मिट्टी की खुशबू
निहारिका की शादी को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था।
गाँव की खुली हवा, खेतों की मिट्टी और ताज़ी सब्ज़ियों की आदत लेकर वह शहर के इस बड़े, चमकते घर में आई थी।
शादी के तीसरे दिन ही उसकी पहली रसोई थी।
सुबह से ही वह रसोई में लगी हुई थी—
कभी दाल चखती,
कभी सब्ज़ी में नमक देखती,
तो कभी रोटियाँ सेकते हुए पसीना पोंछती।
उसने सोचा था,
“आज सब खुश होंगे…
मेरे हाथ का खाना खाकर।”
दाल, सब्ज़ी, कढ़ी, चावल, रोटियाँ—
सब कुछ प्यार से बनाया था।
लेकिन जैसे ही खाना परोसा गया,
घर की बड़ी बहु काजल ने नाक सिकोड़ ली।
“ये सब क्या है?”
“इतना देसी खाना?”
“मैं तो ये सब नहीं खाती।”
सास ने भी मुँह बना लिया—
“इतना सब बनाने की ज़रूरत क्या थी?”
“हमारे घर में बाहर से खाना आता है।”
कुछ ही देर में पिज़्ज़ा, पास्ता और चाउमीन आ गई।
निहारिका का बनाया सारा खाना…
डस्टबिन में।
उस दिन पहली बार
निहारिका के दिल में कुछ टूट गया।
भूख सिर्फ पेट की नहीं होती...
दिन बीतते गए।
घर में रोज़ पैकेट वाला खाना आता।
निहारिका कभी चुपचाप बैठी रहती,
कभी थोड़ा-सा खाकर उठ जाती।
रात के दो बजे
उसका पेट दर्द से सिकुड़ रहा था।
वह रसोई में गई—
लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं था।
काजल ने फ्रिज खोला
और अंदर से चिप्स और कुरकुरे के दो पैकेट निकाल लायी।
उन्हें निहारिका की ओर बढ़ाते हुए बोली—
“ये ले लो…
अभी यही पड़ा है घर में।”
निहारिका ने पैकेट हाथ में लिया,
थोड़ी देर उसे देखती रही।
मन ही मन बोली—
“ये खाना नहीं है…
ये तो बस पेट भरने का धोखा है।”
काजल बिना रुके आगे बढ़ गई—
“जल्दी खा लो,
सुबह सबको बाहर का खाना ऑर्डर करना है।”
इतना कहकर
वह वापस अपने कमरे में चली गई।
एक छोटी-सी उम्मीद...
एक दिन निहारिका के मोबाइल पर उसकी सहेली शिया का फोन आया।
वीडियो कॉल खुलते ही शिया चौंक गई।
“अरे! तू इतनी कमजोर क्यों लग रही है?”
“ठीक से खा नहीं रही क्या?”
निहारिका पहले तो चुप रही,
फिर उसका मन भर आया।
उसने धीरे-धीरे सारी बात शिया को बता दी—
पहली रसोई से लेकर
डस्टबिन में फेंका गया खाना,
और रात की भूख तक।
सब सुनकर शिया हल्की-सी हँस पड़ी और बोली,
“पगली है तू भी!”
“इतनी चिंता क्यों कर रही है?”
“बालकनी में सब्ज़ियाँ उगा ले ना।”
निहारिका हैरान हो गई।
“बालकनी में… सब्ज़ियाँ?”
शिया ने भरोसे से कहा,
“हाँ क्यों नहीं!
थोड़ी-सी जगह में भी
बहुत कुछ उग जाता है।”
उसकी बात सुनकर
निहारिका के चेहरे पर
कई दिनों बाद
हल्की-सी मुस्कान आई।
उस पल
उसके मन में
उम्मीद का
एक नया बीज
पड़ चुका था।
मिट्टी से रिश्ता...
सिद्धांत — उसका पति —
उस दिन पहली बार निहारिका के मन की पीड़ा को समझ पाया।
उसकी भूख सिर्फ पेट की नहीं थी,
वह अपने स्वाद, अपनी आदतों और अपने आत्मसम्मान के लिए भी तरस रही थी।
शाम को दोनों साथ-साथ बाहर गए।
बीज खरीदे,
छोटे-छोटे पौधे लाए,
और निहारिका की आँखों में पहली बार उम्मीद की चमक दिखाई दी।
अगली सुबह,
जब पूरा घर गहरी नींद में था,
निहारिका चुपचाप बालकनी में आई।
उसने गमलों में मिट्टी भरी,
नन्हे-नन्हे बीज बोए,
और बहुत प्यार से उन पर पानी डाला।
हर पौधे को देखते हुए
वह मन ही मन उनसे बातें करने लगी —
“जल्दी बड़े हो जाना…
मुझे बहुत भूख लगी है।”
उसकी यह भूख
सिर्फ खाने की नहीं थी,
यह भूख थी
अपनेपन की,
सम्मान की,
और अपने स्वाद के साथ जीने की।
ताने और अपमान...
सास को जैसे ही सब्ज़ियों की ख़बर लगी, घर में हंगामा मच गया।
“ये क्या कर दिया तुमने?”
“सब्ज़ियों के पौधे?”
“हमारे घर की शोभा बिगाड़ दी!”
फिर ताने भी शुरू हो गए—
“गाँव से आई हो न,
इसलिए ऐसी हरकतें कर रही हो।”
निहारिका कुछ नहीं बोली।
उसकी आँखें झुकी रहीं,
होंठ सिले रहे।
लेकिन उसके मन में
एक दृढ़-सा विचार जन्म ले चुका था—
“आज नहीं बोलूँगी…
कल जवाब दूँगी,
शब्दों से नहीं,
अपने काम से।”
इंतज़ार का फल...
दिन बीते।
पौधों में
कोमल पत्तियाँ आईं।
फिर फूल,
फिर छोटी-छोटी सब्ज़ियाँ।
एक सुबह
निहारिका ने
पहली बार
खुद उगाई सब्ज़ी तोड़ी।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसने खाना बनाया—
सादा,
लेकिन ताज़ा।
बदलाव...
खाने की मेज़ पर
सब चुपचाप बैठ गए।
हर प्लेट में वही सादा-सा खाना था—
लेकिन आज उसमें
मिट्टी की खुशबू थी।
सबने एक-एक कौर लिया।
कुछ पल के लिए
कोई कुछ नहीं बोला।
काजल ने अचानक चौंककर
अपनी प्लेट की ओर देखा—
फिर हल्की-सी हैरानी से बोली,
“ये सब्ज़ी…
आज कुछ अलग है।”
सास ने भी धीरे से
दूसरा कौर लिया,
और पहली बार
बिना किसी तंज के कहा,
“स्वाद अच्छा है।”
निहारिका ने
नज़रें झुका लीं।
उसने कोई जवाब नहीं दिया,
कोई दावा नहीं किया।
बस होंठों पर
एक छोटी-सी मुस्कान आ गई—
संतोष की,
और जीत की।
उस दिन
उस घर में
पहली बार
किसी ने यह नहीं कहा कि
पौधे हटा दो।
उस दिन
निहारिका की मेहनत
चुपचाप स्वीकार ली गई।
अब रोज़
निहारिका की सब्ज़ियाँ
घर की रसोई में आने लगीं।
धीरे-धीरे
पैकेट वाला खाना कम हो गया।
और एक दिन
सास ने खुद कहा—
“आज वो हरी सब्ज़ी बना देना…
जो तुम उगाती हो।”
निहारिका की आँखें भर आईं।
उसने समझ लिया—
जब इंसान अपने हक़ के लिए
चुपचाप मेहनत करता है,
तो एक दिन
मिट्टी भी गवाही देती है।

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