शॉल में लिपटी बहु
निकिता शॉल ओढ़े रसोई में पहुँची। वहाँ पहले से सास शारदा जी, ननद नीलम और दो-तीन रिश्तेदार महिलाएँ मौजूद थीं। चूल्हे पर गैस जल रही थी, फिर भी निकिता के हाथ ठंड से काँप रहे थे।
“अरे बहु, ये क्या? पहली रसोई में भी शॉल?”
एक चाची ने हल्की मुस्कान के साथ ताना मार दिया।
निकिता ने धीमी आवाज़ में कहा,
“चाची जी, बहुत ठंड लग रही है।”
शारदा जी ने तुरंत बात संभाली,
“अरे रहने दीजिए,” उन्होंने अपनत्व भरे स्वर में कहा,
“पहली ही सुबह है बहु की। नई-नई घर आई है, ऊपर से मौसम भी काफी ठंडा है। ऐसे में अगर शॉल ओढ़ ली तो इसमें बुरा मानने वाली कौन-सी बात है?”
नीलम चुपचाप निकिता को देख रही थी।
उसका बार-बार शॉल ओढ़ना, काँपते हाथ, और हर पल ठंड से बचने की कोशिश —
अब उसे यह सब सामान्य नहीं लग रहा था।
नीलम के मन में पहली बार यह ख्याल आया कि
यह सिर्फ मौसम की ठंड नहीं है,
बल्कि इसके पीछे कोई डर, कोई तकलीफ़,
या कोई पुराना अनुभव छुपा हुआ है।
उसे साफ महसूस होने लगा था कि
निकिता की यह हालत कोई आम बात नहीं है।
निकिता ने काँपते हाथों से जैसे-तैसे हलवा बनाया।
कढ़ाही में घी पिघला तो उसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई।
रिश्तेदारों ने तारीफों की झड़ी लगा दी —
“वाह बहु, कितना बढ़िया हलवा है।”
लेकिन कोई ये नहीं देख पाया
कि उस खुशबू के बीच
निकिता के माथे पर जो नमी थी,
वह मेहनत की नहीं थी।
वह पसीना नहीं,
डर था।
ठंड का डर…
और फिर से बीमार पड़ जाने का डर।
दोपहर होते-होते सारे मेहमान विदा हो चुके थे।
घर में जो सुबह से शोर और चहल-पहल थी, अब उसकी जगह एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई थी।
अर्जुन कमरे में आया तो उसका ध्यान तुरंत निकिता पर गया।
वह बिस्तर पर लेटी थी —
दो कंबलों में पूरी तरह लिपटी हुई,
कमरे में हीटर चल रहा था
और खिड़कियाँ पूरी तरह बंद थीं।
अर्जुन कुछ पल उसे यूँ ही देखता रहा, फिर बोला,
“निकिता, तुम्हें सच में कुछ ज़्यादा ही ठंड लगती है।”
उसकी आवाज़ में चिंता भी थी और हल्की सी झुंझलाहट भी।
निकिता ने उसकी तरफ़ देखे बिना ही धीमे स्वर में कहा,
“बचपन से ऐसा ही है…
थोड़ी सी सर्दी भी मुझे बीमार कर देती है।”
अर्जुन ने एक पल रुककर पूछा,
“तो कभी डॉक्टर को दिखाया?”
यह सुनते ही निकिता चुप हो गई।
उसकी आँखें एक जगह टिक गईं,
जैसे वह कोई पुरानी बात याद करने लगी हो।
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।
धीरे-धीरे खुलता सच...
अगले कुछ दिनों में घर वालों ने धीरे-धीरे कई बातें नोटिस करनी शुरू कर दीं।
निकिता रोज़ नहाने से बचने लगी थी।
ठंडा पानी तो दूर, कमरे में ज़रा-सी ठंडी हवा चल जाए तो वह सिहर उठती थी।
रसोई में ज़्यादा देर खड़े रहना उसके लिए मुश्किल हो जाता था।
हर समय उसके कंधों पर कभी शॉल, कभी स्वेटर और रात को कई-कई कंबल रहते थे।
पहले सबको लगा कि नई बहु है, नाज़ुक होगी।
लेकिन जब ये सब रोज़ होने लगा, तो शारदा जी को चिंता होने लगी।
एक दिन वह खुद निकिता के कमरे में आ गईं।
निकिता कंबल में लिपटी बैठी थी।
शारदा जी ने पास बैठते हुए प्यार से पूछा,
“बहु, मुझसे कुछ मत छुपाओ।
सच-सच बताओ — ये सिर्फ ठंड लगना है या कोई परेशानी है?”
यह सुनते ही निकिता की आँखें भर आईं।
उसके होंठ काँपने लगे।
“मम्मी जी…
मुझे ठंड से डर लगता है,”
उसने धीमी आवाज़ में कहा।
थोड़ा रुककर वह बोली,
“पिछले साल सर्दियों में मुझे निमोनिया हो गया था।
हफ्तों अस्पताल में रही थी।
साँस लेना भी मुश्किल हो जाता था।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“तभी से…
जरा-सी ठंड में भी मुझे घबराहट होने लगती है।
लगता है फिर से बीमार न पड़ जाऊँ।”
निकिता की बात सुनकर शारदा जी कुछ पल चुप रहीं।
उनकी आँखों में अब सवाल नहीं, सिर्फ ममता थी।
जहाँ समझदारी रिश्तों को बचाती है...
शाम को अर्जुन, शारदा जी और नीलम तीनों एक साथ बैठे थे।
कमरे में हल्की-सी चुप्पी थी।
अर्जुन कुछ सोच में डूबा हुआ था।
अब उसे एहसास हो रहा था कि उसने निकिता की परेशानी को ठीक से समझने की कोशिश ही नहीं की।
कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा,
“माँ, मुझसे गलती हो गई।
मैंने समझा ही नहीं कि उसे इतनी ज़्यादा ठंड लगती है।”
शारदा जी ने बड़े शांत और स्नेह भरे स्वर में कहा,
“बेटा, हर इंसान की तकलीफ अलग होती है।
और बहु की सेहत से बढ़कर हमारे लिए कुछ भी नहीं है।”
नीलम ने भी बात बढ़ाई,
“भाभी दिखावे के लिए नहीं, सच में परेशान रहती हैं।”
उसी समय तीनों ने मिलकर एक फैसला लिया—
ठंड के मौसम में घर में हीटर हमेशा चलेगा।
निकिता पर किसी भी रस्म या परंपरा का दबाव नहीं डाला जाएगा।
और सबसे ज़रूरी बात —
उसे परखा नहीं जाएगा, बल्कि समझा और संभाला जाएगा।
नई शुरुआत...
कुछ हफ्तों बाद…
निकिता अब भी शॉल ओढ़ती थी,
लेकिन अब उसके चेहरे पर डर की जगह सुकून था।
एक सुबह वह बिना किसी के कहे ही रसोई में आ गई।
आज उसके ऊपर कई कंबल नहीं थे,
बस एक हल्का-सा कंबल ओढ़े वह चुपचाप काम में लग गई।
नीलम ने उसे देखा तो हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“भाभी, आज तो आपको कम ठंड लग रही है?”
निकिता ने मुस्कराकर जवाब दिया,
“ठंड तो अब भी है…
लेकिन अब उससे डर नहीं लगता।”
दूर खड़ी शारदा जी यह सब देख रही थीं।
उनकी आँखों में संतोष था और मन में एक अपनापन।
उन्होंने मन ही मन कहा —
“यही असली ग्रह प्रवेश होता है।
जब बहु सिर्फ घर में नहीं,
बल्कि दिलों में भी बस जाती है
और उसके मन से हर डर धीरे-धीरे बाहर चला जाता है।”
कहानी का संदेश:
👉 हर कमजोरी नखरा नहीं होती
👉 हर बीमारी दिखती नहीं
👉 और हर रिश्ता समझ से ही मजबूत बनता है

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