बेटी का सहारा
सुबह का समय था।
घर के आंगन में हल्की धूप फैल रही थी।
रामस्वरूप जी बरामदे में चारपाई पर बैठे चुपचाप सामने की सड़क को देख रहे थे। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
दो महीने बाद उनकी बेटी कविता की शादी थी।
लेकिन घर में कोई खास तैयारी नहीं हो रही थी।
दरअसल रामस्वरूप जी की पत्नी लक्ष्मी को गुजरे तीन साल हो चुके थे।
उनके जाने के बाद घर जैसे सूना हो गया था।
रामस्वरूप जी का एक बेटा भी था — रोहित।
रोहित की शादी पांच साल पहले पूजा से हुई थी।
जब लक्ष्मी जी जिंदा थीं, तब घर में सब ठीक था।
घर हंसी-खुशी से भरा रहता था।
लेकिन लक्ष्मी जी के जाने के बाद धीरे-धीरे सब बदल गया।
रोहित और पूजा ने कुछ ही महीनों बाद अलग फ्लैट ले लिया।
उन्होंने कहा —
“पापा, ऑफिस बहुत दूर पड़ता है, इसलिए हमें अलग रहना पड़ेगा।”
रामस्वरूप जी समझ गये थे कि असली वजह कुछ और है, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
पत्नी के जाने से दो दिन पहले लक्ष्मी जी ने रामस्वरूप जी का हाथ पकड़कर कहा था —
“सुनो जी… अगर मुझे कुछ हो गया तो कविता की शादी की जिम्मेदारी आपकी है। उसे कभी अकेला मत छोड़ना।”
रामस्वरूप जी की आंखें भर आई थीं।
उन्होंने कहा —
“तुम ऐसा क्यों बोल रही हो? तुम ठीक हो जाओगी।”
लेकिन लक्ष्मी जी को जैसे सब पता था।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा —
“और हां… रोहित से ज्यादा उम्मीद मत रखना। हर इंसान अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाता है।”
उस दिन रामस्वरूप जी ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया था।
लेकिन आज उन्हें लक्ष्मी जी की हर बात सच लग रही थी।
कविता एक प्राइवेट कंपनी में काम करती थी।
वह सुबह जल्दी ऑफिस चली जाती और शाम को देर से घर लौटती।
घर का ज्यादा काम रामस्वरूप जी ही करते थे।
खाना बनाना, सफाई करना, बाजार जाना — सब कुछ।
कविता कई बार कहती —
“पापा आप इतना काम मत किया करो।”
लेकिन रामस्वरूप जी हंसकर टाल देते।
“अरे बेटी… काम करता रहूंगा तो शरीर चलता रहेगा।”
एक रविवार की सुबह रामस्वरूप जी जल्दी उठ गये।
वे चुपचाप तैयार हुए और घर से निकलने लगे।
तभी कविता की नींद खुल गई।
“पापा इतनी सुबह कहां जा रहे हो?”
रामस्वरूप जी थोड़ा झेंपते हुए बोले —
“बस बेटी… थोड़ा जरूरी काम है।”
कविता ने कहा —
“कम से कम नाश्ता तो कर लो।”
रामस्वरूप जी बोले —
“तू आराम कर, मैं बाहर खा लूंगा।”
और वे जल्दी से घर से निकल गये।
असल में रामस्वरूप जी अपने बेटे रोहित के घर जा रहे थे।
वे चाहते थे कि बेटी की शादी में बेटा साथ रहे।
कुछ ही देर में वे रोहित के फ्लैट के सामने खड़े थे।
उन्होंने डोरबेल बजाई।
दरवाजा पूजा ने खोला।
“अरे पापा… आप यहां?”
रामस्वरूप जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा —
“बेटी, रोहित है क्या?”
पूजा ने अंदर जाकर आवाज लगाई —
“रोहित… पापा आये हैं।”
रोहित बाहर आया।
“अरे पापा, अंदर आइए।”
रामस्वरूप जी धीरे से बोले —
“बेटा… कविता की शादी अगले महीने है। मैं चाहता हूं कि तुम दोनों कुछ दिन पहले आकर घर संभाल लो।”
रोहित कुछ बोल पाता उससे पहले पूजा बोल पड़ी —
“पापा हम लोग बहुत बिजी हैं। ऑफिस से छुट्टी मिलना मुश्किल है।”
रामस्वरूप जी का दिल बैठ गया।
उन्होंने धीरे से कहा —
“मैं पैसे नहीं मांग रहा हूं… बस चाहता हूं कि बेटी की शादी में उसका भाई साथ रहे।”
रोहित चुप रहा।
पूजा बोली —
“देखिए पापा… हम कोशिश करेंगे।”
रामस्वरूप जी समझ गये थे।
यह सिर्फ टालने वाली बात है।
वे चुपचाप उठकर वहां से चल दिये।
घर पहुंचकर उन्होंने देखा कविता उनका इंतजार कर रही थी।
“पापा आप ठीक तो हो?”
बस इतना सुनते ही रामस्वरूप जी की आंखों से आंसू निकल पड़े।
कविता घबरा गई।
“क्या हुआ पापा?”
रामस्वरूप जी ने रोते हुए कहा —
“मैं रोहित के पास गया था… सोचा था शादी में मदद करेगा।”
कविता ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“पापा… हमें किसी की जरूरत नहीं है।”
धीरे-धीरे शादी का दिन नजदीक आने लगा।
रामस्वरूप जी ने अपने कुछ पुराने दोस्तों की मदद से सारी तैयारियां कर लीं।
घर में मेहमान आने लगे।
लेकिन रोहित का कोई फोन नहीं आया।
आखिर शादी का दिन भी आ गया।
बारात आ चुकी थी।
कविता दुल्हन बनकर स्टेज पर बैठी थी।
तभी अचानक रोहित और पूजा वहां आ गये।
उन्होंने बस फोटो खिंचवाए, खाना खाया और जाने लगे।
रोहित ने जाते-जाते एक लिफाफा निकालकर पापा को देना चाहा।
रामस्वरूप जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बेटा… इसे अपने पास रखो। हमें इसकी जरूरत नहीं है।”
रोहित चुप हो गया।
बेटी की विदाई के बाद घर एकदम खाली हो गया।
रामस्वरूप जी बहुत अकेले हो गये।
कुछ दिनों बाद कविता और उसका पति आदित्य उनसे मिलने आये।
आदित्य ने कहा —
“पापा अब आप हमारे साथ चलिए।”
रामस्वरूप जी बोले —
“नहीं बेटा… बेटी के घर नहीं रहा जाता।”
कविता मुस्कुराई।
“पापा शादी से पहले मैंने एक शर्त रखी थी।”
रामस्वरूप जी ने हैरानी से पूछा —
“कैसी शर्त?”
कविता बोली —
“कि मेरे पापा हमेशा हमारे साथ रहेंगे।”
आदित्य ने भी कहा —
“पापा… हमें भी आपका साथ चाहिए।”
रामस्वरूप जी की आंखें भर आईं।
उन्हें लगा जैसे लक्ष्मी जी कहीं से मुस्कुरा रही हों।
उन्होंने धीरे से कहा —
“शायद भगवान ने मुझे बेटी के रूप में सबसे बड़ा सहारा दिया है।”
और उस दिन रामस्वरूप जी अपने नए घर की ओर चल पड़े।

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