जिम्मेदारी का असली हक
घर के आँगन में हल्की धूप बिखरी हुई थी। रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी, लेकिन घर का माहौल अजीब सा भारी था।
रीना चुपचाप रसोई में खड़ी सब्ज़ी काट रही थी, जबकि उसके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। बाहर हॉल में उसकी सास कमला देवी टीवी देख रही थीं और बीच-बीच में आवाज़ लगा रही थीं—
“रीना, चाय बनी कि नहीं अभी तक?”
“जी मम्मी जी, बस ला रही हूँ…”
रीना ने धीमे स्वर में जवाब दिया।
घर में रीना की शादी को दस साल हो चुके थे। इन दस सालों में उसने इस घर को अपना मानकर हर जिम्मेदारी निभाई थी। पति अमित, सास कमला देवी, देवर रोहित और ननद पायल—सबकी देखभाल उसने पूरे मन से की थी।
जब रीना इस घर में आई थी, तब घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। अमित की नौकरी भी नई-नई थी। रीना ने खर्च संभाला, घर संभाला, और धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा।
लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, लोगों का व्यवहार नहीं बदला।
रोहित की शादी नेहा से हुई। नेहा शुरू से ही स्मार्ट और बातों में तेज थी। वो ज्यादा काम नहीं करती, लेकिन बातों से सबका दिल जीत लेती थी।
कमला देवी को भी नेहा बहुत पसंद थी।
“छोटी बहू कितनी समझदार है… देखो कैसे सबको हँसा कर रखती है,”
वो अक्सर कहती थीं।
रीना ये सब सुनकर चुप रह जाती। उसे आदत हो चुकी थी।
धीरे-धीरे हालात ऐसे हो गए कि घर का सारा काम रीना के जिम्मे आ गया। नेहा कभी-कभार मदद कर देती, लेकिन ज्यादातर समय अपने फोन या बाहर घूमने में बिताती।
एक दिन रीना ने अमित से कहा—
“सुनो, अब तो रोहित और नेहा भी हैं घर में। थोड़ा काम बाँट लिया जाए तो अच्छा रहेगा। मैं भी अब बहुत थक जाती हूँ…”
अमित ने बात तो समझी, लेकिन कहा—
“मम्मी को ये सब पसंद नहीं आएगा… तुम थोड़ा एडजस्ट कर लो ना।”
रीना फिर चुप हो गई।
कुछ महीने बाद कमला देवी अचानक बीमार पड़ गईं। उन्हें चलने-फिरने में दिक्कत होने लगी। अब उनकी पूरी देखभाल की जिम्मेदारी भी रीना पर आ गई।
सुबह से रात तक वो बस काम में लगी रहती—दवाई देना, खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों को देखना…
नेहा ने साफ कह दिया—
“मुझे ये सब नहीं आता दीदी, मैं तो बाहर ही ज्यादा रहती हूँ।”
और रोहित भी अपने काम का बहाना बनाकर अलग फ्लैट में शिफ्ट हो गया।
लेकिन हर रविवार दोनों आ जाते।
और आते ही नेहा बोलना शुरू कर देती—
“दीदी, आप मम्मी का ठीक से ध्यान नहीं रखतीं। देखिए उनके कपड़े कितने गंदे हैं…”
रीना सब सुनकर भी चुप रहती।
एक दिन हद हो गई।
घर में कुछ रिश्तेदार आए हुए थे। सबके सामने कमला देवी बोलीं—
“मेरी छोटी बहू तो बहुत सेवा करती है मेरी… बड़ी बहू को तो बस अपने काम से मतलब है।”
रीना ये सुनकर अंदर तक टूट गई।
उस रात उसने फैसला कर लिया।
अगले दिन जब रोहित और नेहा आए, तो रीना ने शांत आवाज़ में कहा—
“रोहित, अब मम्मी जी कुछ दिन तुम्हारे साथ रहेंगी। तुम लोग भी उनकी सेवा का मौका लो।”
सब चौंक गए।
कमला देवी गुस्से में बोलीं—
“अब मैं बोझ बन गई हूँ क्या?”
रीना पहली बार खुलकर बोली—
“नहीं मम्मी जी, बोझ तो मैं भी नहीं हूँ। लेकिन सेवा सिर्फ एक की जिम्मेदारी नहीं होती। जिस तरह अमित आपके बेटे हैं, उसी तरह रोहित भी हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
रोहित और नेहा एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
रीना आगे बोली—
“अब तक मैंने बिना कुछ कहे सब किया। लेकिन जब मेरे काम की कोई कद्र ही नहीं, तो अब मैं भी वही करूँगी जो सबको अच्छा लगता है—बस दिखावा।”
उस दिन के बाद बहुत कुछ बदल गया।
रोहित मम्मी को अपने साथ ले गया। कुछ ही दिनों में उसे समझ आ गया कि जिम्मेदारी निभाना कितना मुश्किल होता है।
नेहा भी अब धीरे-धीरे काम सीखने लगी।
और कमला देवी…
उन्हें भी पहली बार एहसास हुआ कि असली सेवा क्या होती है।
कुछ हफ्तों बाद जब वो वापस आईं, तो उन्होंने रीना का हाथ पकड़कर कहा—
“बहू, मुझे माफ कर दे… मैं तुझे समझ नहीं पाई।”
रीना की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं… सुकून के थे।
सीख:
जो चुपचाप सब सहता है, वो कमजोर नहीं होता।
लेकिन जब वो बोलता है, तब सच सबके सामने आ जाता है।

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