तिलवाली बहू और विश्वास की परीक्षा
गाँव के बीचों-बीच एक पुराना मगर खुशहाल घर था। उस घर की मालकिन थीं शकुंतला देवी। उम्र पचपन के आसपास, लेकिन आस्था और पूजा-पाठ में ऐसा मन कि सुबह की पहली किरण के साथ ही मंदिर की घंटी बजने लगती।
शकुंतला देवी का मानना था कि
“जो काम भगवान को पूछे बिना किया जाए, वो कभी पूरा नहीं होता।”
उनका इकलौता बेटा राज शहर में नौकरी करता था। पढ़ा-लिखा, समझदार, लेकिन माँ की धार्मिक सोच से थोड़ा अलग।
शकुंतला देवी अब राज की शादी कराना चाहती थीं।
एक दिन उन्होंने बेटे की कुंडली उठाई और सीधे पंडित जी के पास पहुँच गईं।
“पंडित जी, बस अब बेटे की शादी करा दीजिए। लड़का उम्र के पड़ाव पर पहुँच गया है।”
पंडित जी ने कुंडली देखी, माथे पर शिकन आई, फिर मुस्कुराए।
“बेटी, तुम्हारे बेटे का भाग्य बहुत उज्ज्वल है।
लेकिन इसकी गृहस्थी तभी फलेगी,
जब इसकी शादी उस लड़की से होगी जिसके गाल पर तिल होगा।
वही लड़की इस घर में लक्ष्मी बनकर आएगी।”
बस, यहीं से शकुंतला देवी के मन में एक ही बात बैठ गई —
“तिलवाली बहू”
अब जहाँ भी रिश्ता आता,
सबसे पहले सवाल होता —
“लड़की के गाल पर तिल है न?”
लड़कियाँ अच्छी होतीं, परिवार भी ठीक होता,
लेकिन तिल न होने की वजह से रिश्ता टूट जाता।
राज यह सब देखकर परेशान रहने लगा।
राज का प्रेम...
राज ऑफिस में काम करने वाली रोशनी से प्यार करता था।
रोशनी समझदार थी, संस्कारी थी और हर रिश्ते की क़द्र करने वाली लड़की थी।
लेकिन उसकी एक कमी थी—
उसके गाल पर कोई तिल नहीं था।
एक दिन राज ने हिम्मत जुटाकर अपनी माँ से कहा,
“मा, मैं एक लड़की से प्यार करता हूँ। क्या आप उससे मिलोगी?”
शकुंतला देवी ने बिना एक पल सोचे जवाब दिया,
“अगर उसके गाल पर तिल होगा, तो ज़रूर मिलूँगी।”
माँ की बात सुनकर राज चुप हो गया।
उसके मन में डर बैठ गया कि शायद उसकी शादी कभी उसी लड़की से न हो पाए।
शाम को घर आकर उसने रोशनी को सारी बात बता दी।
सब सुनकर रोशनी कुछ देर तक चुप रही।
फिर गहरी साँस लेकर बोली,
“राज, मैं झूठ नहीं बोलना चाहती।
लेकिन अगर तुम्हारी माँ को कोई तिलवाली लड़की नहीं मिली,
तो वे जीवन भर इसी चिंता में डूबी रहेंगी।”
काफी सोच-विचार के बाद रोशनी ने एक फैसला किया।
अगले दिन उसने काजल से अपने गाल पर
एक छोटा-सा तिल बना लिया।
मुलाकात और शादी...
जब रोशनी पहली बार शकुंतला देवी के सामने आई,
तो शकुंतला देवी की नज़र सीधे उसके गाल पर टिक गई।
गाल पर बना छोटा-सा तिल देखते ही
उनका चेहरा खिल उठा।
“हे भगवान!
यही है मेरी तिलवाली बहू…”
उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे
रोशनी को अपने सीने से लगा लिया,
मानो बरसों की कोई मुराद पूरी हो गई हो।
कुछ ही महीनों के भीतर
राज और रोशनी का विवाह धूमधाम से हो गया।
शादी के बाद जैसे घर की तक़दीर ही बदल गई।
जिस ज़मीन के केस में परिवार
सालों से उलझा हुआ था,
वह मामला अचानक उनके पक्ष में खत्म हो गया।
राज को दफ़्तर में प्रमोशन मिला,
घर में पैसों की तंगी दूर होने लगी
और हर कोने में खुशियों की रौनक फैल गई।
शकुंतला देवी गर्व से सबको बतातीं—
“मेरी बहू बड़े ही भाग्य की है,
इसके कदम पड़ते ही
घर में सुख-शांति आ गई है।”
लेकिन इन सारी खुशियों के बीच
रोशनी का मन भीतर-ही-भीतर भारी रहता।
हर मुस्कान के पीछे
एक डर छुपा था—
कहीं यह झूठ सामने न आ जाए…
सच का डर...
हर रोज़ नहाते समय रोशनी का दिल घबराता रहता।
उसे बस एक ही डर सताता—
“कहीं ये काजल बह न जाए…”
एक दिन शाम को सब लोग छत पर खड़े थे।
मौसम सुहाना था, ठंडी हवा चल रही थी।
शकुंतला देवी ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,
“लगता है आज बारिश होगी।”
उनके इतना कहते ही
अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई।
कोई नीचे भागा, कोई हँसने लगा।
रोशनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही
बारिश की धार उसके गालों पर बह चली।
और उसी पल…
उसके गाल पर बना काजल का तिल
धीरे-धीरे मिट गया।
शकुंतला देवी की नज़र उस पर पड़ गई।
वो रुक गईं।
उनकी आँखों में पहले हैरानी थी,
फिर दर्द…
और फिर आँसू।
उन्होंने भारी आवाज़ में पूछा,
“तुमने मुझसे झूठ बोला?”
घर में अचानक सन्नाटा छा गया।
कोई कुछ बोल नहीं पाया।
रोशनी की आँखें झुक गईं।
तभी राज आगे बढ़ा।
काँपती आवाज़ में बोला—
“मा, गलती रोशनी की नहीं है।
मैंने ही उसे ऐसा करने पर मजबूर किया।
मैं आपसे डरता था…
इसलिए सच नहीं बोल पाया।”
शकुंतला देवी बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं।
उनकी चुप्पी सब पर भारी थी।
फिर वे धीरे-धीरे रोशनी के पास आईं
और उसके सिर पर हाथ रख दिया।
रोशनी की आँखों से आँसू बह निकले।
बुद्धि का जागना...
**“बहू, आज मुझे समझ आया है
कि तिल गाल पर नहीं,
दिल पर होना चाहिए।
अगर तुम सच में झूठी होतीं,
तो इस घर में कभी
सुख और शांति नहीं आती।
तुमने नहीं,
मेरी सोच ने परीक्षा दी थी।
ये कोई तिल नहीं था बहू,
ये मेरी आस्था और विश्वास की
कसौटी थी।”**
यह कहते ही
पूरा परिवार मुस्कुरा उठा,
और रोशनी की आँखों में
आँसुओं के साथ
सुकून उतर आया।
सीख:
उस दिन के बाद शकुंतला देवी ने समझ लिया कि
सिर्फ पूजा-पाठ ही जीवन का सहारा नहीं होता,
इंसानों पर विश्वास करना भी उतना ही ज़रूरी होता है।
और रोशनी…
अब उसे किसी काजल के तिल की ज़रूरत नहीं थी,
क्योंकि अपने संस्कार, सच्चाई और प्यार से
वह उस घर की सच्ची लक्ष्मी बन चुकी थी।

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