छोटी छत और बड़े सपने
शिल्पा सुबह बहुत जल्दी उठ गई थी।
सर्दियों की हल्की धूप निकल आई थी—वही धूप जो पूरे दिन में बस दो घंटे के लिए उसकी छोटी-सी छत पर आती थी।
वही छत…
जो उसके लिए सिर्फ़ छत नहीं थी,
बल्कि
कपड़े सुखाने की जगह,
गेहूँ धोने की उम्मीद,
और थोड़ी देर चैन से बैठने का सहारा थी।
वह झाड़ू लगा ही रही थी कि ऊपर से आवाज़ आई—
“ठक… ठक…”
शांति आंटी बिना देखे कूड़ा फेंक चुकी थीं।
शिल्पा का दिल बैठ गया।
उसने संयम से कहा—
“शांति आंटी जी, ये कूड़ा फेंकने की जगह नहीं है।
अभी-अभी मैंने छत साफ़ की थी, ताकि हम लोग धूप में बैठ सकें।”
शांति आंटी थोड़ा झेंप गईं—
“बहू, तुम्हारी छत इतनी छोटी है कि दिखती ही नहीं।
गलती हो जाती है… अब ध्यान रखूँगी।”
शिल्पा कुछ नहीं बोली।
फिर से पूरी छत धोई,
पानी डालते हुए उसकी उँगलियाँ ठंड से सुन्न हो गईं,
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
कुछ देर बाद सास आशा और ससुर विनोद छत पर आए।
गीली छत देखकर विनोद बोले—
“अरे बहू! पूरी छत गीली कर दी।
अब इस ठंड में हम कहाँ बैठेंगे?”
आशा ने ताना मारा—
“नीचे तो धूप आती नहीं,
ऊपर जो थोड़ी बहुत आती है,
उस पर भी पानी फेर दिया।”
शिल्पा का गला भर आया—
“माजी, आपको ठंड लगती है…
मुझे भी लगती है।
मैं भी थक जाती हूँ।
और बार-बार दूसरों की छत पर जाना मुझे अच्छा नहीं लगता।”
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर विनोद बोले—
“ठीक है, गेहूँ बाल्टी में रख दे।
निखिल हॉस्टल से आ रहा है,
वही सुमित्रा बहन की छत पर डाल आएगा।”
पड़ोस और ईर्ष्या की दीवार...
निखिल आया।
थका हुआ, ठंड से कांपता हुआ।
फिर भी गेहूँ लेकर सुमित्रा आंटी की बड़ी छत की ओर बढ़ गया।
सुमित्रा मुस्कराईं—
“बेटा, इसे अपनी छत ही समझो।
हमारी छत तो वैसे भी आधी खाली पड़ी रहती है।
अगर किसी के काम आ जाए,
तो छत बड़ी हो या छोटी—
दिल बड़ा होना चाहिए।”
लेकिन नीचे खड़ी कुछ औरतें यह सब चुपचाप देख रही थीं।
उनकी आँखों में अपनापन नहीं,
बल्कि जलन की चिंगारियाँ थीं।
“देखो… कैसे दूसरों की छत पर कब्ज़ा जमाते हैं।”
“खुद की छत क्यों नहीं बनवाते?”
सुमित्रा कुछ नहीं बोलीं…
पर बातें उसके मन में घर कर गईं।
कुछ दिनों बाद,
जब शिल्पा गेहूँ लेने गई तो सुमित्रा का लहजा बदला हुआ था—
“बहू, गेहूँ डालकर जाती हो तो निगरानी खुद किया करो।
हमारे भी और काम रहते हैं।”
शिल्पा के होंठों तक कई जवाब आकर रुक गए।
वह जानती थी—
आज ये शब्द अचानक नहीं बोले गए हैं।
उसने निगाहें झुका लीं और बहुत धीमे से कहा—
“ठीक है आंटी…
आगे से मैं ध्यान रखूँगी।”
इतना कहकर उसने गेहूँ उठाए।
सीढ़ियाँ उतरते हुए उसके क़दम भारी थे।
उसे अब पूरा यक़ीन हो चुका था—
किसी की छत पर जगह मिल जाना आसान है,
लेकिन
किसी के दिल में जगह बनाए रखना
बहुत मुश्किल।
और वह यह भी समझ गई थी—
बीच में कही गई बातें
अपना असर दिखा चुकी थीं।
कपड़ों का पानी और गली का हंगामा
एक दिन शिल्पा ने सर्दियों के मोटे कपड़े
छत की दीवार पर सुखाने के लिए डाल दिए।
कपड़ों से टपकता पानी
नीचे गली में गिरने लगा।
गली में बैठे लोग झुँझला उठे—
“अरे हद है!”
“कपड़े निचोड़ कर डाला करो!”
“सारा पानी हमारे ऊपर गिर रहा है!”
आवाज़ें ऊपर तक आने लगीं।
आशा का पारा चढ़ गया।
वे छत पर ही खड़ी होकर बोल पड़ीं—
“हमारी छत छोटी है तो क्या करें?”
“उड़ जाएँ क्या?”
“अगर अपनी छत पर कपड़े नहीं डालेंगे,
तो कहाँ डालेंगे?”
शिल्पा चुपचाप सब सुनती रही।
फिर बहुत धीमी, थकी हुई आवाज़ में बोली—
“माजी, गली-पड़ोस से लड़ने से कोई फ़ायदा नहीं है।”
“सच ये है कि हमें भी परेशानी होती है…”
“और हमारी वजह से दूसरों को भी।”
इतना कहकर
उसने चुपचाप कपड़े समेट लिए।
छत फिर सूनी हो गई,
और शिल्पा का मन…
पहले से ज़्यादा भारी।
अधूरी छत, अधूरी समझ
रात को शिल्पा पति रवि से बोली—
“या तो छत पूरी करवा लो
या बगल का घर खरीद लो।
हर दिन ताने सुनते-सुनते मैं थक गई हूँ।”
रवि ने हल्की साँस ली—
“माँ पैसे जोड़ रही हैं शिल्पा।
घर लेने के बाद छत भी बराबर करनी होगी।”
शिल्पा कुछ नहीं बोली।
वह समझ गई—
उसकी थकान का अभी कोई हल नहीं है।
उस रात
कमरे में शब्द कम थे,
और चुप्पी बहुत ज़्यादा।
पैसे, डर और एक सच
एक शाम का वक्त था।
आशा और विनोद चुपचाप बैठकर पैसे गिन रहे थे।
नोटों की खड़खड़ाहट उस कमरे में कुछ ज़्यादा ही तेज़ लग रही थी।
उसी वक्त पोता राजू दरवाज़े पर आकर रुक गया।
उसकी नज़र नोटों के ढेर पर टिक गई।
थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह मासूमियत से बोला—
“दादी… आपके पास तो इतने सारे पैसे हैं,
फिर हम कभी कहीं घूमने क्यों नहीं जाते?
मेरे सब दोस्त अपने दादा-दादी के साथ घूमने जाते हैं।”
आशा एक पल को रुक गईं।
उनके हाथ में पकड़ा नोट रुक गया।
हल्की सख़्त आवाज़ में उन्होंने कहा—
“बेटा, ये पैसे घूमने के लिए नहीं हैं।
ये ज़रूरी काम के लिए जोड़कर रखे हैं।”
राजू का चेहरा उतर गया।
उसकी आँखें भर आईं।
“सब ज़रूरी काम ही रहते हैं क्या?”
इतना कहकर वह रोता हुआ बाहर चला गया।
दरवाज़े के बाहर खड़ी शिल्पा सब देख-सुन रही थी।
राजू को रोता देख उसका दिल जैसे टूट गया।
वह खुद को रोक नहीं पाई।
आवाज़ भर्राई, पर शब्द निकल ही गए—
“माँ जी…
पैसे ज़रूरी होते हैं, मैं मानती हूँ।
लेकिन अगर हम अपने ही बच्चों की खुशियाँ नहीं देख पाए,
तो ये पैसे किस काम आएँगे?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
नोटों का ढेर वहीं पड़ा रह गया—
पर पहली बार
आशा की नज़र उन पैसों से हटकर
अपने परिवार पर टिक गई।
उस रात आशा को नींद नहीं आई।
छोटी छत…
बहू की थकान…
पड़ोसियों के ताने…
पोते की बात…
सब आँखों के सामने घूमता रहा।
सुबह होते ही उन्होंने विनोद से कहा—
“आज ही मिस्त्री बुलाओ।”
शिल्पा घबरा गई—
“माजी?”
आशा की आवाज़ कांप रही थी—
“बहू, हम पैसा जोड़ते रहे…
पर ये भूल गए
कि ज़िंदगी छत से बड़ी होती है।”
कुछ महीनों बाद
छत पूरी हो चुकी थी।
पहली बार
पूरा परिवार
एक साथ
धूप में बैठा था।
शिल्पा की आँखों से आँसू बह रहे थे।
आशा ने उसका हाथ पकड़ा—
“छत छोटी नहीं थी बहू…
हमारी सोच छोटी थी।”
सीख:
घर को बचाने के लिए सिर्फ़ पैसा काफ़ी नहीं होता,
वक़्त रहते समझ होना भी ज़रूरी होती है।

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