार करना ही पड़ेगा। अब इतनी नाज़ुक मत बनो। जाओ पहन लो सब!”
“पर माँजी… बहुत दर्द हो रहा है—”
“औरत हो तो दर्द सहना सीखो! घर की बहू हो—बहू की तरह रहो। जो कहा गया, वही करो!”
सीमा चुप हो गई। आँखों में आँसू भर आए। बिना कुछ कहे वह फिर अपने कमरे में लौट गई।
उस घर में सीमा क्या, कोई भी शांति देवी के सामने आवाज उठाने की हिम्मत नहीं रखता था।
तीन महीने पहले सीमा इस विशाल हवेली की बहू बनकर आई थी। गाँव में हर कोई कहता—
“अरे सीमा तो भाग्य लेकर आई है! ठाकुर दयाराम सिंह की बहू बन गई!”
पर उसे पता नहीं था कि ये घर भाग्य नहीं, एक क़ैदखाना है।
सीमा देखने में खूबसूरत थी। इसी वजह से दयाराम सिंह उसे देखते ही रिश्ता लेकर पहुँच गए थे।
सीमा के माता-पिता भी खुश हो गए—
“बेटी की किस्मत जग गई… इतना बड़ा घर… इतना रुतबा।”
लेकिन शादी की पहली ही रात सारा भ्रम टूट गया…
उसके पति रणविजय शराब के नशे में धुत्त होकर कमरे में आए।
उस रात सीमा ने मदद के लिए जितना भी चिल्लाया—
सब उसकी हल्दी-ढोलक की आवाज़ में दब गया।
सुबह माँ-बाप को फोन किया तो…
शांति देवी ने पहले ही समझा लिया था—
“इज्जत सबकुछ है। लड़की को समझाओ, घर बसाना सीखो।”
सीमा की बात सुनकर उसके माता-पिता भी चुप हो गए।
सीमा को वही मिला—
“सब्र करो, यही शादी है।”
रोज़ का नरक...
रणविजय को बस एक ही आदत थी—
नशा… और सीमा पर गुस्सा निकालना।
कई बार तो वो सीमा की कलाई इतनी जोर से पकड़ता कि खून निकल आता।
सीमा की चीखें कमरे में गूँजतीं, पर गलियारे में बैठी शांति देवी को फर्क ही नहीं पड़ता।
बल्कि वो कहती—
“बहू की चीखें सुहाग की निशानी होती हैं। कमज़ोर औरत घर नहीं बसा सकती।”
सीमा टूट रही थी… पर बोल नहीं पा रही थी।
वो रात जिसने सब बदल दिया...
उस रात सीमा ने खुद को बचाने की कोशिश की।
रणविजय फिर नशे में धुत्त होकर कमरे में घुसा था।
बाल खींचना, हाथ मरोड़ना, मारना… ये सब उसकी रोज़मर्रा थी।
सीमा चिल्लाई—
“मत मारो! बहुत दर्द हो रहा है।”
पर वो और उग्र हो गया।
सीमा ने खुद को छुड़ाने की कोशिश में उसकी कलाई जोर से धकेल दी।
रणविजय लड़खड़ाया और सिर पलंग के कोने से टकराया।
खून निकल आया।
पहली बार पूरे घर ने लड़की की नहीं, लड़के की चीख़ सुनी।
शांति देवी भागती हुई आईं—
“रणविजय! बेटा! क्या हुआ?”
जोर-जोर से दरवाज़ा पीटती रहीं।
आखिर दरवाज़ा खुद सीमा ने खोला।
शांति देवी गुस्से में पागल हो गईं—
“क्या किया तूने मेरे बेटे के साथ? पती पर हाथ उठा दिया? तू जैसी औरत…!”
सीमा अब चुप नहीं रही।
उसकी आँखें लाल थीं—दर्द से नहीं, अन्याय से।
वह चीखी—
“बस! एक शब्द और मत कहना माँजी!
नहीं बनना मुझे कोई पूर्ण स्त्री आपके हिसाब से!
पहले अपने बेटे को पूर्ण पुरुष बनाओ—
जो अपनी पत्नी की इज्जत करना सीखे!”
“चुप! ये घर छोड़ दे! निकल जा अभी के अभी!”
शांति देवी गरजीं।
सीमा ने ठंडे स्वर में कहा—
“हाँ, जा रही हूँ।
कम से कम हर रात नरक तो नहीं देखना पड़ेगा।”
सीमा जानती थी कि उसके मायके वाले वापस भेज देंगे।
इसलिए वह सीधे शहर चली गई।
वो पढ़ी-लिखी थी।
उसे एक छोटे से ऑफिस में नौकरी मिल गई।
महिला संगठन उसकी मदद पर खड़े हो गए।
कुछ महीनों बाद—
उसने तलाक ले लिया।
अब सीमा एक किराए के कमरे में रहती है।
खुद कमाती है, खुद जीती है।
कई बार रात को उसके घाव दर्द करते हैं…
लेकिन दिल में वो सुकून है जो हवेली में कभी नहीं मिला।
सीमा मुस्कान के साथ आईने में खुद को देखती है—
“पूर्ण स्त्री वही होती है,
जो अपने दर्द से ऊपर उठकर
अपने लिए खड़ी हो जाए।”

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