अपनापन सबसे बड़ा धन
रसोई से काम निपटाकर जब राधिका अपने कमरे में आई, तो उसने देखा कि मेज पर रखा मोबाइल लगातार चमक रहा था। स्क्रीन पर उसके पिताजी का नाम बार-बार दिख रहा था।
राधिका का दिल हल्का सा धड़क उठा। उसने तुरंत फोन मिलाया।
“पापा, माफ करना… मैं काम में लगी थी, फोन नहीं सुन पाई।”
उधर से पिताजी की धीमी मगर खुश आवाज आई,
“कोई बात नहीं बेटा। बस ये बताना था कि परसों हम तुम्हारे यहाँ आ रहे हैं… तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए कुछ खास बनाया है।”
राधिका कुछ पल के लिए चुप रह गई।
“क्या बना रही हैं माँ?” उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
पापा हँस पड़े,
“ये तो अपनी माँ से ही पूछ लो।”
फोन माँ को दे दिया गया।
“जुग जुग जियो बेटी,” माँ ने प्यार से कहा,
“इस बार तेरी पसंद की सब चीजें बनाई हैं—तिल के लड्डू, गुड़ की पट्टी, मठरी, और तेरी पसंद की मीठी सेवई। तेरे ससुराल वालों के लिए भी कुछ कपड़े लिए हैं।”
राधिका बस सुनती रही। उसकी आँखों में नमी उतर आई थी, लेकिन आवाज में वो सब छुपाकर बोली,
“ठीक है माँ… बाद में बात करती हूँ।”
फोन रखते ही उसका मन भारी हो गया।
जो बात उसे सबसे ज्यादा परेशान कर रही थी, वो ये नहीं थी कि माँ-पापा आ रहे हैं… बल्कि ये थी कि क्या उसका ससुराल उनके उस सादगी भरे प्यार की कद्र कर पाएगा?
राधिका एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी। उसके घर में पैसे भले ही कम थे, लेकिन रिश्तों में बहुत गर्माहट थी।
छोटा सा घर, लेकिन हर कोने में अपनापन भरा हुआ।
पापा ऑफिस से आते तो माँ चाय बनाती, और राधिका उनके पास बैठकर दिनभर की बातें करती। कभी हँसी, कभी छोटी-छोटी नोकझोंक… लेकिन सब कुछ दिल से जुड़ा हुआ।
और अब…
उसका ससुराल बहुत बड़ा था। आलीशान घर, नौकर-चाकर, हर सुविधा… लेकिन रिश्तों में वो गर्माहट कहीं खो सी गई थी।
सब अपने-अपने काम में व्यस्त रहते।
ससुर जी बिजनेस में, पति मीटिंग्स में, सास अपनी किटी पार्टी में, और घर के बाकी लोग अपनी-अपनी दुनिया में।
राधिका को किसी चीज की कमी नहीं थी… लेकिन फिर भी वो अंदर से खाली महसूस करती थी।
उसे डर लग रहा था…
“अगर माँ-पापा यहाँ आए और किसी ने उन्हें समय ही नहीं दिया तो? अगर उनके लाए साधारण से उपहारों को कोई महत्व नहीं मिला तो?”
उसने मन ही मन सोचा,
“काश… वो ना आएं…”
लेकिन अगले ही पल उसका दिल तड़प उठा,
“नहीं… मैं उनसे मिले बिना कैसे रह सकती हूँ…”
दोनों भावनाएँ उसे अंदर ही अंदर तोड़ रही थीं।
रात भर उसे नींद नहीं आई।
अगले दिन वो बार-बार घड़ी देखती रही।
तभी अचानक दरवाजे के बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई।
राधिका जल्दी से बाहर भागी।
उसने सोचा—पापा ऑटो से आएंगे…
लेकिन सामने जो था, वो देखकर वो हैरान रह गई।
घर की बड़ी गाड़ी खड़ी थी… और उसमें से उसके ससुर जी उतर रहे थे।
उनके साथ उसके पिताजी भी थे… और उसके पति उनके सामान को संभाल रहे थे।
राधिका कुछ समझ ही नहीं पाई।
ससुर जी मुस्कुराते हुए बोले,
“अरे बहू, हमें तो तुम्हारे पिताजी ने पहले ही बता दिया था कि वो आ रहे हैं। इसलिए हम खुद उन्हें स्टेशन लेने गए थे।”
राधिका की आँखें भर आईं।
तभी सास भी बाहर आईं,
“जल्दी अंदर आइए समधी जी… हम सब आपका इंतजार कर रहे थे।”
घर के बाकी लोग भी आ गए।
सबने आदर से उनके पैर छुए, हाल-चाल पूछा।
पति ने हँसते हुए कहा,
“पापा जी, आज ऑफिस का कोई काम नहीं… पूरा दिन आपके साथ बिताएंगे।”
राधिका के पिताजी थोड़े भावुक हो गए थे।
“अरे, इतनी तकलीफ क्यों की आप लोगों ने…”
ससुर जी ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा,
“समधी जी, ये तकलीफ नहीं… हमारा सौभाग्य है।”
फिर सब लोग बैठ गए।
माँ के हाथ के बने तिल के लड्डू और मठरी जब सामने आई, तो सबने बड़े चाव से खाया।
सास बोलीं,
“वाह! इतनी स्वादिष्ट चीजें… हमें तो रेसिपी भी सीखनी पड़ेगी।”
घर में पहली बार ऐसा माहौल था—जहाँ सब साथ बैठे थे, हँस रहे थे, बातें कर रहे थे।
राधिका एक कोने में खड़ी ये सब देख रही थी।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे… लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं थे।
ये सुकून के थे।
उसके पति उसके पास आए और धीरे से बोले,
“तुम सोच रही थी ना… कि हम तुम्हारे पापा को समझ नहीं पाएंगे?”
राधिका चुप रही।
पति ने मुस्कुराकर कहा,
“रिश्ते पैसे से नहीं… दिल से चलते हैं।”
राधिका ने पहली बार महसूस किया…
कि शायद उसने अपने ससुराल को समझने में जल्दी कर दी थी।
हर घर में प्यार होता है… बस उसे देखने की नजर चाहिए।
उस दिन राधिका ने एक बात दिल से समझ ली—
“सच्चा सम्मान बड़े घर या छोटे घर में नहीं… बल्कि बड़े दिल में होता है।”
और उस दिन उसका ससुराल… सच में उसका अपना घर बन गया था।

Post a Comment