माईके का सच

Emotional Indian woman standing in her childhood home courtyard with soft morning light, symbolizing motherhood, memories, and emotional belonging


शाम का समय था।

घर में हलचल थी, लेकिन नेहा के मन में अजीब-सी ख़ामोशी भरी हुई थी।


उसने अपने कपड़े एक छोटे से बैग में रखे और धीरे से बोली—

“कल मैं अपने माईके चली जाऊँगी।”


कमरे में बैठे रोहित ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा।

“माईके? अचानक? क्या हुआ?”


नेहा ने नज़रें झुका लीं।

“कुछ नहीं… बस अब बहुत हो गया। पूरे दिन सबका काम, सबकी बातें, सबकी उम्मीदें।

कभी लगता ही नहीं कि मैं भी कोई इंसान हूँ।”


रोहित ने धीरे से पूछा—

“किसी ने कुछ कहा क्या?”


नेहा हल्की हँसी हँस पड़ी, लेकिन आँखें भर आईं।

“जब रोज़ चुप रहना पड़े, तो शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।”



अगले दिन नेहा अपने माईके पहुँच गई।


दरवाज़ा खुला।

पापा सामने खड़े थे।


“आ गई बेटा?”

आवाज़ में खुशी भी थी और चिंता भी।


“हाँ पापा…”

नेहा बस इतना ही कह पाई।


अंदर बैठते ही पापा ने धीरे से पूछा—

“सब ठीक तो है न? ससुराल में कोई बात तो नहीं हुई?”


नेहा तुरंत बोली—

“नहीं पापा, सब ठीक है।”


पापा कुछ पल के लिए चुप हो गए।


फिर धीरे-से बोले—


“बेटा, आज पड़ोस की शर्मा आंटी मिल गई थीं।

पूछने लगीं कि बेटी अचानक माईके क्यों आई है?”


नेहा समझ गई।

लोग सवाल नहीं पूछते…

बस वजह ढूँढते हैं।



रात गहराती जा रही थी।


नेहा अपनी पुरानी चारपाई पर लेटी थी।

आँखें छत पर टिकी थीं,

लेकिन मन कहीं और भटक रहा था।


उसके भीतर एक ही बात बार-बार गूँज रही थी—


मैं तो हमेशा यही कहती थी…

माँ नहीं है तो क्या हुआ,

माईका तो घर से होता है।


पर आज पहली बार दिल ने कुछ और ही सच बताया।


माईका सिर्फ दीवारों से नहीं बनता।

माईका माँ से बनता है।


वो माँ—

जो बिना पूछे सिर पर हाथ रख दे,

जो बिना बोले भी सब समझ जाए।


और उसी एहसास के साथ

नेहा की आँखों से

एक चुपचाप आँसू बह निकला।



शाम को पापा ने प्यार से कहा था—


“बेटा, कल तेरी माँ के नाम का एक दिया जला देंगे।”


यह सुनते ही नेहा की आँखें भर आईं।

दिल जैसे किसी पुराने दर्द से भर गया हो।


थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह धीमी आवाज़ में बोली—


“और पापा… अगर हो सके तो… कड़ी-चावल भी बना लेना।

माँ जब भी उदास होती थी, वही बनाती थी।”


पापा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा,

आँखों में वही पुराना स्नेह था।


उन्होंने धीरे से कहा था—


“आज भी वही बनाएँगे बेटा।”


रात काफ़ी हो चुकी थी।

घर की लाइटें धीमी थीं और चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ था।


नेहा चुपचाप अपनी भाभी के पास आकर बैठ गई।

कुछ पल वह बस यूँ ही बैठी रही, जैसे शब्द ढूँढ रही हो।


फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—

“भाभी… एक बात कहूँ?”


भाभी ने उसके चेहरे की तरफ़ देखा और हल्के से मुस्कुरा दीं।

“हाँ, बोल ना।”


नेहा की आँखें भर आईं।

“एक दिन… अगर हो सके,

तो मेरी माँ को भी अपनी माँ समझ लेना।


और अगर कभी मैं ज़्यादा चुप हो जाऊँ न…

तो समझ जाना कि मुझे समझाने की नहीं,

बस किसी अपने के सुन लेने की ज़रूरत है।”


भाभी ने बिना कुछ कहे उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।

हल्का सा दबाया और बोलीं—

“तू अकेली नहीं है, नेहा।

जब तक मैं हूँ, तुझे चुपचाप रोना भी नहीं पड़ेगा।”


नेहा ने पहली बार उस दिन

दिल से साँस ली।



सुबह हो चुकी थी।

आँगन में हल्की धूप उतर आई थी।


पूजा-घर में माँ के नाम का दिया अभी-अभी जलाया गया था।

उसकी लौ स्थिर थी,

जैसे किसी अनकहे आशीर्वाद को थामे खड़ी हो।


रसोई से कड़ी-चावल की खुशबू आ रही थी।

पूरे घर में एक अजीब-सी शांति फैली हुई थी,

जैसे माँ की मौजूदगी आज भी यहीं कहीं हो।


नेहा आँगन में खड़ी थी।

उसने आसमान की तरफ़ देखा,

और मन ही मन बोली—


“माँ…

अगर हर लड़की को अपने माईके में माँ का आँचल नसीब न हो,

तो कम से कम कोई ऐसा तो हो…

जो उसे पराया समझकर न देखे।”


उस पल नेहा को एक सच्चाई समझ में आ गई—


हर लड़की माईके इसलिए नहीं लौटती कि वह हार गई हो,

वह इसलिए लौटती है…

क्योंकि उसे कहीं तो ऐसा कोना चाहिए

जहाँ उसका होना बिना शर्त स्वीकार किया जाए।






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