अधूरी पहचान
कुछ रिश्ते नाम लेकर नहीं आते।
वे बिना दस्तक दिए भीतर उतरते हैं और फिर उम्र भर ठहरे रहते हैं।
यह कहानी भी वैसी ही थी—
न कोई वादा,
न कोई मुलाक़ात,
फिर भी एक पूरा प्रेम।
अन्वी को हमेशा लगता था कि ज़िंदगी में हर चीज़ का कोई ठोस कारण होता है।
कॉलेज जाना, घर लौटना, किताबें पढ़ना, नोट्स बनाना—
सब कुछ तयशुदा, समझ में आने वाला।
लेकिन उस दिन, जब उसने नोटिस बोर्ड पर अपना नाम देखा,
उसी सूची में एक और नाम भी था—
“आरव”।
बस नाम।
न चेहरा,
न आवाज़,
न कोई पहचान।
वह उसी सेक्शन का छात्र था,
उसी रोल नंबर रेंज में।
अटेंडेंस शीट में नाम नियमित दर्ज होता था,
पर क्लास में वह कभी दिखा नहीं।
अन्वी को पता नहीं क्यों,
पर वह नाम उसे अजीब तरह से खींचता था।
हर बार जब टीचर उपस्थिति पुकारते—
“अन्वी शर्मा”
“यस मैम”
और फिर—
“आरव वर्मा”
कमरे में एक अजीब-सी ख़ामोशी भर जाती।
“मैम, वो आज भी नहीं आए हैं।”
और नाम काट दिया जाता।
शुरुआत में यह बस जिज्ञासा थी।
फिर आदत बन गई।
और कब आदत एहसास में बदल गई—
अन्वी को खुद पता नहीं चला।
वह दोस्तों से पूछती—
“तुमने कभी आरव को देखा है?”
सब कंधे उचका देते।
“कौन आरव?”
“शायद कॉलेज छोड़ दिया होगा।”
“नाम तो सुना है, चेहरा नहीं।”
धीरे-धीरे
अन्वी उस अनदेखे शख़्स की कल्पना करने लगी।
वह कैसा होगा?
चुप रहने वाला या मुस्कुराने वाला?
खिड़की के पास बैठने वाला या आख़िरी बेंच पर?
रात को किताब बंद करते हुए
उसका नाम अचानक दिमाग़ में आ जाता।
नींद से पहले
मन खुद-ब-खुद उससे बातें करने लगता।
“अगर तुम सामने होते,
तो शायद मैं इतनी नहीं सोचती।”
फिर वह खुद पर हँस देती—
किससे बात कर रही हूँ मैं?
धीरे-धीरे वह चुप रहने लगी।
जो लड़की हर बात पर हँसती थी,
अब खिड़की से बाहर देखने लगी थी।
माँ ने यह बदलाव महसूस कर लिया।
एक शाम रसोई में सब्ज़ी काटते हुए बोलीं—
“अन्वी, कुछ परेशान लग रही हो आजकल।”
अन्वी ने पहले टालना चाहा,
पर शब्द खुद ही फिसल पड़े।
उसने सब बता दिया—
नाम, रजिस्टर, अनदेखा चेहरा,
और वो अजीब-सा अपनापन।
माँ ध्यान से सुनती रहीं।
बिना टोके।
बिना हँसे।
कुछ दिन बाद
माँ ने अलमारी से एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला।
उसमें एक तस्वीर थी।
अन्वी की माँ आरव को निजी रूप से नहीं जानती थीं। वह उसकी बीमारी के दौरान स्थानीय अस्पताल में नर्स रह चुकी थीं। इलाज और कॉलेज से जुड़े काग़ज़ात के सिलसिले में आरव उनसे कभी-कभी मिलता था। उसी दौरान उसकी तस्वीर भी ली गई थी। जब माँ ने अन्वी की आँखों में उस अनदेखे नाम की बेचैनी देखी, तो उन्होंने सच्चाई बताना ज़रूरी समझा।
अन्वी ने जैसे ही तस्वीर देखी,
दिल एक पल को रुक-सा गया।
सादा-सा चेहरा,
गहरी आँखें,
और एक थकी हुई मुस्कान—
मानो बहुत कुछ कहकर भी चुप रह गया हो।
माँ ने धीमे से कहा—
“आरव अब इस दुनिया में नहीं है।
बीमारी के कारण उसने कॉलेज छोड़ दिया था…
कुछ महीने बाद वह चला गया।”
अन्वी की माँ आरव को निजी रूप से नहीं जानती थीं। वह उसकी बीमारी के दौरान स्थानीय अस्पताल में नर्स रह चुकी थीं। इलाज और कॉलेज से जुड़े काग़ज़ात के सिलसिले में आरव उनसे कभी-कभी मिलता था। उसी दौरान उसकी तस्वीर भी ली गई थी। जब माँ ने अन्वी की आँखों में उस अनदेखे नाम की बेचैनी देखी, तो उन्होंने सच्चाई बताना ज़रूरी समझा।
अन्वी कुछ बोल नहीं पाई।
तस्वीर हाथ में थामे
वह वहीं बैठ गई।
उस रात
वह बहुत देर तक जागती रही।
“इतनी जल्दी क्यों चले गए?
मैंने तो सिर्फ़ नाम जाना था…
दिल तो अभी पहचान ही रहा था।”
उसे समझ आ गया था—
कुछ प्रेम
मुलाक़ात के मोहताज नहीं होते।
वे बस हो जाते हैं।
वक़्त बीत गया।
ज़िम्मेदारियाँ आ गईं।
ज़िंदगी आगे बढ़ गई।
लेकिन जब भी
अचानक हवा छूती है,
या किसी अनजान चेहरे में
थोड़ी-सी उदासी दिखती है—
अन्वी मुस्कुरा देती है।
क्योंकि वह जानती है—
कुछ रिश्ते
अधूरे होकर भी
पूरे होते हैं।
और
कुछ प्रेम
जीवन में नहीं,
आत्मा में बसते हैं।

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