सीख जो समय पर काम आ गई
रविवार की सुबह थी।
घर में हलचल मची हुई थी।
मां रसोई में व्यस्त थीं और पायल अपने कमरे में मोबाइल पर रील्स देख रही थी।
“पायल… जरा इधर आओ बेटा।”
“क्या हुआ मां? अभी तो बैठी हूं…”
“आओ तो सही। आज तुम्हें खीर बनाना सिखाती हूं।”
पायल ने मुंह बनाते हुए कहा,
“मां प्लीज़! ये सब पुरानी बातें हैं। अब जमाना बदल गया है। सब कुछ ऑनलाइन मिल जाता है। शादी के बाद जरूरत पड़ी तो सीख लूंगी।”
मां ने गहरी सांस ली।
“बेटा, जरूरत पहले सिखाती नहीं… परखती है।”
लेकिन पायल हंसकर टाल गई।
“आप भी ना मां… ड्रामा करती रहती हो!”
समय बीतता गया।
पायल की पढ़ाई पूरी हुई और उसकी शादी अच्छे घर में तय हो गई।
ससुराल वाले समझदार थे। पति रोहन भी बहुत अच्छा था।
शादी के बाद पायल नए घर में आ गई।
सब कुछ नया था… नए लोग, नई जगह, नई जिम्मेदारियां।
शुरू के दो दिन तो मेहमानों की भीड़ में निकल गए।
तीसरे दिन सासू मां मुस्कुराते हुए बोलीं —
“बहू, हमारे यहां रिवाज है कि नई बहू पहली बार रसोई में कुछ मीठा बनाती है। जो तुम्हें अच्छा लगे बना लेना।”
यह सुनते ही पायल के चेहरे का रंग उड़ गया।
हाथ ठंडे पड़ गए।
उसे मां की बात याद आई —
“जरूरत पहले परखती है…”
ननद ने पूछा,
“भाभी, आप ठीक तो हैं?”
पायल ने जबरन मुस्कुराकर कहा,
“हां दीदी… बस थोड़ा सा घबराहट है।”
वह कमरे में गई और दरवाजा बंद कर लिया।
आंखों से आंसू बहने लगे।
“काश… मां की बात मान ली होती। थोड़ा भी सीख लिया होता तो आज इतना डर नहीं लगता।”
कुछ देर सोचने के बाद उसने हिम्मत की और मां को फोन लगाया।
“हां पायल, कैसी है मेरी बेटी?”
मां की आवाज सुनते ही वह रो पड़ी।
“मां… मुझे कुछ नहीं आता। आज सबके सामने मुझे मीठा बनाना है। मैं क्या करूं?”
मां ने प्यार से कहा,
“रोने से कुछ नहीं होगा। ध्यान से सुनो… मैं तुम्हें सबसे आसान तरीका बताती हूं।”
मां ने उसे सूजी का हलवा बनाना सिखाया।
कितनी आंच पर घी डालना है, कब सूजी भूननी है, कितनी चीनी डालनी है — सब विस्तार से बताया।
साथ ही कहा,
“डर मत। मन से बनाओगी तो स्वाद अपने आप आ जाएगा।”
पायल ने आंसू पोंछे।
खुद को संभाला।
शाम को वह रसोई में गई।
दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
लेकिन उसने मां की हर बात याद रखते हुए हलवा बनाया।
जब हलवा तैयार हुआ तो उसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई।
सासू मां ने पहला कौर खाया और मुस्कुराईं —
“वाह बहू! बहुत स्वादिष्ट बनाया है।”
ननद ने कहा,
“भाभी, आप तो छुपी रुस्तम निकलीं!”
रोहन ने भी हंसकर कहा,
“मुझे तो पहले से पता था, मेरी पत्नी सब कर सकती है।”
पायल की आंखें फिर भर आईं…
लेकिन इस बार खुशी के आंसू थे।
रात को उसने मां को फोन किया।
“मां… आपका धन्यवाद। अगर आज आपने साथ नहीं दिया होता तो…”
मां ने बात बीच में काट दी,
“बेटी, मां-बाप डांटते जरूर हैं, लेकिन सिखाते इसलिए हैं ताकि तुम कहीं झुको नहीं।”
उस दिन के बाद पायल ने ठान लिया —
हर दिन कुछ नया सीखेगी।
धीरे-धीरे उसने खाना बनाना, घर संभालना और जिम्मेदारियां निभाना सीख लिया।
कुछ महीनों बाद जब उसकी छोटी बहन ने कहा —
“दीदी, मुझे ये सब नहीं सीखना!”
तो पायल मुस्कुराई और बोली —
“सीख ले पगली… समय हमेशा मौका नहीं देता, कभी-कभी सीधा परीक्षा ले लेता है।”
सीख:
मां-बाप की बातें उस समय भले अच्छी न लगें,
पर उनमें जीवन का अनुभव छुपा होता है।
समय आने पर वही सीख
हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।

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