माँ के हाथों की ताक़त
गाँव के आख़िरी छोर पर एक छोटा-सा कच्चा घर था।
घर छोटा था, लेकिन उसमें रहने वालों के दिल बहुत बड़े थे।
इस घर में रहती थी धर्मा देवी,
उनका बेटा सुरेश,
बहू कविता,
और आठ साल की पोती नन्ही गुड़िया।
धर्मा देवी उम्र में बड़ी थीं,
लेकिन उनके हाथों में आज भी गज़ब की फुर्ती थी।
वो पुराने कपड़ों से नए कपड़े बना देती थीं,
टूटे बटन जोड़ देती थीं,
और फटे सपनों में भी उम्मीद सी देती थीं।
नन्ही गुड़िया की ड्रेस...
एक दिन गुड़िया स्कूल से रोती हुई आई।
“दादी… सब बच्चे नई ड्रेस पहन कर आए थे।
मेरे पास तो पुरानी है…”
धर्मा देवी ने गुड़िया को पास बैठाया,
उसके सिर पर हाथ फेरा और बोलीं—
“रो मत मेरी रानी,
कल तू सबसे सुंदर ड्रेस पहनेगी।”
रात भर दादी ने
पुरानी साड़ियों के टुकड़ों से
एक प्यारी-सी फ्रॉक सिल दी।
सुबह गुड़िया उसे पहन कर आई,
तो पूरे स्कूल में उसकी तारीफ़ हुई।
कविता की आँखें भर आईं।
“माँ… आप सच में कमाल हो।”
सुरेश का संघर्ष...
सुरेश शहर में एक छोटी-सी नौकरी करता था।
आमदनी ज़्यादा नहीं थी,
लेकिन उसके हौसले कभी कमज़ोर नहीं पड़े।
एक दिन उसने माँ से कहा—
“माँ, अगर हमारी गुड़िया अच्छी तरह पढ़-लिख गई,
तो यक़ीन मानो हमारी गरीबी अपने आप हार जाएगी।”
धर्मा देवी ने बेटे की ओर देखा,
उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान फैल गई।
उन्होंने प्यार से कहा—
“बेटा, गरीबी से बड़ा कोई रोग नहीं होता,
और शिक्षा से बड़ी कोई दवा इस दुनिया में नहीं है।”
समय की परीक्षा...
कुछ समय बाद हालात बदल गए।
सुरेश की नौकरी अचानक छूट गई।
घर में आमदनी का कोई ज़रिया नहीं बचा।
दिन बीतने लगे, और चिंता बढ़ने लगी।
कविता का चेहरा उतर गया।
उसने घबराई हुई आवाज़ में कहा—
“माँ… अब क्या होगा?
घर कैसे चलेगा?”
धर्मा देवी ने बिना कुछ कहे
पुरानी अलमारी खोली।
अंदर से अपनी सिलाई मशीन निकाली,
उसे आँगन में रख दिया।
“जब हाथ चलते हैं,
तो हालात नहीं रोक सकते।”
उसी दिन से
धर्मा देवी ने फिर से कपड़े सिलने शुरू कर दिए।
पहले अपने गाँव के लोगों के लिए,
फिर पास के शहर तक उनके हाथों का काम पहुँचने लगा।
लोग उनके बनाए कपड़ों की
तारीफ़ करने लगे।
धीरे-धीरे
धर्मा देवी की सिली हुई ड्रेस
पहचान बनने लगी,
और घर में उम्मीद की रोशनी
फिर से जल उठी।
बहू का बदलता मन...
पहले कविता को
गाँव की ज़िंदगी पसंद नहीं थी।
उसे शहर जाना था,
बड़े घर में रहना था।
लेकिन सास का धैर्य,
मेहनत और प्यार देखकर
उसका दिल बदल गया।
अब वो खुद सास के साथ
कपड़े सिलने लगी।
पहचान...
एक दिन पास के शहर में
हस्तशिल्प की एक बड़ी प्रदर्शनी लगी।
कविता भी वहाँ पहुँची।
उसने अपनी सास धर्मा देवी के
अपने हाथों से सिले हुए
सुंदर कपड़े प्रदर्शनी में सजा दिए।
जैसे ही लोग उन कपड़ों को देखने लगे,
सबकी आँखें खुली की खुली रह गईं।
कपड़ों की कारीगरी, रंगों का मेल
और सादगी में छुपी सुंदरता
सबका मन जीत रही थी।
तभी भीड़ में से किसी ने पूछा—
“ये इतने खूबसूरत कपड़े किसने बनाए हैं?”
कविता का सीना गर्व से भर गया।
उसने मुस्कुराते हुए कहा—
“ये कपड़े मेरी सास ने बनाए हैं।”
यह सुनते ही
लोगों ने धर्मा देवी की तारीफ करनी शुरू कर दी।
प्रदर्शनी के आयोजकों ने
धर्मा देवी को मंच पर बुलाया
और उनके हुनर को सम्मानित किया।
उन्हें सम्मान पत्र और इनाम दिया गया।
उस पल
धर्मा देवी की आँखों में खुशी के आँसू थे
और कविता के चेहरे पर गर्व की चमक।
नई सुबह...
अब घर में फिर से हँसी थी।
सुरेश को नई नौकरी मिल गई।
गुड़िया अच्छे स्कूल में पढ़ने लगी।
धर्मा देवी आँगन में बैठी
सिलाई करती हुई बोलीं—
“जब परिवार साथ होता है ना,
तो सबसे बड़ा संघर्ष भी छोटा लगने लगता है।”
और सच में,
उस छोटे-से घर में
खुशियों की रौशनी फैल चुकी थी।

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