चांदनी के उस पार

A young woman standing alone in a moonlit Indian courtyard surrounded by blooming night flowers, expressing quiet love and longing.

शरद की रात थी।

आसमान पर चांद ऐसा लग रहा था मानो किसी ने दूध की कटोरी उलट दी हो।

आंगन में तुलसी के पत्तों पर चांदनी ठहर गई थी और चमेली की भीनी-भीनी खुशबू हवा में तैर रही थी।

अन्वी धीरे से आंगन का दरवाज़ा खोलकर बाहर आ खड़ी हुई।

घर में सन्नाटा था।

माँ-पापा रिश्तेदारी में गए थे और उसे दरवाज़ा खोलने के लिए जागते रहना था।

पर आज नींद वैसे भी कहाँ आने वाली थी?

चांदनी में नहाया आंगन उसे किसी स्वप्नलोक जैसा लग रहा था।

हर पत्ती साफ़ दिख रही थी, हर फूल अपनी अलग पहचान लिए खड़ा था।

उसे लगा जैसे धरती पर नहीं, किसी और ही दुनिया में आ गई हो।

हल्की हवा चली।

गुलमोहर की एक टहनी झूलकर उसके कंधे से टकरा गई।

अन्वी सिहर उठी।

“ऐसा ही तो था उस दिन…”

उसके होंठों से शब्द बिना आवाज़ के निकल गए।

पिछला सावन...

पिछले साल सावन में ही तो आरव आया था।

पापा के पुराने मित्र का बेटा।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बीच तबीयत बिगड़ गई थी, डॉक्टर ने कुछ समय शहर से दूर रहने को कहा था।

पहली बार अन्वी ने उसे तब देखा था जब वह लाइब्रेरी से लौट रही थी।

“अंकल घर पर हैं?”

उसने बरामदे में बैठे लड़के से पूछा था।

आरव ने किताब से नज़र उठाई थी।

कुछ पल वह कुछ कह ही नहीं पाया।

साधारण सूट में, खुले बालों में, अन्वी उसे उस क्षण बेहद अलग लगी थी।

जैसे किसी कविता का पहला शेर।

“अंदर हैं… मैं बुला देता हूँ,”

वह हड़बड़ाकर बोला था।

उस दिन के बाद जैसे दोनों की दुनिया सिमटकर कुछ जगहों तक रह गई—

बरामदा, सीढ़ियाँ, छत, आंगन और खिड़की।

नज़रें मिलतीं, मुस्कान ठहर जाती,

और शब्द अक्सर अधूरे रह जाते।


एक छोटी-सी भूल..

एक दोपहर अन्वी छत पर बैठी मोगरे के फूल तोड़ रही थी।

मज़ाक में उसने एक छोटा सा गुच्छा नीचे फेंक दिया।

संयोग से…

वही गुच्छा नीचे बैठकर पढ़ रहे आरव के कंधे पर जा गिरा।

अन्वी घबरा गई।

छुपकर सीढ़ियों से नीचे उतर आई।

उसके बाद दो दिन तक वह सामने नहीं आई।

पर मन हर पल उसी ओर भागता रहा।

तीसरे दिन बगीचे में आम के पेड़ के नीचे—

“अन्वी…”

पीछे से आई आवाज़ ने उसके भीतर कुछ जगा दिया।

वह मुड़ी।

आरव खड़ा था।

“ये… तुम्हारी किताब,”

उसने हिचकते हुए किताब आगे बढ़ाई।

किताब लेते समय उंगलियाँ छू गईं।

एक पल को समय ठहर गया।

आरव बिना कुछ कहे लौट गया।

किताब के बीच एक पर्ची रखी थी—

“कुछ चीज़ें अचानक मिलती हैं,

पर देर तक साथ रहती हैं।”

अन्वी देर तक वही पंक्ति पढ़ती रही।


फूलों की भाषा...

उस दिन के बाद

कभी उसकी मेज़ पर फूल होते,

कभी खिड़की के पास,

कभी रास्ते में।

कोई शब्द नहीं,

बस फूल।

एक शाम अन्वी ने धीमे से कहा—

“आरव, ये सब शायद ठीक नहीं…”

वह मुस्कराया,

“ठीक और गलत का फैसला इतना आसान होता तो दिल इतना उलझा क्यों होता?”

कुछ दिन बाद उसने बताया—

“मैं अगले हफ्ते लौट रहा हूँ।”

अन्वी का मन जैसे खाली हो गया।


विदाई की रात...

वही चांदनी…

वही खुशबू…

अन्वी आंगन में खड़ी थी जब दीवार के उस पार हल्की आहट हुई।

“अन्वी…”

वह चौंक गई।

आरव दीवार फाँदकर सामने खड़ा था।

“तुम…”

उसकी आवाज़ काँप गई।

“सुबह की ट्रेन है,”

आरव ने कहा,

“बिना मिले जाना मुझसे नहीं हुआ।”

अन्वी की आँखों से आँसू बह निकले।

“मैं तुम्हारे बिना…”

वह अधूरा ही रह गया।

“अन्वी,”

आरव ने शांत स्वर में कहा,

“हम दोनों अभी अधूरे हैं—पढ़ाई, ज़िम्मेदारियाँ, परिवार…

प्यार भागकर नहीं, ठहरकर भी निभाया जाता है।”

“तो क्या इंतज़ार ही सब कुछ है?”

उसने भर्राई आवाज़ में पूछा।

“कभी-कभी हाँ,”

आरव ने जेब से फूलों का छोटा सा गुच्छा निकालकर उसे थमा दिया।

“ये वादा नहीं है… बस याद है।”

चांदनी में खड़े दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

शब्द कम पड़ गए थे।


आज...

अन्वी की आँख खुली।

आंगन में वही चांदनी थी,

पर अब वह मायावी नहीं लग रही थी।

उसने फूलों को देखा,

मुस्कराई

और मन ही मन कहा—

“कुछ प्रेम मिलते नहीं,

पर जीवन भर खिलते रहते हैं…”



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.