आख़िरी चिट्ठी
रात के करीब दस बज रहे थे।
घर की लाइटें जल रही थीं, लेकिन घर में अजीब सी ख़ामोशी थी।
मैं ऑफिस से लौटा तो देखा—
रसोई में मेरी पत्नी कविता चुपचाप रोटियाँ बना रही थी।
चेहरे पर थकान थी, लेकिन हमेशा की तरह कोई शिकायत नहीं।
मैंने बैग सोफे पर फेंका और कहा,
“कविता, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”
वह बिना पलटे बोली,
“खाना गरम कर दूँ?”
मैं चुप रहा।
मैंने हिम्मत जुटाकर कहा—
“मुझे अलग होना है।”
उसके हाथ से बेलन छूट गया।
कुछ पल वह वहीं खड़ी रही, फिर बहुत शांत आवाज़ में पूछा—
“क्यों?”
उस सवाल में गुस्सा नहीं था।
बस एक थकी हुई उम्मीद थी।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
अचानक वह फूट पड़ी—
“अगर किसी और से प्यार हो गया है तो सच बोलो!”
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे,
और मैं…
मैंने सिर झुका लिया।
वह सब समझ गई।
उस रात हम दोनों अलग-अलग कमरों में सोए।
मैं करवटें बदलता रहा,
और वह शायद तकिए में मुँह दबाकर रोती रही।
कुछ दिनों बाद मैंने तलाक़ के काग़ज़ बना लिए।
घर, ज़मीन, बैंक बैलेंस—
सब उसके नाम करने को तैयार था।
लेकिन उसने काग़ज़ फाड़ दिए।
“मुझे कुछ नहीं चाहिए,”
वह बोली,
“बस एक महीना।”
“एक महीना?”
मैं चौंका।
“हाँ,”
उसने कहा,
“हमारी बेटी की बोर्ड परीक्षा है।
मैं नहीं चाहती कि वह टूटे।”
फिर थोड़ी देर चुप रहकर बोली—
“और एक बात…
हर दिन रात को सोने से पहले,
तुम मुझे अपने हाथों से कमरे तक छोड़ोगे।
जैसे पहले करते थे।”
मुझे यह अजीब लगा।
लेकिन मैंने हाँ कर दी।
पहली रात जब मैंने उसका हाथ पकड़ा,
तो अजीब सा लगा।
उसका हाथ ठंडा और बहुत हल्का था।
बेटी दरवाज़े के पास खड़ी मुस्कुरा रही थी।
उसके लिए यह सब “सामान्य” था।
दूसरी रात आसान लगी।
तीसरी रात…
मैंने महसूस किया कि कविता बहुत कमजोर हो गई है।
उसकी हँसी अब धीमी थी।
आँखों के नीचे काले घेरे थे।
एक दिन उसने कहा,
“मेरी साड़ियाँ ढीली हो गई हैं।”
मैंने ध्यान से देखा।
वह सच में बहुत दुबली हो चुकी थी।
महीने के आख़िरी हफ्ते में
मैं रोज़ किसी बहाने उसे देखता रहता।
उसकी चाय,
उसकी खाँसी,
उसकी चुप्पी…
और मुझे पहली बार एहसास हुआ—
मैंने उसे कब खो दिया,
मुझे पता ही नहीं चला।
उस आख़िरी दिन
जब मैं उसे कमरे तक छोड़ रहा था,
वह मेरे कंधे पर सिर रखकर बोली—
“अगर कभी मुझे ढूँढो…
तो अपनी यादों में ढूँढना।”
मेरे सीने में कुछ टूट गया।
अगले दिन मैं अपनी प्रेमिका से मिलने गया।
उसे देखकर बस इतना कहा—
“मैं गलत था।”
वह हँसी,
फिर गुस्से में दरवाज़ा बंद कर लिया।
मैं सीधे घर लौटा।
रास्ते में फूल खरीदे।
लेकिन घर पहुँचते ही
सब कुछ खत्म हो चुका था।
कविता अस्पताल में भर्ती थी।
स्टेज-4 कैंसर।
वह महीनों से जानती थी,
लेकिन किसी को नहीं बताया।
उसकी आख़िरी चिट्ठी मुझे मिली—
> “मैं चाहती थी कि हमारी बेटी
अपने पिता को सम्मान के साथ देखे।
मैं तुम्हें दोषी नहीं ठहराना चाहती थी।
बस इतना चाहती थी
कि जाते-जाते
तुम मुझे फिर से ‘अपना’ समझ लो।”
आज जब मैं रात को
अपनी बेटी को सुलाने जाता हूँ,
वह पूछती है—
“पापा, मम्मी अब कहाँ हैं?”
मैं जवाब नहीं दे पाता।
बस उसकी फोटो के सामने
चुपचाप बैठ जाता हूँ।
कुछ रिश्ते
तलाक से नहीं,
लापरवाही से टूटते हैं।
और कुछ पछतावे
ज़िंदगी भर
सोने नहीं देते।

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