एक साज़िश, जो रिश्तों को तोड़ सकती थी
सुबह के करीब दस बजे का समय था। दरवाज़े पर घंटी बजी।
सुनैना काम में लगी थी। उसने बाहर जाकर दरवाज़ा खोला तो देखते ही खुशी से चिल्ला उठी—
“अरे बुआ जी! आप? आप कब आईं? मैं तो कई बार सोच रही थी कि गाँव आकर आपसे मिलूँ, लेकिन समय ही नहीं मिल पा रहा था। कभी मेरी छुट्टी नहीं मिलती, तो कभी रोहन की। आप तो बिना बताए ही वापस गाँव चली गई थीं… मैं आपसे मिल भी नहीं पाई।”
इतना बोल ही रही थी कि पीछे से उसकी बड़ी जेठानी मधु आ गई और बोली—
“अरे सुनैना! बोलती ही रहेगी क्या? बुआ जी को पानी-वानी भी पूछेगी या नहीं?”
“हाँ दीदी, अभी लाती हूँ।” सुनैना मुस्कुराकर रसोई में चली गई।
बुआ जी यानी शकुंतला देवी, थोड़ी हैरान-सी बैठी थीं।
वे मन ही मन सोच रही थीं—
“मैं कब गाँव गई? और यह किसने कहा? मैं अकेली गाँव क्यों जाऊँगी? सुनैना बेचारी तो मुझे सास जैसा मानती है। शायद कहीं कुछ गलत समझ रही है…”
असल में, सुनैना के सास–ससुर का बहुत पहले देहांत हो चुका था। घर के बड़े-बुज़ुर्ग की तरह केवल बुआ जी ही थीं, जिन्हें सब आदर देते थे। सुनैना तो उन्हें अपनी माँ जैसा ही मानती थी।
पर…
मधु को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि सुनैना और उसका मायका बुआ जी को इतना सम्मान दे।
कुछ देर बाद सुनैना चाय लेकर आई।
“लीजिए बुआ जी, चाय पीजिए।”
शकुन्तला देवी कुछ पूछने ही वाली थीं कि मधु बोल पड़ी—
“बुआ जी, चाय ठंडी हो जाएगी, पी लीजिए।”
बुआ जी फिर से चुप हो गईं।
दोपहर धीरे–धीरे शाम में बदल गई…
सुनैना काम भी कर रही थी और बीच-बीच में बैठकर बातें भी।
पर हर बार जब भी बुआ जी, सुनैना से गाँव वाली बात पूछना चाहतीं, मधु बीच में बोलकर बात बदल देती।
शाम को सुनैना ने फिर चाय दी और पूछा—
“बुआ जी, रात को क्या बनाऊँ?”
“नहीं बेटा, रहने दो, हम लोग थोड़ी देर में घर चले जाएँगे।”
“घर? आप लोग यहाँ से?” सुनैना ने हैरानी से पूछा।
बुआ जी कुछ कहतीं, उससे पहले ही मधु बोली—
“हाँ सुनैना, बुआ जी और ताऊ जी पास ही तो रहते हैं, दस मिनट का रास्ता है। ज्यादा देर हो जाएगी तो उनकी नौकरानी चली जाएगी।”
सुनैना चौंक गई।
दस मिनट? जबकि उनका गाँव तो 12–13 घंटे दूर था!
उसी समय ऑफिस का कॉल आ गया, और वह मजबूरी में वहाँ से उठकर काम देखने चली गई।
अब कहानी में मोड़ आया…
सुनैना के जाते ही मधु ने जल्दी-जल्दी कहा—
“बुआ जी, आप लोग निकलिए। सुनैना का फोन ऐसे ही चलता रहेगा। वह एक बार कॉल पर लगी तो घंटे भर नहीं आएगी।”
पर इस बार शकुंतला देवी को बात अटपटी लगी।
उन्होंने कहा—
“नहीं बहू, आज हम खाना खाकर ही जाएँगे। मैं नौकरानी को फोन कर दूँगी कि वह न आए।”
मधु के चेहरे का रंग उड़ गया।
अब उसकी साज़िश पकड़ी जाने वाली थी।
कुछ देर बाद ताऊ जी भी आ गए और बोले—
“चलो, घर चलते हैं।”
पर बुआ जी ने हाथ उठाकर कहा—
“पहले बात होगी, फिर चलेंगे।”
सच सामने आता है…
सुनैना वापस आई तो माहौल थोड़ा तनावपूर्ण लग रहा था।
वह बोली—
“बुआ जी, कपड़े लाई हूँ। पिछले महीने मेरे भाई की शादी थी, यह कपड़ा आपके और ताऊ जी के लिए पापा ने दिया है।”
शकुंतला देवी गुस्से में बोल पड़ीं—
“तुम्हारे पापा ने हमें शादी में बुलाया भी नहीं, और अब कपड़ा भेज दिया? यह दिखावा किसलिए?”
सुनैना एकदम स्तब्ध थी।
उसने तुरंत हाथ जोड़कर कहा—
“बुआ जी, आपको गलतफहमी हुई है। पापा ने तो कहा था कि वे आपको पहले निमंत्रण देंगे। पता नहीं क्या हुआ। फिर भी अगर कुछ गलत हुआ हो, तो मैं माफी माँगती हूँ।”
तभी ताऊ जी बोले—
“जो भी दिया है, खुशी से लो। हर बात में शक मत करो।”
पर बुआ जी का मन अब भी उलझा हुआ था।
उन्होंने कहा—
“नहीं, मुझे कुछ समझना है। आज साफ़-साफ़ बात होगी।”
उन्होंने मधु की तरफ देखा—
“सच बताओ। तुमने मेरे और सुनैना के बीच क्या किया है?”
मधु अब बच नहीं पाई।
रोते हुए बोली—
“बुआ जी… मुझे डर था कि आप अपनी ज़मीन–जायदाद छोटे बेटे यानी रोहन के नाम कर देंगी।
इसलिए मैंने…
मैंने आप और सुनैना के बीच दूरी डालनी शुरू कर दी।”
बुआ जी स्तब्ध रह गईं।
मधु ने आगे कहा—
“मैंने सुनैना के फोन से आपका नंबर डिलीट कर दिया।”
“दूसरे का नंबर आपके नाम से सेव कर दिया।”
“जब वह फोन करती, मैं कह देती— ‘गाँव में नेटवर्क नहीं होता।’”
“शादी का निमंत्रण भी मैंने ही छुपा लिया था।”
“और आपसे भी कहा कि सुनैना के घर वाले अब आपको नहीं मानते…”
यह सुनकर बुआ जी का सिर चकरा गया।
बुआ जी अब पूरी तरह समझ चुकी थीं
उन्होंने गहरी आवाज़ में कहा—
“मधु बहू…
इज्ज़त उम्र या पद से नहीं, व्यवहार से बनती है।
और तुमने रिश्तों की जड़ तक हिला दी।”
मधु रोते हुए बोली—
“बुआ जी, माफ कर दीजिए। सुनैना को मत बताइएगा। वह मुझे कभी सम्मान नहीं दे पाएगी।”
बुआ जी ने सख़्त आवाज़ में कहा—
“यह सुनैना को बताना ही पड़ेगा।
पर डाँटने के लिए नहीं…
बल्कि ताकि वह भविष्य में सतर्क रहे।
क्योंकि जिस घर में साज़िशें शुरू हो जाएँ, वहाँ विश्वास सबसे पहले मरता है।”
सुनैना सब सुन चुकी थी…
पर उसने शांत आवाज़ में कहा—
“दीदी, आप बड़ी हैं। परिवार की इज्ज़त आपके हाथ में है।
गलती हो गई…
पर अब दुबारा भरोसा मत तोड़िएगा।”
मधु फूट-फूटकर रो पड़ी।
ताऊ जी ने गंभीर स्वर में कहा
—
“घर बाँटने से नहीं, मन बाँटने से टूटता है।
आज सभी मिलकर नया अध्याय शुरू करें।”
और सच में…
उस दिन पहली बार घर में सच बोला गया,
और उसी सच ने रिश्तों को टूटने से बचा लिया।

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