समझ का स्पर्श

 

Grandmother and young child sharing an emotional bonding moment in a warm Indian family home, showing love, trust, and understanding.


घर के अंदर हल्की-हल्की हँसी गूंज रही थी, लेकिन उस हँसी के पीछे एक अनकहा तनाव भी छुपा हुआ था।


मेरा नाम पूजा है, मेरी उम्र 30 साल है। मेरी शादी को पाँच साल हो चुके हैं। मेरे पति अमित, जो 34 साल के हैं, बैंक में नौकरी करते हैं। हमारा चार साल का बेटा आरव हमारे जीवन की सबसे बड़ी खुशी है।


आरव बहुत ही चंचल और प्यारा बच्चा है। पूरे घर में उसकी आवाज़ गूंजती रहती है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से एक अजीब बात हम सबको परेशान कर रही थी।


जब भी मेरी सास, सुनीता जी , आरव के पास जातीं या उसे गोद में लेने की कोशिश करतीं, वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगता।


पहले तो हमने इसे बच्चों की सामान्य आदत समझा।


“बच्चे कभी-कभी किसी एक से अटक जाते हैं,” अमित ने समझाया।


लेकिन धीरे-धीरे बात बढ़ने लगी।


आरव न सिर्फ रोता, बल्कि जैसे ही सुनीता जी उसके पास आतीं, वह डरकर पीछे हट जाता, मेरे पीछे छुप जाता और चिल्लाने लगता — “नहीं... दादी नहीं!”


ये सुनकर सुनीता जी का चेहरा उतर जाता।


वो चुपचाप एक कोने में बैठ जातीं और बस दूर से उसे देखती रहतीं।


मेरा दिल टूट जाता था।


एक तरफ मेरा बच्चा था, दूसरी तरफ मेरी सास — जो उसे दिल से चाहती थीं।


एक दिन मैंने देखा, सुनीता जी आरव के लिए उसके पसंदीदा लड्डू बना रही थीं।


वो बार-बार दरवाज़े की तरफ देखतीं, शायद इंतज़ार कर रही थीं कि आरव आए और खुश हो जाए।


लेकिन जब आरव अंदर आया और उन्हें देखा, तो तुरंत मुड़कर बाहर भाग गया।


उस दिन सुनीता जी ने पहली बार मुझसे कहा — “शायद मैं अच्छी दादी नहीं हूँ...”


उनकी आवाज़ में दर्द था, और वो शब्द मेरे दिल में चुभ गए।


उस रात मैं सो नहीं पाई।


क्या सच में आरव को उनसे डर लगता है?


या कोई और बात है जो हम समझ नहीं पा रहे?


अगले दिन मैंने तय किया कि किसी चाइल्ड स्पेशलिस्ट से बात करनी चाहिए।


हम आरव को लेकर डॉक्टर के पास गए।


डॉक्टर ने बहुत ध्यान से सारी बातें सुनीं, फिर आरव को अपने पास बुलाया।


आरव पहले थोड़ा झिझका, लेकिन धीरे-धीरे डॉक्टर के साथ खेलने लगा।


डॉक्टर ने मुझसे पूछा, “क्या आपने ध्यान दिया है कि आपकी सास जब उसके पास आती हैं, तो वो क्या करती हैं?”


मैंने सोचा, फिर कहा, “वो... उसे जोर से बुलाती हैं, जल्दी-जल्दी पकड़ने की कोशिश करती हैं... और कभी-कभी अचानक गोद में उठा लेती हैं।”


डॉक्टर ने सिर हिलाया।


फिर उन्होंने एक बात कही, जिसने सब कुछ साफ कर दिया।


“यह डर दादी से नहीं है... यह अचानक होने वाली हरकतों से है।”


मैं चौंक गई।


“मतलब?”


डॉक्टर मुस्कुराए और समझाने लगे —


“कुछ बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। अगर कोई अचानक तेज आवाज़ में बुलाए, जल्दी से पकड़ ले या बहुत पास आ जाए, तो उन्हें असुरक्षित महसूस होता है। उन्हें लगता है कि कुछ गलत होने वाला है।”


मेरे दिमाग में जैसे एक-एक चीज़ जुड़ने लगी।


हाँ... सुनीता जी अक्सर जोर से बोलती थीं, “आरव आओ!”

और बिना चेतावनी के उसे पकड़ लेती थीं।


डॉक्टर ने आगे कहा —


“बच्चे को समय दीजिए। पहले दूरी से बात करें, धीरे-धीरे पास आएं, और उसे खुद आने दें।”


घर लौटते समय मैं लगातार सोचती रही।


क्या इतनी छोटी-सी बात हमारे बीच दीवार बन गई थी?


शाम को मैंने सुनीता जी से आराम से बात की।


पहले तो वो चुप रहीं, फिर धीरे-धीरे सब समझने लगीं।


उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा — “मैं तो बस उसे ज्यादा प्यार दिखाना चाहती थी...”


अगले दिन से हमने तरीका बदल दिया।


सुनीता जी अब दूर से धीरे-धीरे बात करतीं — “आरव... इधर आओ बेटा...”


कोई जल्दी नहीं, कोई ज़बरदस्ती नहीं।


पहले दिन आरव बस दूर खड़ा रहा।


दूसरे दिन थोड़ा पास आया।


तीसरे दिन उसने उनकी तरफ देखा... और मुस्कुरा दिया।


हम सबकी सांसें जैसे थम गईं।


फिर एक दिन —


आरव खुद दौड़कर आया और उनकी गोद में बैठ गया।


सुनीता जी की आँखों से आँसू बह निकले।


उन्होंने उसे धीरे से पकड़ा... बिना कसावट, बिना डर के।


उस दिन घर में जो खुशी थी, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।


धीरे-धीरे आरव और दादी के बीच गहरा रिश्ता बन गया।


अब दोनों साथ खेलते, हँसते और कहानियाँ सुनते।


एक दिन अमित ने हँसते हुए कहा — “माँ, अब तो आरव आपको सबसे ज्यादा प्यार करता है!”


सुनीता जी मुस्कुराईं और बोलीं — “प्यार दिखाने का तरीका भी सही होना चाहिए...”


उनकी बात मेरे दिल में बस गई।


उस दिन मैंने एक गहरी बात सीखी —


कभी-कभी रिश्तों में दूरी किसी की नीयत से नहीं, बल्कि हमारे तरीके से पैदा होती है।


और जब हम तरीका बदल देते हैं, तो रिश्ते खुद-ब-खुद खिल उठते हैं।





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