रंग जो दिलों में उतर आए
सुबह का समय था।
आँगन में तुलसी के पास रखे दीये अभी भी जल रहे थे।
घर में हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू फैली हुई थी।
आज पूजा की शादी थी।
घर की सबसे छोटी बेटी, पूजा, आज ससुराल जाने वाली थी।
माँ सरिता देवी बार-बार आँचल से आँखें पोंछ रही थीं।
“मेरी बिटिया… आज पराया घर अपना बनाने जा रही है,”
उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा।
पूजा ने माँ को गले लगाते हुए कहा,
“माँ, आप रोइए मत। मैं रोज़ फोन करूँगी। और जब भी बुलाओगी, भागी चली आऊँगी।”
पिता रमेश जी ने सिर पर हाथ रखते हुए कहा,
“ससुराल में सबका सम्मान करना बेटा। और अगर कोई बात मन को दुखाए, तो चुप मत रहना।”
पूजा की शादी अमन से हुई थी—सीधा-सादा, कम बोलने वाला लड़का।
विदाई के समय पूरा मोहल्ला रो रहा था।
नए घर की दहलीज़...
पूजा जब ससुराल पहुँची,
तो सास शोभा देवी ने आरती उतारी।
“आ जा बहु,
घर में लक्ष्मी आई है,”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा।
पूजा ने मन ही मन सोचा—
शायद यहाँ सब ठीक रहेगा।
शोभा देवी ने उसे घर के सारे नियम समझाए—
किस समय पूजा,
किस समय खाना,
किसे क्या पसंद है।
पूजा हर बात ध्यान से सुनती रही।
वह सांवली थी,
चेहरा बहुत सादा था,
लेकिन उसकी आँखों में ऐसा अपनापन था
जो सामने वाले के दिल को बिना कहे ही छू जाता था।
तुलना की शुरुआत...
कुछ ही दिनों बाद,
अमन के छोटे भाई रोहित की शादी तय हो गई।
रोहित की होने वाली पत्नी निधि—
रंग रूप में गोरी,
पढ़ी-लिखी और समझदार,
बातों में निपुण और हर किसी से जल्दी घुल-मिल जाने वाली लड़की थी।
शादी के बाद घर में जैसे रौनक दुगुनी हो गई।
निधि के आते ही सब बदल गया।
“निधि ये बना दो,”
“निधि वो दिखाओ,”
“निधि के हाथ का खाना कमाल है।”
पूजा चुपचाप सब देखती रहती।
वह रोज़ सुबह उठकर सास-ससुर की चाय बनाती,
घर साफ करती,
खाना बनाती।
लेकिन तारीफ़ अब किसी और के हिस्से आ रही थी।
पड़ोसियों की ज़ुबान...
एक दिन दोपहर के समय
पड़ोसन कमला घर आ पहुँची।
हँसते हुए उसने कहा—
“अरे शोभा,
तेरी नई बहु तो बड़ी गोरी-चिट्टी है।
पहली वाली तो जैसे दब सी गई हो।”
पूजा वहीं पास में खड़ी थी।
उसकी उँगलियों से थाली फिसलते-फिसलते बची।
वे शब्द सीधे उसके कानों में नहीं,
दिल में उतर गए—
ऐसे, जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो।
वह कुछ बोली नहीं।
न कोई शिकायत,
न कोई सवाल।
बस चुपचाप कमरे में चली गई।
उस दिन पहली बार
पूजा देर तक आईने के सामने खड़ी रही।
अपने रंग को देखती रही,
अपने चेहरे को टटोलती रही,
और मन ही मन सोचती रही—
“क्या सच में
मैं कम हूँ?”
आईने में दिखती वह लड़की
उसे अचानक बहुत अजनबी लगने लगी।
पहला त्योहार...
दीवाली आ चुकी थी।
घर के हर कोने में सजावट हो रही थी।
दीयों की कतारें लगाई जा रही थीं,
रंग-बिरंगी झालरें टांगी जा रही थीं,
रसोई से मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।
घर में उत्साह था, रौनक थी।
निधि से बार-बार पूछा जा रहा था—
“तुम्हें दीवाली पर कौन-सी साड़ी चाहिए?”
“इस बार कौन-सी मिठाई बनाओगी?”
सब उसकी पसंद जानने में लगे थे।
लेकिन पूजा…
पूजा से किसी ने कुछ नहीं पूछा।
वह चुपचाप
कभी रसोई में काम करती रही,
कभी घर की सफ़ाई में लगी रही।
उसकी आँखें बार-बार भर आती थीं,
लेकिन वह किसी को कुछ कह नहीं पाई।
मन ही मन उसने सोचा—
“यह मेरी भी पहली दीवाली है इस घर में…
क्या मेरी कोई पसंद नहीं?”
चुप्पी टूटती है...
दीवाली के अगले दिन की सुबह थी।
घर में अभी भी दीयों की हल्की-सी खुशबू तैर रही थी,
लेकिन पूजा के मन में अजीब-सी उदासी भरी हुई थी।
शोभा देवी चाय का कप हाथ में लिए बैठी थीं।
एक घूँट लेकर उन्होंने हल्के से कहा—
“पूजा,
आज चाय कुछ फीकी है।”
इतना सुनते ही पूजा के हाथ थरथरा गए।
जिस दिल ने इतने दिनों से चुप रहना सीख लिया था,
वही दिल आज टूट गया।
वह धीरे-धीरे उनके सामने आकर खड़ी हुई।
“माजी…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई,
“चाय फीकी नहीं है…
शायद रिश्ते फीके हो गए हैं।”
कमरे में जैसे समय थम गया।
हँसी, बातचीत—सब कुछ खामोशी में बदल गया।
पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैं भी इंसान हूँ, माजी,”
वह रोते हुए बोली,
“मुझे भी अच्छा-बुरा लगता है।
मैंने कभी किसी से अपनी तुलना नहीं की,
लेकिन हर दिन खुद को कमतर महसूस किया है।”
वह पल भारी था—
क्योंकि पहली बार पूजा ने
अपने मन का बोझ
आवाज़ में उतार दिया था।
एहसास...
शोभा देवी की आँखें भर आईं।
आँचल से आँसू पोंछते हुए उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—
“बहु…
हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई।
हमने कभी जानबूझकर तुम्हें दुख नहीं दिया,
लेकिन हमारी लापरवाही ने तुम्हें अकेला कर दिया।”
ससुर जी ने गहरी साँस ली और बोले—
“बेटा,
हम यह समझ ही नहीं पाए
कि हमारी चुप्पी तुम्हारे लिए कितनी भारी बन गई।
अनजाने में ही सही,
पर हमने तुम्हारे मन को बहुत ठेस पहुँचाई।”
इतने में निधि आगे बढ़ी।
उसकी आँखों से भी आँसू बहने लगे।
वह पूजा के सामने झुक गई और उसके पैर पकड़ लिए—
“भाभी,
मुझे माफ़ कर दीजिए।
मैंने कभी यह सोचा ही नहीं
कि मेरी वजह से आपको इतना दुख सहना पड़ रहा है।
अगर मुझसे कोई भूल हुई हो,
तो उसे मेरी नासमझी समझकर माफ़ कर दीजिए।”
पूजा कुछ कह नहीं पाई।
उसका गला भर आया था।
कोने में खड़ा अमन सब कुछ देख रहा था।
हमेशा शांत रहने वाला अमन
आज अपनी भावनाएँ रोक नहीं पाया।
उसकी आँखें भी नम हो चुकी थीं।
यह सिर्फ़ माफ़ी का पल नहीं था,
यह रिश्तों के टूटे रंगों के
फिर से जुड़ने की शुरुआत थी।
शोभा देवी आगे बढ़ीं
और पूजा को अपने सीने से लगा लिया।
उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
कांपती आवाज़ में उन्होंने कहा—
“बहु…
रिश्ते न रंग से बनते हैं,
न गोरे-काले से।
रिश्ते तो दिल से बनते हैं।
और तुम्हारा दिल
इस घर में सबसे ज़्यादा खूबसूरत है।”
उन शब्दों के साथ ही
पूजा के मन में जमी सारी ठंडक पिघल गई।
उस पल,
उस गले लगाने में,
उसे पहली बार
सिर्फ़ बहु नहीं—
घर की बेटी होने का एहसास मिला।
कुछ महीने बीत गए।
समय ने रिश्तों पर जमी गलतफहमियों की धूल धीरे-धीरे साफ़ कर दी थी।
घर में फिर से दीवाली आई।
इस बार माहौल अलग था।
आँगन में दीये सजाते हुए
शोभा देवी ने प्यार से आवाज़ दी—
“बहु पूजा,
इस दीवाली क्या पहनने का मन है?
नई साड़ी लेंगे या सूट?”
रसोई से ससुर जी बोले—
“और हाँ बहु,
मिठाई तुम ही तय करना।
तुम्हारे हाथ की बनी चीज़ों में जो स्वाद है,
वो कहीं और नहीं मिलता।”
पूजा एक पल के लिए रुक गई।
ये वही सवाल थे
जिनका इंतज़ार उसने अपनी पहली दीवाली में किया था।
आज जवाब देते समय
उसकी आँखें नम थीं
और होंठों पर सुकून भरी मुस्कान।
“माजी,”
उसने हल्की आवाज़ में कहा,
“इस बार बेसन के लड्डू बनाऊँगी…
और पहनने के लिए
वही साड़ी,
जिसे आप पसंद करें।”
शोभा देवी ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
“नहीं बहु,
आज सब कुछ तुम्हारी पसंद का होगा।”
और पूजा मन ही मन बोली—
शायद यही असली त्योहार है,
जब दिलों में भी रोशनी जल उठे।
कहानी का संदेश:
दोस्तों,
रिश्तों को निभाने के लिए
सबसे ज़रूरी होती है संवेदनशीलता।
अगर कोई चुप है,
तो ज़रूरी नहीं वह खुश भी हो।
इसलिए समय रहते
अपने अपनों से बात करें,
उनकी ख़ामोशी को समझें,
उनकी भावनाओं को महसूस करें।
क्योंकि जब दिलों की बात
दिल तक पहुँच जाती है,
तो रिश्तों के रंग
कभी फीके नहीं पड़ते।

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