जब समझदारी रिश्तों को संभाल लेती है
सुबह के करीब साढ़े नौ बजे थे। घर में हल्की-हल्की चहल-पहल थी। रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी और आँगन में धूप धीरे-धीरे फैल रही थी।
सीमा रसोई में खड़ी नाश्ता बना रही थी, और उसकी सास—कमला जी—डाइनिंग टेबल पर बैठकर सब्ज़ी काट रही थीं।
तभी सीमा का फोन बजा।
“हैलो मम्मी!” सीमा ने मुस्कुराते हुए कहा।
दूसरी तरफ से खुशी भरी आवाज़ आई—
“सीमा, खुशखबरी है! तेरी छोटी बहन माँ बनने वाली है!”
सीमा की आँखें चमक उठीं—
“सच मम्मी? ये तो बहुत अच्छी खबर है!”
“हाँ, लेकिन डॉक्टर ने उसे पूरा आराम करने को कहा है… तो मैंने सोचा, कुछ दिन के लिए तू आ जाए तो अच्छा रहेगा।”
सीमा कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसने धीरे से कमला जी की तरफ देखा।
“मम्मी… मैं कोशिश करती हूँ… बात करके बताती हूँ।”
फोन रखने के बाद वह चुपचाप खड़ी रही।
कमला जी ने पूछा—
“क्या हुआ, बेटा? सब ठीक तो है?”
सीमा धीरे से बोली—
“मम्मी जी… मेरी बहन माँ बनने वाली है… और डॉक्टर ने उसे आराम करने को कहा है… मम्मी चाहती हैं कि मैं कुछ दिन के लिए उनके पास चली जाऊँ।”
कमला जी मुस्कुराईं—
“तो इसमें सोचने वाली क्या बात है? तुम्हें जाना चाहिए।”
सीमा ने झिझकते हुए कहा—
“लेकिन यहाँ आपका और घर का क्या होगा? अमित भी ऑफिस जाते हैं…”
कमला जी ने प्यार से कहा—
“बेटा, रिश्ते सिर्फ निभाने से नहीं, समझने से चलते हैं। वहाँ तुम्हारी ज़रूरत ज़्यादा है।”
सीमा की आँखें भर आईं—
“आप सच में मुझे जाने देंगी?”
“हाँ, और खुशी-खुशी भेजूँगी,” कमला जी ने उसका सिर सहलाते हुए कहा।
अगले दिन सीमा अपने मायके चली गई।
घर में अब कमला जी और उनका बेटा अमित ही थे।
पहले दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे कमला जी को काम का बोझ महसूस होने लगा। सुबह उठकर झाड़ू-पोंछा, नाश्ता, खाना… फिर बर्तन… और शाम तक शरीर थककर चूर हो जाता।
एक दिन अमित ऑफिस से आया तो देखा कि घर थोड़ा बिखरा हुआ है।
उसने थोड़ा चिढ़कर कहा—
“मम्मी, आज घर इतना फैला हुआ क्यों है? आप ठीक से काम नहीं कर पा रही हैं क्या?”
कमला जी ने थके हुए स्वर में कहा—
“बेटा, आज थोड़ी तबीयत ठीक नहीं थी… इसलिए सब नहीं हो पाया।”
अमित ने बिना सोचे समझे कह दिया—
“तो आपने सीमा को जाने क्यों दिया? जब संभाल नहीं पा रही थीं तो मना कर देतीं!”
ये सुनते ही कमला जी चुप हो गईं। उनके चेहरे पर दुख साफ दिख रहा था।
उधर मायके में भी सीमा का मन बिल्कुल नहीं लग रहा था। घरवालों के बीच होने के बावजूद उसके चेहरे पर वही बेचैनी बनी हुई थी। बार-बार उसका ध्यान अपने ससुराल की ओर चला जाता—मम्मी जी कैसी होंगी, सब काम कैसे संभाल रही होंगी…
आखिर एक दिन उसने खुद को रोक नहीं पाया और अमित को फोन कर दिया।
“कैसे हो? मम्मी जी ठीक हैं?” उसने चिंता भरे स्वर में पूछा।
अमित ने हल्के रूखेपन के साथ जवाब दिया—
“ठीक ही हैं… बस थोड़ा काम ज्यादा हो रहा है।”
अमित की आवाज़ सुनते ही सीमा समझ गई कि कुछ ठीक नहीं है। शब्द भले ही सामान्य थे, लेकिन उनके पीछे छिपी थकान और खीझ साफ महसूस हो रही थी।
फोन रखते ही सीमा का मन और भी बेचैन हो उठा। उसे एहसास हो गया कि वहाँ सब कुछ ठीक से नहीं चल रहा।
उसने बिना देर किए फैसला कर लिया—अब उसे वापस जाना ही होगा।
अगले ही दिन उसने घर लौटने की तैयारी शुरू कर दी।
जब सीमा घर पहुँची, तो उसने देखा—कमला जी थकी हुई कुर्सी पर बैठी थीं।
सीमा ने तुरंत उनके पास जाकर उनका हाथ पकड़ा—
“मम्मी जी, आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि आपको परेशानी हो रही है?”
कमला जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“तुम वहाँ अपनी बहन के पास थी… मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी।”
सीमा की आँखों में आँसू आ गए—
“आप भी तो मेरी माँ जैसी हैं… आपकी तकलीफ कैसे न समझती?”
इतने में अमित भी आ गया।
सीमा ने उसकी तरफ देखा और शांत लेकिन मजबूत आवाज़ में कहा—
“अमित, अगर मैं अपने मायके गई थी, तो वो भी एक जिम्मेदारी थी। और यहाँ मम्मी अकेले सब संभाल रही थीं… क्या तुम्हें उनकी मदद नहीं करनी चाहिए थी?”
अमित चुप हो गया।
सीमा ने आगे कहा—
“रिश्ते एक तरफ से नहीं चलते… अगर हम दूसरों से उम्मीद रखते हैं, तो हमें भी उनका साथ देना चाहिए।”
अमित को अपनी गलती का एहसास हो गया।
वह धीरे से अपनी माँ के पास गया और बोला—
“सॉरी मम्मी… मैंने बिना सोचे समझे आपसे गलत बात कह दी। मुझे आपकी मदद करनी चाहिए थी।”
कमला जी ने मुस्कुराकर कहा—
“कोई बात नहीं, बेटा… समझ आ गया, वही काफी है।”
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।
अमित अब खुद काम में हाथ बँटाने लगा—कभी बर्तन धो देता, कभी झाड़ू लगा देता।
सीमा यह सब देखकर हल्के से मुस्कुरा दी। उसने प्यार से कमला जी की तरफ देखते हुए कहा—
“देखा मम्मी जी… अब हमारा घर पहले से भी ज़्यादा अच्छा लगने लगा है।”
कमला जी ने भी मुस्कुराकर उसकी बात का जवाब दिया—
“हाँ बेटा… क्योंकि अब इस घर में सिर्फ जिम्मेदारियाँ ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने का भाव भी है।”
सीख:
कभी-कभी हम बिना पूरी सच्चाई जाने जल्दबाज़ी में फैसले ले लेते हैं। लेकिन अगर समय रहते समझदारी और धैर्य से काम लिया जाए, तो बिगड़ते रिश्तों को भी संभाला जा सकता है और उन्हें टूटने से बचाया जा सकता है।

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