बुजुर्ग का सच्चा घर

 

Happy elderly people spending time together in a peaceful old age home garden with volunteers helping them.


सुबह का समय था।

सूरज की हल्की किरणें आंगन में फैल रही थीं।


श्यामलाल जी अपने कमरे के बाहर कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे। उनकी उम्र करीब सत्तर साल थी। चेहरा शांत था, लेकिन आंखों में गहरी उदासी साफ दिखाई देती थी।


उनका बेटा अमन शहर में एक बड़ी कंपनी में काम करता था।

दो साल पहले ही वह अपने पिता को गांव से शहर लेकर आया था।


अमन की पत्नी प्रिया को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी कि श्यामलाल जी उनके साथ रहें।

वह अक्सर अमन से कहती—


“हमने शादी की है अपनी जिंदगी जीने के लिए, किसी की सेवा करने के लिए नहीं।”


अमन हर बार बात टाल देता, लेकिन धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।


एक दिन सुबह श्यामलाल जी रसोई में पानी लेने गए।

उनके हाथ से गलती से प्लेट गिर गई और टूट गई।


आवाज़ सुनकर प्रिया दौड़ती हुई आई।


वह गुस्से में बोली—

“बाबूजी आपको दिखाई नहीं देता क्या? हर समय कुछ न कुछ गिरा देते हैं। अब कौन साफ करेगा यह सब?”


श्यामलाल जी धीरे से बोले—

“बेटी मैं साफ कर देता हूं।”


वह झुककर कांच के टुकड़े उठाने लगे। तभी एक नुकीला टुकड़ा उनके हाथ में चुभ गया और खून निकलने लगा।


प्रिया ने देखा तो बोली—

“अरे अब खून भी फैला दिया! जाइये अपने कमरे में, मेरा काम और बढ़ा दिया।”


श्यामलाल जी चुपचाप अपने कमरे में चले गये।


कमरे में उनकी पत्नी सावित्री की फोटो रखी थी।

उसे देखते ही उनकी आंखें भर आईं।


सावित्री जी जब तक जिंदा थीं, श्यामलाल जी को कभी कोई तकलीफ नहीं होने देती थीं।

उनकी हर जरूरत का ख्याल रखती थीं।


शाम को जब अमन घर आया तो प्रिया ने उसे सारी बात बता दी।


अमन गुस्से में पिता के कमरे में गया और बोला—


“पापा आप थोड़ा संभलकर क्यों नहीं रहते? हर दिन कोई न कोई परेशानी खड़ी कर देते हैं।”


श्यामलाल जी चुप रहे।


अमन बड़बड़ाता हुआ कमरे से बाहर चला गया।


श्यामलाल जी की आंखों के सामने पुरानी यादें घूमने लगीं।


उन्हें याद आया जब अमन छोटा था।


उन्होंने उसकी पढ़ाई के लिए दिन-रात मेहनत की थी।

खेत में काम करते थे, फिर भी रोज उसे स्कूल छोड़ने जाते थे।


गर्मी हो या बारिश, उन्होंने कभी अपने बेटे को तकलीफ नहीं होने दी।


अमन जब बड़ा हुआ तो शहर पढ़ने चला गया।

फिर वहीं नौकरी मिल गई।


धीरे-धीरे गांव से उसका रिश्ता कम होता गया।


एक दिन उसने फोन पर बताया कि वह अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाहता है।


श्यामलाल जी और सावित्री जी बहुत खुश हुए।

लेकिन अमन ने कहा—


“शादी शहर में होगी… आप लोगों को आने की जरूरत नहीं है। वहां गांव वाले माहौल में आप लोग असहज हो जाएंगे।”


यह सुनकर सावित्री जी बहुत रोई थीं।


कुछ समय बाद उनकी तबीयत खराब रहने लगी और एक दिन वह दुनिया छोड़कर चली गईं।


अब श्यामलाल जी बिल्कुल अकेले हो गए थे।


रिश्तेदारों के कहने पर अमन उन्हें शहर ले आया, लेकिन यहां भी उन्हें अपनापन नहीं मिला।


एक दिन शाम को श्यामलाल जी पार्क में बैठे थे।


वह बहुत उदास थे।


तभी उन्होंने देखा कि कुछ बुजुर्ग लोग पास में बैठकर हंस रहे थे और बातें कर रहे थे।


उनमें से एक सज्जन उनके पास आये।


उन्होंने मुस्कुराकर पूछा—

“भाई साहब आप नए लगते हैं यहां?”


श्यामलाल जी ने सिर हिलाया।


उस व्यक्ति ने अपना नाम गोपाल बताया।


थोड़ी देर बातचीत के बाद गोपाल जी बोले—


“हम सब पास के एक वृद्धाश्रम में रहते हैं। वहां सब लोग मिलजुलकर रहते हैं। कोई अकेला नहीं रहता।”


श्यामलाल जी ने हैरानी से पूछा—

“क्या वहां सच में लोग खुश रहते हैं?”


गोपाल जी हंसते हुए बोले—


“बिल्कुल। वहां सम्मान भी है और अपनापन भी।”


अगले दिन गोपाल जी उन्हें आश्रम दिखाने ले गए।


वहां का माहौल देखकर श्यामलाल जी हैरान रह गए।


कुछ लोग किताब पढ़ रहे थे, कुछ खेल रहे थे, और कुछ भजन गा रहे थे।


आश्रम के लोग बुजुर्गों की बहुत सेवा कर रहे थे।


श्यामलाल जी को पहली बार लगा कि शायद यही उनका सच्चा घर हो सकता है।


दो दिन बाद उन्होंने फैसला कर लिया।


उन्होंने अपने बेटे को कुछ नहीं बताया।


बस अपना छोटा सा बैग उठाया और आश्रम पहुंच गए।


आश्रम के लोगों ने उनका बहुत प्यार से स्वागत किया।


अब श्यामलाल जी वहां अपने नए दोस्तों के साथ हंसते-खेलते रहते हैं।


उन्हें अब किसी से शिकायत नहीं थी।


क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—


कभी-कभी खून के रिश्तों से ज्यादा अपनापन अनजान लोग दे देते हैं।





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