समय का आईना
रमा देवी रसोई में खड़ी थीं और तेज़-तेज़ बर्तन पटक रही थीं। उनके चेहरे पर झुंझलाहट साफ झलक रही थी।
"हे भगवान! ये बुढ़ापा भी ना… न खुद चैन से जीते हैं, न दूसरों को जीने देते हैं!" उन्होंने गुस्से में कहा।
उनकी सास, शांति देवी, कमरे के कोने में चारपाई पर बैठी थीं। उम्र लगभग पचहत्तर साल। कमज़ोर शरीर, धुंधली आँखें और कांपते हाथ।
"बहू… थोड़ा पानी दे दे," शांति देवी ने धीमी आवाज़ में कहा।
रमा देवी ने बिना उनकी तरफ देखे जवाब दिया,
"अभी तो दिया था! हर पाँच मिनट में पानी चाहिए। मैं कोई नौकरानी हूँ क्या?"
शांति देवी चुप हो गईं। उनकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
घर में नई बहू आई थी—नैना।
नैना पढ़ी-लिखी, समझदार और बहुत शांत स्वभाव की लड़की थी। शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे। शुरुआत में सब कुछ अच्छा लगा, लेकिन धीरे-धीरे उसे घर की सच्चाई समझ आने लगी।
उसने देखा कि रमा देवी अपनी सास के साथ बहुत कठोर व्यवहार करती हैं।
कभी समय पर खाना नहीं देतीं
कभी डांट देतीं
कभी अनदेखा कर देतीं
नैना को ये सब देखकर बहुत बुरा लगता था।
एक दिन नैना चुपके से शांति देवी के कमरे में गई।
"दादी माँ, मैंने आपके लिए खीर बनाई है," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
शांति देवी चौंक गईं।
"अरे बेटा! अगर रमा देख लेगी तो डांटेगी।"
"डांटेगी तो मैं संभाल लूंगी," नैना ने प्यार से कहा।
शांति देवी ने खीर का एक निवाला खाया… और उनकी आँखें भर आईं।
"बेटा… कई साल बाद किसी ने प्यार से कुछ खिलाया है…"
नैना का दिल भर आया। उसी दिन उसने मन में ठान लिया—कुछ बदलना है।
कुछ दिनों बाद एक घटना हुई।
रमा देवी सीढ़ियों से उतर रही थीं कि अचानक उनका पैर फिसल गया।
"आह्ह!" उनकी जोरदार चीख निकली।
डॉक्टर को बुलाया गया। पता चला—पैर में फ्रैक्चर।
डॉक्टर ने साफ कहा—
"कम से कम दो महीने तक पूरा आराम करना होगा।"
अब हालात बदल गए थे।
जो रमा देवी पूरे घर को संभालती थीं, अब खुद दूसरों पर निर्भर थीं।
शुरुआत में नैना ने रमा देवी की पूरी लगन और ईमानदारी से सेवा की। वह हर काम समय पर और बड़े ध्यान से करती थी—चाहे दवाइयाँ देना हो, खाना खिलाना हो या उनकी साफ-सफाई का ख्याल रखना।
रमा देवी को भी नैना की यह सेवा बहुत अच्छी लग रही थी। उन्हें महसूस हो रहा था कि बहू उनका पूरा ध्यान रख रही है, इसलिए वे मन ही मन संतुष्ट और खुश थीं।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद नैना के व्यवहार में हल्का-सा बदलाव आने लगा, जिसे रमा देवी धीरे-धीरे महसूस करने लगीं।
एक सुबह…
"नैना! चाय दे दो!" रमा देवी ने आवाज़ लगाई।
काफी देर बाद नैना आई। उसके हाथ में स्टील का पुराना गिलास था।
"ये लो चाय," उसने कहा।
रमा देवी चौंक गईं—
"ये क्या है? कप कहाँ है?"
नैना ने शांत स्वर में कहा,
"कप महंगे हैं मम्मी जी… टूट जाएंगे तो नुकसान होगा।"
रमा देवी चुप हो गईं।
ये वही शब्द थे… जो वो अपनी सास से कहती थीं।
दोपहर में नैना खाना लेकर आई।
"आज क्या बनाया है?" रमा देवी ने पूछा।
"कल की बची रोटी है… दूध में भिगो दी है," नैना ने कहा।
"क्या?" रमा देवी का चेहरा उतर गया।
"आप तो आराम कर रही हैं, भारी खाना हज़म नहीं होगा," नैना ने वही बात दोहराई जो रमा देवी हमेशा कहती थीं।
अब रमा देवी समझने लगी थीं।
उन्हें अहसास होने लगा कि नैना क्या कर रही है।
एक दिन उन्हें बहुत प्यास लगी।
"नैना… पानी…" उन्होंने धीरे से कहा।
नैना देर से आई।
"इतना पानी मत पिया करो मम्मी जी… बार-बार उठाना पड़ता है," उसने कहा।
अब रमा देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।
आज उन्हें वही दर्द महसूस हो रहा था… जो उनकी सास रोज सहती थीं।
रात को नैना उनके कमरे में आई।
इस बार उसके हाथ में ट्रे थी—
गरम चाय
ताज़ा खाना
फल
उसने प्यार से कहा,
"मम्मी जी, खाना खा लीजिए।"
रमा देवी ने हैरानी से पूछा,
"तुम… ऐसा क्यों कर रही हो?"
नैना उनके पास बैठ गई।
"मम्मी जी… मैं आपको सज़ा नहीं दे रही थी… बस एहसास करा रही थी।"
रमा देवी चुप रहीं।
नैना ने धीरे से कहा—
"आज जो आपने महसूस किया… वही दादी माँ रोज महसूस करती हैं।"
ये सुनते ही रमा देवी टूट गईं।
वो रो पड़ीं।
"मैं… बहुत गलत थी… मैंने कभी सोचा ही नहीं…"
अगले दिन…
रमा देवी ने कहा,
"मुझे माँ जी के पास ले चलो।"
नैना उन्हें व्हीलचेयर पर शांति देवी के कमरे में ले गई।
शांति देवी ने उन्हें देखा तो घबरा गईं—
"क्या हुआ बहू?"
रमा देवी ने उनके पैर पकड़ लिए।
"माँ जी… मुझे माफ कर दो…"
शांति देवी की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने सिर सहलाते हुए कहा,
"माँ कभी अपनी औलाद से नाराज़ नहीं होती।"
उस दिन के बाद घर बदल गया।
शांति देवी अब अकेली नहीं थीं
रमा देवी उनका ध्यान रखने लगीं
नैना दोनों के बीच पुल बन गई
एक शाम…
तीनों आँगन में बैठकर चाय पी रही थीं।
हँसी की आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी।
रमा देवी ने नैना से कहा—
"तूने मुझे इंसान बना दिया।"
नैना मुस्कुराई—
"नहीं मम्मी जी… मैंने बस आपको आपका ही आईना दिखाया।"
सीख:
👉 जैसा हम दूसरों के साथ करते हैं, वैसा ही एक दिन हमारे साथ होता है।
👉 रिश्ते प्यार से बनते हैं, अधिकार से नहीं।
👉 और सबसे बड़ी बात—
बदलाव कभी भी शुरू किया जा सकता है।

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