माँ की गोद और घर की दीवारें

 

A young Indian mother gently holding her sick baby inside a traditional family home, with an elderly woman standing in the background showing concern and emotional realization, warm natural lighting and a calm domestic atmosphere.


दोपहर के लगभग दो बज चुके थे।

घर में अजीब-सी खामोशी थी।


बरामदे में पड़ी पुरानी कुर्सी पर बैठी

सरला देवी बार-बार दीवार घड़ी की ओर देख रही थीं।


“आज भी दवाई भूखे पेट ही लेनी पड़ेगी क्या…?”

उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा,

“बहू…!”


कुछ पल बाद

अंदर के कमरे से

धीमी-सी आहट सुनाई दी।


नेहा बाहर आई।


चेहरा उतरा हुआ,

आँखों के नीचे काले घेरे,

और गोद में उसकी सात महीने की बेटी — परी।


परी का बदन गर्म था,

माथे पर पसीने की हल्की बूँदें थीं,

और उसकी सिसकियाँ

नेहा के सीने को छलनी कर रही थीं।


“माँ जी…”

नेहा ने धीमे से कहा,

“परी रात से बहुत परेशान है।

लगातार रो रही है…

आज मैंने बस दाल-चावल बना दिए हैं।

कुकर ठंडा होते ही निकाल दूँगी।”


सरला देवी की आँखें सिकुड़ गईं।


“बस… दाल-चावल?”

उनकी आवाज़ में तंज था,

“क्या रोज़ यही खिलाओगी?”


नेहा कुछ कहती,

उससे पहले ही

सरला देवी का गुस्सा फूट पड़ा।


“हमने भी बच्चे पाले हैं,

घर संभाले हैं।

पर कभी काम से मुँह नहीं मोड़ा!”


उन्होंने कुर्सी से उठते हुए कहा —

“बच्चा रो रहा है तो

घर का काम छोड़ दोगी?”


नेहा की आँखों में आँसू भर आए।


“माँ जी…

मुझे लग रहा है

इसे बुखार है।

डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है।”


“डॉक्टर!”

सरला देवी हँस पड़ीं,

“आजकल की बहुओं को

डॉक्टर के अलावा कुछ आता ही नहीं।”


उन्होंने नेहा की गोद से

परी को झटके से उठा लिया।


“रसोई में जाओ।

खाना परोसो।

बच्चा मैं संभाल लूँगी।”


परी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

उसकी छोटी-सी मुट्ठियाँ

हवा में चलने लगीं।


नेहा का कलेजा मुँह को आ गया।


“माँ जी… प्लीज़…”

उसकी आवाज़ काँप गई,

“यह अभी किसी के पास नहीं जाना चाहती।”


“ज़्यादा नाटक मत करो!”

सरला देवी ने सख्ती से कहा।


नेहा चुपचाप

रसोई की ओर चली गई।


रसोई में

उसके आँसू

दाल में गिरते जा रहे थे।


उसने कांपते हाथों से

सास-ससुर की थाली लगाई।


फिर हिंग की पोटली बनाई

और तेज़ी से कमरे की ओर दौड़ी।


कमरे में पहुँचते ही

उसने बिना कुछ कहे

परी को

सरला देवी की गोद से ले लिया

और सीने से लगा लिया।


परी का रोना

धीरे-धीरे थमने लगा।


यह देख

सरला देवी आगबबूला हो गईं।


“देखा!”

उन्होंने अपने पति हरिदत्त जी से कहा,

“ऐसे ले गई

जैसे मैं इसकी बच्ची को खा जाऊँगी!”


हरिदत्त जी

काफी देर से चुप थे।


उन्होंने गहरी साँस ली

और बोले —


“सरला…

तुम इसकी सास हो,

पर उससे पहले एक माँ हो।”


“माँ?”

सरला देवी चौंकीं,

“मैंने क्या गलत किया?”


हरिदत्त जी की आवाज़ में

गंभीरता थी।


“एक औरत

बहुत कुछ भूल जाती है,

पर वह कभी नहीं भूलती

कि उसके बच्चे के साथ

उसके साथ कैसा व्यवहार हुआ।”


उन्होंने आगे कहा —


“आज नेहा मजबूर है।

पर कल…

कल जब हम बिस्तर पर होंगे,

तो वही तय करेगी

कि हमारी दवा समय पर मिलेगी या नहीं।”


सरला देवी कुछ बोल न सकीं।


उसी वक्त

कमरे से नेहा की आवाज़ आई।


वह परी से धीरे-धीरे कह रही थी —


“मेरी बच्ची…

माँ यहाँ है।

अब कोई तुम्हें जबरदस्ती

मुझसे दूर नहीं करेगा।”


“सब कहते हैं

बच्चे बेवजह रोते हैं…

पर माँ जानती है

कब दर्द होता है।”


दरवाज़े पर खड़ी

सरला देवी की आँखें भर आईं।


उन्हें याद आया —

जब वह खुद

अपनी नवजात बेटी को लेकर

इसी तरह रोई थी।


जब उसकी सास ने कहा था —

“इतना लाड़ मत करो,

वरना बिगड़ जाएगी।”


सरला देवी के कदम

लड़खड़ा गए।


वह धीरे से

कमरे में गईं।


“बहू…”

उनकी आवाज़ टूट गई,

“मुझसे गलती हो गई।”


नेहा चौंक गई।


“मैं समझ ही नहीं पाई

कि तुम किस दौर से गुजर रही हो,”

सरला देवी बोलीं।


“आज तुम्हारे शब्दों ने

मुझे मेरा अतीत दिखा दिया।”


नेहा की आँखों से

आँसू बह निकले।


“अब से…”

सरला देवी ने कहा,

“तुम अकेली नहीं हो।

तुम माँ हो…

और मैं भी।”


पीछे से

हरिदत्त जी मुस्कराते हुए बोले —


“अच्छा हुआ

आज समझ आ गया,

वरना

वृद्धाश्रम की फाइल

मैंने अलमारी में रख दी थी।”


यह सुनकर

नेहा और हरिदत्त जी

हँस पड़े।


सरला देवी भी

हल्की-सी मुस्कान के साथ बोलीं —


“जाओ…

बच्ची को डॉक्टर के पास ले चलो।

मैं खाना बाद में खा लूँगी।”


उस दिन

घर की दीवारें वही थीं,

पर रिश्तों की ठंडक

थोड़ी कम हो चुकी थी।





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